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उत्तराखंड की पारम्परिक ऐपण विधा को नई ऊर्जा दे रहीं मंडलसेरा की कंचन, स्थानीय महिलाओं को दे रहीं मुफ्त हुनर की सौगातउत्तराखंड
12 अक्तू॰ 2026, 4:43 pm (2 घंटे पहले)· 0

उत्तराखंड की पारम्परिक ऐपण विधा को नई ऊर्जा दे रहीं मंडलसेरा की कंचन, स्थानीय महिलाओं को दे रहीं मुफ्त हुनर की सौगात

बागेश्वर के मंडलसेरा की कंचन उपाध्याय बीते एक दशक से उत्तराखंड की लोककला ऐपण के संरक्षण में जुटी हैं और अब वे अन्य महिलाओं को घर बैठे आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुफ्त प्रशिक्षण दे रही हैं।

पहाड़ी अंचल उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर में लोककलाओं का स्थान बेहद महत्वपूर्ण रहा है। इन्हीं में से एक विशिष्ट विधा ऐपण है, जो पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर आधुनिक घरों की सजावट तक अपनी खास चमक बिखेर रही है। बागेश्वर जिले के मंडलसेरा क्षेत्र की रहने वाली कंचन उपाध्याय इस प्राचीन विरासत को संवारने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में एक प्रेरक मिसाल बनकर उभरी हैं। वे पिछले 10 वर्षों से निरंतर ऐपण कला की विभिन्न आकृतियों और शैलियों को निखारने का काम कर रही हैं। अब उन्होंने अपने इस लंबे अनुभव और रचनात्मक हुनर को अपने तक सीमित रखने के बजाय समाज की अन्य महिलाओं के साथ साझा करने का संकल्प लिया है।

पूर्वजों से मिली विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प

कंचन उपाध्याय का मानना है कि ऐपण केवल रंगों और लकीरों से बनाई जाने वाली चित्रकारी नहीं है, बल्कि यह देवभूमि की मान्यताओं, जीवनशैली और आध्यात्मिक आस्थाओं का एक अटूट हिस्सा है। उन्होंने स्वयं यह पारंपरिक विद्या अपने बुजुर्गों और पूर्वजों से सीखी थी। उनका कहना है कि यदि प्राचीन विधाओं के ज्ञान और उनके निर्माण के विशिष्ट तौर-तरीकों को आने वाली पीढ़ी के साथ निरंतर साझा न किया जाए, तो समय के थपेड़ों के साथ यह अनूठी तकनीक लुप्त होने के कगार पर पहुंच सकती है। इसी विचार को केंद्र में रखकर उन्होंने महिलाओं को मुफ्त प्रशिक्षण देना शुरू किया है, ताकि इलाके की अधिक से अधिक महिलाएं अपनी जड़ों से जुड़ सकें और इस लोककला की बारीकियों को भली-भांति समझ सकें।

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देहरी और पूजा स्थलों से निकलकर आधुनिक जीवन में ऐपण की मौजूदगी

पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार ऐपण को हमेशा से शुभ अवसरों पर घरों की देहरी, आंगनों और पूजा स्थलों पर उकेरा जाता रहा है। त्योहारों, जन्म संस्कारों, यज्ञोपवीत और विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर अलग-अलग पौराणिक आकृतियां और प्रतीक चिन्ह बनाने की परिपाटी रही है। समय के बदलाव के साथ अब इस कला के दायरे का भी विस्तार हुआ है। कंचन बताती हैं कि आज की पीढ़ी में भी इस कला को लेकर भारी उत्साह है। अब ऐपण केवल फर्श या दीवारों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि लकड़ी के हस्तशिल्प, उपहार स्वरूप दी जाने वाली सामग्रियों, पूजा की थालियों और आकर्षक नेमप्लेटों पर भी इसकी सुंदर आकृतियां उकेरी जाने लगी हैं।

घर की चारदीवारी के भीतर से स्वरोजगार की नई राह

इस निःशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम का एक बड़ा उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्र की गृहणियों और युवतियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। बहुत सी महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक कारणों से आजीविका कमाने के लिए घर से बाहर जाकर काम करने में असमर्थ रहती हैं। कंचन की यह पहल ऐसी महिलाओं को अपने खाली समय का सदुपयोग करने और घर बैठे ही काम शुरू करने का एक व्यावहारिक जरिया प्रदान करती है। हस्तनिर्मित उत्पादों की बढ़ती मांग के चलते ऐपण से सजी थालियां, नेमप्लेट और सजावटी वस्तुएं स्थानीय स्तर पर आमदनी का साधन बन सकती हैं। कंचन का मानना है कि इसके जरिए महिलाएं बिना किसी बड़े निवेश के अपने हुनर के बल पर आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ा सकती हैं।

बाजार की समझ और कला के संरक्षण का दोहरा लाभ

किसी भी हस्तकला से नियमित आमदनी हासिल करने के लिए केवल कलात्मक हुनर काफी नहीं होता, बल्कि बाजार के मिजाज को समझना भी बेहद जरूरी है। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को उत्पादों की फिनिशिंग, उच्च गुणवत्ता और ग्राहकों की पसंद के अनुरूप कलाकृतियां तैयार करने के महत्व के बारे में भी समझाया जाता है। कंचन का यह प्रयास महिला सशक्तीकरण और क्षेत्रीय सांस्कृतिक संरक्षण का एक खूबसूरत संगम प्रस्तुत करता है। उनकी सोच है कि आर्थिक तंगी किसी भी महिला के लिए हुनर सीखने की राह में बाधा न बने, इसीलिए उन्होंने इस प्रशिक्षण को पूरी तरह निःशुल्क रखा है। लोककलाओं को महज त्योहारों की औपचारिकता से बाहर निकालकर दैनिक रोजगार से जोड़ना ही इस परंपरा को लंबे समय तक जीवंत बनाए रखने की सबसे मजबूत कड़ी साबित हो रहा है।

सवाल-जवाब

कंचन उपाध्याय कौन हैं और वे क्या कार्य कर रही हैं?
कंचन उपाध्याय बागेश्वर के मंडलसेरा की निवासी हैं जो पिछले 10 वर्षों से ऐपण कला बना रही हैं और महिलाओं को इसका निःशुल्क प्रशिक्षण दे रही हैं।
कंचन महिलाओं को मुफ्त में ऐपण कला क्यों सिखा रही हैं?
उनका उद्देश्य उत्तराखंड की इस पारंपरिक लोककला को संरक्षित करना और महिलाओं को घर बैठे स्वरोजगार के जरिए आत्मनिर्भर बनाना है।
कंचन उपाध्याय ने ऐपण कला किससे सीखी थी?
उन्होंने यह पारम्परिक विधा अपने परिवार के पूर्वजों और बुजुर्गों से सीखी थी।
ऐपण कला का उपयोग किन आधुनिक उत्पादों में किया जा रहा है?
पारंपरिक पूजा थालियों के अलावा अब इसका उपयोग नेमप्लेट, लकड़ी के सामान, उपहार वस्तुओं और गृह सज्जा की सामग्री पर किया जा रहा है।
इस कला से नियमित आमदनी हासिल करने के लिए किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?
नियमित आमदनी के लिए तैयार उत्पादों की गुणवत्ता और फिनिशिंग, ग्राहकों की पसंद और बाजार तक पहुंच को समझना आवश्यक है।
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