उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों में पारंपरिक कृषि जीवन की रीढ़ माने जाने वाले कई औजार सदियों से ग्रामीण परिवारों की दिनचर्या में रचे-बसे हैं. इन्हीं पारंपरिक औजारों में सबसे प्रमुख स्थान दराती का है, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में दरांती अथवा हंसिया के नाम से भी पुकारा जाता है. पर्वतीय भूगोल में जब खेतों में पकी फसल की कटाई करनी हो, पालतू मवेशियों के लिए सुदूर जंगलों से चारा जुटाना हो या खेत की मेड़ों पर उग आई झाड़ियों को साफ करना हो, यह मुड़ा हुआ धारदार औजार आज भी ग्रामीणों का सबसे विश्वस्त साथी साबित होता है. यह केवल एक कृषि उपकरण भर नहीं है, बल्कि पहाड़ों के कठिन परिवेश, सदियों पुरानी कार्यशैली और ग्रामीण जनजीवन की ऐतिहासिक निरंतरता का जीता-जागता प्रतीक है.
पत्थर और हड्डियों से शुरू होकर लोहे तक का सफर
पर्वतीय जीवनशैली और औजारों के विकासक्रम पर स्थानीय जानकार हिमांशु बताते हैं कि घुमावदार और धारदार औजारों के इस्तेमाल की परंपरा मानव इतिहास में बेहद प्राचीन काल से चली आ रही है. प्रागैतिहासिक दौर में इस तरह के कटाई वाले औजार मजबूत पत्थरों और जानवरों की हड्डियों को तराशकर तैयार किए जाते थे. कालांतर में जब धातुकर्म और लोहे का प्रचलन शुरू हुआ, तब लोहे से गढ़े गए औजार कहीं अधिक मजबूत, टिकाऊ और लंबे समय तक धार बनाए रखने वाले साबित हुए. वर्तमान दौर में भी उत्तराखंड के बागेश्वर समेत अनेक पहाड़ी गांवों में रोजमर्रा के अनगिनत घरेलू और मैदानी कार्यों में दराती की उपयोगिता यथावत बनी हुई है.
कुमाऊं और गढ़वाल में अलग-अलग बोलियों में विविध नाम
उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों, घाटियों और बोलियों के अनुसार इस औजार को विभिन्न स्थानीय नामों से पहचाना जाता है. कुमाऊं मंडल के पर्वतीय क्षेत्रों में लोग इसे सामान्यतः दरांती, दरांत, दाथुली या आंसी कहकर पुकारते हैं. दूसरी ओर, गढ़वाल मंडल के गांवों में इसे दराट और कोड़ा जैसे पारंपरिक नामों से जाना जाता है. बनावट के स्तर पर इस पारंपरिक औजार में लोहे की एक तीखी घुमावदार धार होती है, जिसे मजबूती देने के लिए लकड़ी का एक मजबूत हत्था लगाया जाता है. काम की विशिष्ट प्रकृति और जरूरत के आधार पर इसकी धार की तीक्ष्णता, मुड़ाव और आकार में भी स्थानीय स्तर पर थोड़ा फेरबदल देखने को मिलता है.
सीढ़ीदार खेतों की कटाई से लेकर चारे के संग्रह तक अहमियत
पर्वतीय भूगोल में दराती का सर्वाधिक व्यापक उपयोग पालतू पशुओं के लिए हरी घास काटने में किया जाता है. ग्रामीण महिलाएं सुबह-सवेरे दुर्गम जंगलों, पहाड़ी ढलानों, खेतों की संकरी मेड़ों और प्राकृतिक घास के मैदानों में जाकर मवेशियों के पोषण के लिए घास काटती हैं. इसके अतिरिक्त गेहूं, जौ, मंडुवा और झंगोरा जैसी पारंपरिक पहाड़ी फसलों की कटाई के दौरान भी सदियों से दराती ही प्राथमिक साधन रही है. खेतों में उगने वाले अनचाहे खरपतवार को जड़ से साफ करने, कंटीली झाड़ियों को छांटने तथा पालतू जानवरों के लिए पौष्टिक हरी घास जुटाने में यह अत्यंत कारगर सिद्ध होती है. अनेक ग्रामीण परिवार सर्दियों के लिए सूखी घास का भंडारण करने और चूल्हे के लिए पतली टहनियां काटने में भी इसका निरंतर उपयोग करते हैं. पहाड़ों के अत्यंत ढलानदार और संकीर्ण सीढ़ीदार खेतों में भारी-भरकम आधुनिक कृषि मशीनें चलाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता, जिसके चलते दराती से काम निपटाना सबसे सरल और सुविधाजनक विकल्प बना रहता है.
पर्वतीय महिलाओं की कठिन दिनचर्या की अटूट साथी
पहाड़ की विषम परिस्थितियों में ग्रामीण महिलाओं के संघर्षपूर्ण जीवन में दराती की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है. मवेशियों के लिए घास इकट्ठा करने अथवा घरेलू ईंधन के लिए सूखी लकड़ियां बीनने जब महिलाएं घने वनों की ओर प्रस्थान करती हैं, तब दराती सदा उनके पास रहती है. बीहड़ रास्तों, संकरी पगडंडियों और बीहड़ वनों में काम करते समय यह उनके परिश्रम को सुगम बनाती है. हालांकि अप्रत्याशित संकट के क्षणों में यह आत्मरक्षा के एक कामचलाऊ साधन के रूप में भी सामने आ सकती है, परंतु जंगली जानवरों के अचानक हमले से पूर्ण बचाव के लिए केवल इस पर निर्भर रहना कतई उचित नहीं माना जाता. इसी कारण वन क्षेत्रों और वन्यजीव बहुल जंगलों में आवाजाही करते समय ग्रामीणों को अपनी सुरक्षा के प्रति अतिरिक्त सतर्कता और सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है.
ग्रामीण लोहारों की जीवंत कारीगरी और लोहे का पारंपरिक काम
दराती के निर्माण का ताना-बाना पर्वतीय समाज के पारंपरिक लौह शिल्प और लोहार समुदाय की ऐतिहासिक कारीगरी से गहराई से जुड़ा हुआ है. पुराने समय से ही गांवों में स्थापित पारंपरिक लोहार अपनी धधकती भट्ठी में लोहे को तपाकर लाल करते थे. इसके उपरांत भारी हथौड़े और निहाई की सटीक चोटों से उस तपे हुए लोहे को वांछित मुड़ावदार रूप देकर अत्यंत तीक्ष्ण धार वाला औजार तैयार किया जाता था. इस प्रकार यह औजार मात्र एक कृषि यंत्र न रहकर ग्रामीण कारीगरों के पसीने, कौशल और आत्मनिर्भर ग्रामीण व्यवस्था का प्रतीक भी बन गया. पूर्व के समय में गांव का समूचा समाज खेती और दैनिक जीवन के तमाम लोहे के औजार अपने ही क्षेत्र के स्थानीय लोहारों से तैयार करवाता था.
त्योहारों की रीतियों और दराती मंदिर की आस्था से जुड़ाव
दराती का महत्व केवल खेतों में पसीना बहाने और वनों से चारा लाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के सामाजिक संस्कारों और धार्मिक आस्थाओं में भी रचा-बसा है. घी संक्रांत, जिसे पर्वतीय समाज में ओलगिया पर्व कहा जाता है, से जुड़ी लोक परंपराओं में स्थानीय लोहारों द्वारा अपने जजमानों को पारंपरिक रूप से तैयार औजार भेंट करने की परिपाटी का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. इसी प्रकार नैनीताल जिले के फतेहपुर गांव में स्थित प्रसिद्ध दराती मंदिर से जुड़ी जनमान्यताएं भी इस औजार के सांस्कृतिक महत्व को दर्शाती हैं. इस पवित्र स्थल पर अपने पशुधन की सुरक्षा, निरोग रहने और पारिवारिक मनोकामनाओं की पूर्ति की गहरी आस्था के तहत श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर में दराती अर्पित करने की परंपरा लंबे समय से प्रचलित है.
मशीनीकरण के बढ़ते प्रसार के बाद भी बनी हुई है प्रासंगिकता
वर्तमान समय में यद्यपि आधुनिक कृषि तकनीकों, मोटराइज्ड कटरों और मशीनों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है और खेती-बाड़ी के तौर-तरीके भी निरंतर बदल रहे हैं, तथापि उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों में दराती की अनिवार्यता समाप्त नहीं हुई है. सुदूर खेतों की ढलानों से लेकर घने वनों और घरों के छोटे-मोटे रोजमर्रा के कार्यों तक, यह पारंपरिक औजार आज भी अपनी सुगमता और कम लागत के दम पर पहाड़ी जीवन की अटूट पहचान बना हुआ है.





















