कम बारिश और सूखे की मार झेलने वाले क्षेत्रों में पारंपरिक फसलों की जगह नकदी फलों की ओर कदम बढ़ाना किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है। पलामू जिले के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार, स्ट्रॉबेरी की बागवानी किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक बेहतरीन जरिया बन सकती है। यह फल खट्टे-मीठे स्वाद के साथ शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी, अन्य जरूरी विटामिन, खनिज तत्व और एंटीऑक्सीडेंट यौगिक मौजूद रहते हैं। इसी वजह से फल बाजारों में इसकी मांग साल भर बनी रहती है। लोग इसे केवल ताजे फल के तौर पर ही पसंद नहीं करते, बल्कि जूस, शेक, जैम और कई तरह के प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को तैयार करने में भी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है।
पौध चयन और खेत की सही तैयारी
स्ट्रॉबेरी की पैदावार तभी अच्छी मिलती है जब शुरुआती स्तर पर ही गुणवत्तापूर्ण पौधों का चुनाव किया जाए। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे किसी मान्यता प्राप्त टिशू कल्चर लैबोरेटरी या बेहद भरोसेमंद नर्सरी स्रोत से ही तैयार पौधे खरीदें। खेती की शुरुआत करते समय मिट्टी की तैयारी पर खास ध्यान देना होता है। पौधों को समतल जमीन की जगह रिज बेड बनाकर रोपा जाता है। खेत में जल निकासी का मजबूत प्रबंध होना अनिवार्य है, क्योंकि अगर क्यारियों या जड़ों के पास जरा भी पानी जमा हुआ, तो पौधे गलकर खराब हो सकते हैं। बलुई दोमट मिट्टी इस फसल के लिए काफी अनुकूल मानी जाती है क्योंकि इसमें जड़ों का फैलाव सुगमता से होता है और अतिरिक्त पानी तेजी से निकल जाता है।
रोपाई का सही समय और मौसमी चक्र
पलामू के क्षेत्रीय मौसम के हिसाब से स्ट्रॉबेरी लगाने के लिए सितंबर और अक्टूबर का महीना सबसे मुफीद होता है। किसान 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच रोपाई का काम पूरा करने का लक्ष्य रख सकते हैं। सर्द मौसम में स्ट्रॉबेरी के पौधे बहुत तेजी से पनपते हैं और उनमें फल लगने की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती है। यह पूरी खेती लगभग पांच महीने की अवधि वाली होती है। इस सीमित समय चक्र को देखते हुए समय पर क्यारियां तैयार करना, खाद का सही अनुपात देना और समयबद्ध सिंचाई व नियमित देखभाल शुरू करना जरूरी हो जाता है।
लागत, मुनाफा और बिक्री के रास्ते
स्ट्रॉबेरी के पूरे उत्पादन चक्र में उच्च गुणवत्ता की पौध, रिज बेड का निर्माण, मल्चिंग शीट, सिंचाई व्यवस्था, उर्वरक और नियमित रखरखाव पर खर्च आता है। खेती में लगने वाली कुल लागत बाजार की परिस्थितियों, फसल के उत्पादन स्तर और प्रबंधन के तौर-तरीकों पर निर्भर करती है। बेहतर रखरखाव और उपज का सही दाम मिलने पर किसान एक एकड़ खेत से तीन से चार लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हासिल कर सकते हैं। हालांकि यह फल नाजुक और जल्दी खराब होने वाला होता है, इसलिए रोपाई से पहले ही बाजार की पड़ताल करना जरूरी है। किसान स्थानीय मंडियों के अलावा नजदीकी बड़े शहरों के फल बाजार, होटल, रेस्टोरेंट और फ्रूट प्रोसेसिंग यूनिट्स से सीधा संपर्क साधकर अपनी फसल समय पर बेच सकते हैं।


















