पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प और अहम मोड़ से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आगामी विधानसभा उपचुनावों में खुद मैदान में न उतरने का कड़ा और बड़ा फैसला लिया है। उनके तमाम करीबियों और समर्थकों ने उन्हें चुनाव लड़ने का जोरदार आग्रह किया था, लेकिन उन्होंने इससे किनारा कर लिया। इस कदम ने देश के राजनीतिक गलियारों में उनके भविष्य के सियासी सफर को लेकर तमाम अटकलों को जन्म दे दिया है। कुछ समय पहले ही भारतीय जनता पार्टी की आंधी के आगे उनका लगातार 15 साल पुराना शासन ढह गया था, और उनके कभी बेहद करीबी सिपहसालार रहे सुवेंदु अधिकारी राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए।
उपचुनावों से दूरी और राजनीतिक समीकरण
आगामी 6 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल में रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं। इन सीटों पर पहले जीतने वाले नेताओं ने इस्तीफा दे दिया था, जिसके चलते यहां दोबारा मतदान की नौबत आई है। रेजीनगर सीट से जीतने वाले हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी को इस क्षेत्र से उपचुनाव लड़ने का खुला न्योता दिया था और उनकी जीत तय करने का दावा भी किया था। दूसरी ओर, प्रतिद्वंद्वी गुट का नेतृत्व कर रहे रिताब्रता बनर्जी के खेमे ने साफ कहा था कि यदि ममता खुद मैदान में उतरती हैं, तो वे नंदीग्राम में अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। इसके बावजूद, 71 वर्षीय नेता ने चुनाव से दूर रहने का ही निर्णय लिया है। रेजीनगर और नौदा जैसी ये दोनों सीटें मुर्शिदाबाद जिले में आती हैं, जहां मुस्लिम आबादी करीब 70 फीसदी के आसपास है। पिछले चुनावों में यहां सियासी समीकरण बदलते दिखे थे, जहां भाजपा दूसरे और तृणमूल तीसरे स्थान पर खिसक गई थी, जो राज्य में गहरे होते ध्रुवीकरण की साफ कहानी कहता है।
संगठन पर नियंत्रण की जंग और पारिवारिक दखل
सत्ता जाने के बाद से ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े और रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी तृणमूल गुट के बीच पार्टी के असली नाम और उसके ‘दो फूलों’ वाले चुनाव चिह्न पर मालिकाना हक पाने के लिए भीषण कानूनी व राजनीतिक संघर्ष चल रहा है। इस प्रतिष्ठित चुनाव चिह्न को खुद ममता ने ही डिजाइन किया था। पार्टी के भीतर से और बाहर जाने वाले नेताओं ने खुलकर इस बात की चर्चा की है कि सरकार और प्रशासन चलाने के भारी दबाव ने संगठन की पकड़ को कमजोर कर दिया था। हालांकि ममता ने कभी कड़ा रुख अपनाते हुए सार्वजनिक तौर पर नेताओं को डांटा और लीडरशिप कमेटियों को भंग करके दोबारा गठित किया, लेकिन ज्यादातर मौकों पर उन्हें अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के हाथों में संगठन की बागडोर जाते हुए बेबस देखना पड़ा। अब वह जमीनी स्तर से पार्टी को फिर से मजबूत करने की बात कह रही हैं, लेकिन अंदरूनी कलह और कानूनी लड़ाइयों ने उनकी राह को बेहद कांटेदार बना दिया है.
विपक्षी खेमे में नई गोलबंदी और कांग्रेस-लेफ्ट से नजदीकी
सत्ता से बेदखल होने और पार्टी में दोफाड़ होने के बाद, ममता बनर्जी ने अपने धुर विरोधियों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। उन्होंने उन कम्युनिस्टों और कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर नया समीकरण साधने की कोशिश शुरू कर दी है, जिनसे उनका रिश्ता 1998 में पूरी तरह टूट गया था। इसके साथ ही, वह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी इंडिया ब्लॉक को एकजुट करने की अपनी मुहिम में भी जुटी हुई हैं। हालांकि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी और एम.के. स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम जैसी क्षेत्रीय पार्टियां इस विपक्षी मंच से दूरी बना चुकी हैं, फिर भी कई नेताओं को पूरा भरोसा है कि ममता के व्यक्तिगत सियासी रिश्ते 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले तमाम दलों को एक मंच पर वापस ला सकते हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ममता अब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का चेहरा बनने के बजाय क्षेत्रीय राजनीति पर ही अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहती हैं, जबकि उनके अन्य रणनीतिकार इसे उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं की एक बड़ी सियासी चाल के रूप में देखते हैं.
भ्रष्टाचार के आरोप और भविष्य की चुनौतियां
पूर्ववर्ती सरकार के इन पंद्रह सालों के सफर पर अब धोखाधड़ी, गबन, रिश्वतखोरी, जबरन वसूली और तस्करी जैसे गंभीर और संगीन आरोपों के काले बादल मंडरा रहे हैं। इन तमाम विवादों ने तृणमूल कांग्रेस की साख को गहरा धक्का पहुंचाया है। एक तरफ जहां पार्टी के भीतर वर्चस्व की लड़ाई जारी है, वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी के सामने अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने की कठिन चुनौती है। बंगाल की राजनीति की यह नई चाल आने वाले समय में देश के राष्ट्रीय विपक्षी गठबंधन के भविष्य और राज्य की सियासत की दिशा तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी। जब तक ममता अपने संगठन पर पूरी तरह से नियंत्रण बहाल नहीं कर लेतीं, तब तक भाजपा के मजबूत सियासी रथ के पहियों को रोकना उनके लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।



















