बांग्लादेश की चर्चित और विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन लगभग 19 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर कोलकाता की धरती पर लौटी हैं। यद्यपि उनका यह दौरा स्थाई रूप से बसने के उद्देश्य से नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल की राजधानी में उनका आगमन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में बदलावों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बहसों और भारत व बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक संबंधों के संदर्भ में उनके इस दौरे को विशेष महत्व दिया जा रहा है। कोलकाता पहुंचने पर तस्लीमा नसरीन ने भावुक होते हुए कहा कि यह शहर उनके लिए केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से एक घर की भांति है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सरकार की ओर से पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध सुनिश्चित किए जाएं, तो वे भविष्य में यहां स्थाई रूप से निवास करना पसंद करेंगी। अपनी निर्भीक लेखनी, कट्टरपंथ पर तीखे प्रहारों और महिला अधिकारों की जोरदार वकालत के लिए वैश्विक स्तर पर जानी जाने वाली बांग्लादेशी लेखिका का यह दौरा सेक्युलर मिशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के सिलसिले में हुआ है।
बांग्लादेश से निष्कासन और 'लज्जा' उपन्यास का भूचाल
तस्लीमा नसरीन के जीवन का विवादों से गहरा नाता रहा है। मूल रूप से चिकित्सा पेशा (डॉक्टर) छोड़कर साहित्य के क्षेत्र में कदम रखने वाली तस्लीमा नसरीन 1990 के दशक की शुरुआत में अपनी बेबाक रचनाओं के कारण चर्चा में आईं। वर्ष 1993 में जब उनका बहुचर्चित उपन्यास 'लज्जा' प्रकाशित हुआ, तो बांग्लादेश की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में एक बड़ा भूचाल आ गया। इस उपन्यास की कहानी वर्ष 1992 में भारत में बाबरी मस्जिद ढांचा गिराए जाने के बाद बांग्लादेश के भीतर अल्पसंख्यक हिंदू समुदायों पर हुए अत्याचारों और भड़के सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित थी।
उपन्यास के बाजार में आते ही बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने तस्लीमा नसरीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। देश भर में उनके विरोध में हिंसक प्रदर्शन आयोजित किए गए, अदालत में उन पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए और विभिन्न कट्टरपंथी गुटों द्वारा उनके नाम पर मौत के फतवे जारी कर दिए गए। लगातार मिल रही जानलेवा धमकियों और सुरक्षा के गंभीर संकट को देखते हुए वर्ष 1994 में उन्हें मजबूरन अपना गृह देश बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। बांग्लादेश से निकलने के बाद उन्होंने कुछ समय यूरोप के विभिन्न देशों में बिताया, लेकिन अपनी जड़ों और बंगाली भाषा के निकट रहने की इच्छा के कारण उन्होंने भारत का रुख किया और वर्ष 2004 से कोलकाता को अपना नया ठिकाना बना लिया।
'द्विखंडितो' विवाद और 2007 का हिंसक आंदोलन
कोलकाता में रहने के दौरान तस्लीमा नसरीन का लेखन लगातार जारी रहा, किंतु विवादों ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। वर्ष 2003 में उनकी आत्मकथा श्रृंखला का तीसरा भाग 'द्विखंडितो' बाजार में आया। इस पुस्तक में प्रस्तुत किए गए विचारों और संस्मरणों को लेकर मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों ने कड़ा ऐतराज जताया और उन पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया। विवाद गहराने पर पश्चिम बंगाल की तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य नीत वाममोर्चा सरकार ने कानून-व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए इस पुस्तक के वितरण और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया।
यह विवाद केवल किताबों तक सीमित नहीं रहा। नवंबर 2007 में ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम के बैनर तले कोलकाता की सड़कों पर व्यापक हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। शहर के विभिन्न हिस्सों में उग्र भीड़ ने वाहनों में आग लगा दी, तोड़फोड़ की और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया। स्थिति इस हद तक बिगड़ गई कि प्रशासन को कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए सेना की टुकड़ियों को तैनात करना पड़ा। बिगड़ते सुरक्षा माहौल और राजनीतिक दबाव के बीच तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने सुरक्षा का हवाला देते हुए तस्लीमा नसरीन को रातों-रात कोलकाता से स्थानांतरित कर नई दिल्ली भेज दिया। इसके साथ ही कोलकाता में उनके स्थाई प्रवास का दौर समाप्त हो गया।
ममता बनर्जी सरकार और तृणमूल कांग्रेस से राजनीतिक मतभेद
वर्ष 2011 में जब पश्चिम बंगाल में तीन दशक से चले आ रहे वाममोर्चा शासन का अंत हुआ और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं, तब तस्लीमा नसरीन को उम्मीद जगी थी कि उनके लिए कोलकाता के दरवाजे पुनः खुलेंगे। हालांकि, घटनाओं के क्रम से उनका यह भ्रम जल्द ही टूट गया। तस्लीमा नसरीन ने कई साक्षात्कारों में खुले तौर पर आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस सरकार का रुख वामपंथियों की तुलना में अधिक सख्त और उपेक्षापूर्ण रहा।
उन्होंने कहा कि राज्य की प्रशासनिक मशीनरी ने वोट बैंक की राजनीति और तुष्टिकरण के दबाव में आकर उन्हें पश्चिम बंगाल में प्रवेश करने से रोके रखा। ममता बनर्जी के शासनकाल में भी उनके खिलाफ प्रशासनिक बंदिशें जारी रहीं। उदाहरण स्वरूप, कोलकाता में उनकी पुस्तक 'निर्वासन' का आधिकारिक विमोचन कार्यक्रम रद्द करवा दिया गया और उनके द्वारा लिखे गए एक धारावाहिक (टीवी सीरियल) का प्रसारण भी कड़े विरोध के बाद रोक दिया गया। तस्लीमा ने बार-बार इस बात पर दुख व्यक्त किया कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक लाभ के लिए उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बलि चढ़ाया गया।
व्यक्तिगत जीवन, तीन शादियां और लिव-इन संबंध
तस्लीमा नसरीन की निजी जिंदगी भी उनके सार्वजनिक बयानों की तरह ही काफी चर्चित और अपरंपरागत रही है। उन्होंने अपने जीवन काल में तीन बार विवाह किया। उनका पहला विवाह प्रसिद्ध बंगाली कवि रुद्र मोहम्मद शाहिदउल्लाह के साथ हुआ था। इसके बाद उन्होंने पत्रकार नईमूल इस्लाम खान से दूसरा विवाह किया, तथा उनका तीसरा विवाह मिनहाज उद्दीन फहीम से हुआ। हालांकि, ये तीनों ही शादियां लंबे समय तक नहीं चल सकीं और अंततः तलाक में समाप्त हुईं। इन अनुभवों के बाद तस्लीमा नसरीन ने अपनी आत्मकथाओं और सार्वजनिक मंचों पर यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि वे विवाह नामक पारंपरिक सामाजिक संस्था पर विश्वास नहीं करती हैं।
25 अगस्त 1962 को जन्मी तस्लीमा नसरीन (वर्तमान आयु लगभग 63 वर्ष) उस समय एक नए विवाद के केंद्र में आ गईं, जब उन्होंने खुद से लगभग 20 वर्ष छोटे एक व्यक्ति (लगभग 43 वर्ष) के साथ एक लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप (सहजीवन संबंध) में रहने की बात सार्वजनिक की। पारंपरिक और रूढ़िवादी समाज के नियमों को चुनौती देते हुए उन्होंने निडरतापूर्वक स्वीकार किया कि कम उम्र के साथी के साथ जीवन व्यतीत करना उनके लिए बेहद सुखद और ऊर्जावान अनुभव रहा है। उनका यह कदम भारतीय और बांग्लादेशी समाज के पारंपरिक ढांचे पर एक बड़ा आघात माना गया।
कट्टरपंथ पर तीखे हमले और भारत-बांग्लादेश कूटनीतिक प्रासंगिकता
तस्लीमा नसरीन का दृढ़ मत रहा है कि संगठित धर्मों की स्थापित व्यवस्थाओं में महिलाओं के साथ असमानता और भेदभाव का व्यवहार किया जाता है। वे लगातार इस्लामी कुरीतियों, तीन तलाक प्रथा, जबरन हिजाब पहनने के नियमों और पितृसत्तात्मक मान्यताओं पर तीखे हमले करती रही हैं। इसके अतिरिक्त, वे भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की पुरजोर पैरवी करती हैं और धार्मिक पर्सनल लॉ बोर्ड्स को पूरी तरह समाप्त करने की मांग उठाती रही हैं। धार्मिक ग्रंथों, पैगंबर और ईश्वर से जुड़ी मान्यताओं पर उनके आलोचनात्मक लेखन के कारण ही विभिन्न कट्टरपंथी समूह लगातार उनके विरोध में फतवे जारी करते रहे हैं।
कूटनीतिक धरातल पर, तस्लीमा नसरीन की भारत में उपस्थिति हमेशा से नई दिल्ली और ढाका के बीच एक संवेदनशील विषय रही है। बांग्लादेश सरकार द्वारा उनकी नागरिकता निरस्त किए जाने के पश्चात, भारत सरकार द्वारा उन्हें जारी किया जाने वाला रेसिडेंस परमिट (आवास अनुमति पत्र) दोनों देशों के संबंधों में ध्यान आकर्षित करता रहा है। हाल ही में भारत के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के बाद उनके रेसिडेंस परमिट का नवीनीकरण किया गया, जिससे भारत में उनके प्रवास का कानूनी रास्ता साफ हुआ। इसी नवीनीकरण के बाद सेक्युलर मिशन ट्रस्ट के निमंत्रण पर वे 19 वर्षों के लंबे अंतराल के पश्चात पुनः कोलकाता की भूमि पर कदम रख सकी हैं।



















