उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित प्रसिद्ध धाम कैंची धाम में श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती आमद अब स्थानीय पारिस्थितिकी और जैव विविधता के लिए चिंता की बड़ी वजह बन रही है। बाबा नीब करौरी महाराज के प्रति गहरी आस्था के कारण हर वर्ष लाखों लोग इस पहाड़ी घाटी में शीश नवाने आते हैं। हालांकि, इस धार्मिक यात्रा के तेजी से बढ़ते दायरे के साथ यहां वाहनों की कतारें, लगातार बजते हॉर्न, अनियंत्रित निर्माण कार्य और मानवीय दखलअंदाजी भी तेजी से बढ़ी है। जंगलों के इस शांत परिवेश पर पड़ रहे भारी दबाव के कारण यहां सदियों से बसेरा बनाए पक्षियों के प्राकृतिक पर्यावास पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। स्थानीय बर्ड वॉचर्स का स्पष्ट मानना है कि जिस घाटी में कभी परिंदों का मधुर कलरव गूंजता था, वहां अब कई स्थानीय और प्रवासी प्रजातियों की उपस्थिति नगण्य होती जा रही है।
गौरैया का गायब होना और पर्यावास पर गहराता संकट
नैनीताल के स्थानीय बर्ड वॉचर जगजीवन सिंह धामी ने इस क्षेत्र की मौजूदा स्थिति पर गहरी चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि घाटी में अत्यधिक पर्यटक दबाव, वाहनों से निकलने वाला धुआं और तेज शोर परिंदों के प्राकृतिक माहौल को पूरी तरह बदल रहे हैं। इंसानी गतिविधियों के बेतहाशा विस्तार के कारण पक्षियों को अपना सुरक्षित बसेरा छोड़कर अन्य ऊंचे या शांत इलाकों का रुख करना पड़ रहा है। धामी ने रेखांकित किया कि कभी घरों के आंगनों, मुंडेरों और आसपास की झाड़ियों में सहज दिखने वाली घरेलू गौरैया अब कैंची धाम के पूरे इलाके से लगभग गायब हो चुकी है। यद्यपि पक्षियों की कुल आबादी में आई गिरावट की स्पष्ट तस्वीर सामने लाने के लिए गहन वैज्ञानिक सर्वेक्षण की दरकार है, लेकिन गौरैया जैसी अत्यंत सामान्य और लचीली प्रजाति का अचानक लुप्तप्राय हो जाना स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में आ रही गहरी विकृतियों का साफ संकेत देता है।
लॉफिंग थ्रश और यूरेशियन जे जैसी दुर्लभ प्रजातियों पर मंडराता खतरा
पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार, कैंची धाम और उससे सटी वन संपदा में अतीत में लॉफिंग थ्रश, व्हाइट-हेडेड लॉफिंग थ्रश और यूरेशियन जे जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियां प्रचुर संख्या में दिखाई देती थीं। वर्तमान समय में इन खूबसूरत पक्षियों को देख पाना दुर्लभ होता जा रहा है। इसके अतिरिक्त स्ट्रीक्ड लॉफिंग थ्रश सहित कई अन्य हिमालयी परिंदों की घटती संख्या ने भी पक्षी प्रेमियों को चिंतित कर दिया है। धामी बताते हैं कि पंगोट और कैंची धाम की पर्वत श्रृंखलाएं आपस में जुड़ी हुई हैं और यह पूरा पहाड़ी बेल्ट प्राचीन काल से ही समृद्ध पक्षी विविधता के लिए जाना जाता रहा है। ब्रिटिश काल के दौरान भी दूर-दराज से लोग यहां की समृद्ध जैव विविधता और पक्षियों का अवलोकन करने पहुंचते थे। उस दौर में घने जंगलों में मौजूद पेड़-पौधों की प्रचुर किस्में, निर्बाध शांति और कलकल बहते प्राकृतिक जलस्रोत पक्षियों के फलने-फूलने के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करते थे।
जलस्रोतों के किनारों से घटती परिंदों की चहलकदमी
कैंची धाम से होकर गुजरने वाली पहाड़ी नदी और नजदीकी प्राकृतिक जलस्रोतों के किनारे पहले विभिन्न प्रकार के जलचर और शिकारी पक्षी सहजता से विचरण करते थे। करीब तीन वर्ष पहले तक भक्तजन बाबा नीब करौरी महाराज के दर्शन के उपरांत इस घाटी की नैसर्गिक शांति, हरियाली और पक्षियों के जीवन को निहारने के लिए नदी तटों पर कुछ समय बिताया करते थे। अब अनियंत्रित भीड़, कूड़ा-कचरा और तेज मानवीय आवाजाही के कारण इन जलस्रोतों का पर्यावरण भी प्रभावित हुआ है। पक्षियों के स्वस्थ जीवन चक्र के लिए वन क्षेत्र की अखंड शांति, पर्याप्त भोजन, घोंसले बनाने के सुरक्षित पेड़ और स्वच्छ जलस्रोत आधारभूत जरूरतें होते हैं। जब लगातार चलने वाले निर्माण और वाहनों की रेलमपेल इन प्राकृतिक घटकों को नष्ट करने लगती है, तो वन्यजीव वहां से पलायन के लिए विवश हो जाते हैं। इसलिए पर्यटन प्रबंधन में वन्यजीवों की प्राथमिक आवश्यकताओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देना अनिवार्य हो चुका है।
नयना देवी बर्ड कंजर्वेशन क्षेत्र के संरक्षण और सर्वेक्षण की आवश्यकता
क्षेत्रीय जैव विविधता को सुरक्षित रखने के संदर्भ में जगजीवन सिंह धामी ने नैना देवी बर्ड कंजर्वेशन क्षेत्र की महत्ता पर प्रकाश डाला। वर्ष 2016 में अधिसूचित यह संरक्षित क्षेत्र लगभग 114 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जिसकी भौगोलिक ऊंचाई करीब 1,000 मीटर से लेकर 2,611 मीटर के बीच विस्तृत है। इतनी विविध ऊंचाई और वनस्पतियों के कारण यह क्षेत्र सैकड़ों परिंदों का घर रहा है, जिसके संरक्षण के लिए अब सख्त नीतियों की आवश्यकता है। धामी ने सुझाव दिया है कि कैंची धाम और आसपास के पूरे वन क्षेत्र का अविलंब एक विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए। इस अध्ययन में पहले दर्ज किए गए पक्षियों और पेड़-पौधों के ऐतिहासिक डेटा की तुलना वर्तमान जमीनी हकीकत से की जानी चाहिए। इस व्यापक अध्ययन से उन सभी प्रजातियों की सटीक पहचान हो सकेगी जिनकी संख्या घट रही है, जिससे उनके संरक्षण की समयबद्ध कार्ययोजना तैयार की जा सके।
धार्मिक आस्था और पारिस्थितिकी संतुलन के बीच समन्वय का समय
कैंची धाम का धार्मिक महत्व और उससे मिलने वाला आर्थिक संबल स्थानीय लोगों की आजीविका की धुरी है, लेकिन इस विकास की कीमत पर्यावरण को चुकाने नहीं दी जा सकती। जगजीवन का स्पष्ट मत है कि आस्था और अर्थव्यवस्था के साथ-साथ प्राकृतिक संतुलन की रक्षा करना भी नीति-निर्माताओं का दायित्व है। इस दिशा में वाहनों के हॉर्न पर कड़ा प्रतिबंध लगाने, तेज आवाज को नियंत्रित करने, अंधाधुंध कंक्रीट निर्माण पर निगरानी रखने, नदी और प्राकृतिक स्रोतों की शुचिता बनाए रखने तथा वन के संवेदनशील कोर क्षेत्रों में इंसानी आवाजाही को नियमित करने जैसे ठोस कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए। पर्यटन को केवल पूजा-अर्चना और दुकानों तक सीमित न रखकर प्रकृति के सम्मान और संरक्षण से जोड़ने की तत्काल आवश्यकता है।



















