उत्तराखंड का कुमाऊं क्षेत्र केवल अपनी प्राकृतिक छटा और लोक संस्कृति के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अनूठे पारंपरिक खानपान के लिए भी विख्यात है। पहाड़ी मिष्ठानों में अब तक बाल मिठाई को सबसे अधिक ख्याति मिली है, परंतु इसी क्षेत्र की खास चॉकलेट मिठाई भी मिठास के शौकीनों के बीच तेजी से अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत कर रही है। मावे से तैयार होने वाली यह गहरे भूरे रंग की मिठाई देखने में आधुनिक चॉकलेट जैसी प्रतीत होती है, मगर इसकी बनावट और स्वाद पूरी तरह पहाड़ी परंपरा से जुड़ा हुआ है। जो लोग बाल मिठाई पर लगने वाले चीनी के सफेद दानों के बिना शुद्ध मावे का सौंधा स्वाद लेना चाहते हैं, उनके लिए यह मिष्ठान एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरा है।
धीमी आंच पर पकने से मिलता है गहरा भूरा रंग
बागेश्वर के स्थानीय मिष्ठान विक्रेता नरेंद्र राणा के अनुसार, इस पारंपरिक मिठाई का मुख्य आधार शुद्ध खोया अथवा मावा ही होता है। इसे बनाने की कला पूरी तरह से भूनने की तकनीक पर टिकी है। कढ़ाई में मावे को बेहद धीमी आंच पर लगातार कई घंटों तक पकाया जाता है। जैसे-जैसे मावा पकता है, उसका प्राकृतिक रंग हल्के पीले से बदलकर गहरा भूरा होने लगता है। लगातार धीमी सिकाई की इसी प्रक्रिया से खोये में एक खास तरह का कैरेमलाइज़्ड स्वाद उभरता है, जो इसे बिना किसी कृत्रिम रंग या कोको पाउडर के प्राकृतिक चॉकलेट जैसा रूप और जायका प्रदान करता है।
बाल मिठाई और चॉकलेट मिठाई का बुनियादी अंतर
कुमाऊं की इन दोनों प्रसिद्ध मिठाइयों की बुनियाद भले ही पके हुए खोये पर टिकी हो, लेकिन दोनों का स्वरूप एकदम भिन्न है। नरेंद्र राणा स्पष्ट करते हैं कि बाल मिठाई तैयार करने के बाद उसके बाहरी हिस्से पर चीनी की छोटी-छोटी सफेद गोलियां चिपकाई जाती हैं, जिससे वह दानेदार बन जाती है। इसके विपरीत, चॉकलेट मिठाई पर किसी भी तरह की चीनी की कोटिंग नहीं की जाती। इसे चौकोर या आयताकार टुकड़ों में काटा जाता है और इसका चिकना, गहरा भूरा रूप बना रहता है। दोनों के बनाने के तरीके, तापमान नियंत्रण और बाहरी बनावट में यही अंतर स्वाद को भी अलग बना देता है।
प्रवासियों की पहली पसंद और शेल्फ लाइफ की सावधानियां
उत्तराखंड से बाहर अन्य राज्यों अथवा शहरों में रहने वाले प्रवासी जब भी गृह जनपद आते हैं, तो वापसी में पहाड़ की इस मिठास को उपहार स्वरूप साथ ले जाना पसंद करते हैं। हालांकि, इसे लंबी यात्रा पर ले जाने से पहले इसकी पैकेजिंग और संरक्षण के तौर-तरीकों को समझना आवश्यक है। खोये से बनी होने के कारण इसका जीवनकाल मौसम, परिवेश के तापमान और पैकिंग की गुणवत्ता पर टिका होता है। आमतौर पर यह मिठाई तीन से चार दिन तक सुरक्षित और ताजी रहती है, इसलिए ग्राहकों को खरीदारी के समय संबंधित दुकानदार से इसके उपभोग की समय सीमा अवश्य परख लेनी चाहिए।
बागेश्वर में उपलब्धता और तय दरें
यदि कोई सैलानी अथवा स्थानीय व्यक्ति बागेश्वर में इस प्रामाणिक मिष्ठान का आनंद लेना चाहता है, तो उसे नगर के बस स्टेशन रोड स्थित मिष्ठान प्रतिष्ठानों पर जाना होगा। बाजार में चॉकलेट मिठाई का भाव 440 रुपये प्रति किलो निर्धारित है। स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक रसोई की यह मिठास पर्यटकों के साथ-साथ हर उस व्यक्ति को लुभा रही है जो पहाड़ के प्रामाणिक स्वादों की विविधता को गहराई से समझना चाहता है।


















