पश्चिम बंगाल में समान नागरिक संहिता यानी UCC को अमलीजामा पहनाने की दिशा में कदम तेज कर दिए गए हैं। राज्य सरकार अगले छह महीने के भीतर उत्तराखंड और गुजरात के मॉडल को अपनाते हुए इस संहिता को प्रभावी बनाने की तैयारी में है। कोलकाता में विश्व हिंदू परिषद की एक सभा में यह घोषणा करते हुए स्पष्ट किया गया कि उत्तराखंड और गुजरात के बाद पश्चिम बंगाल ऐसा तीसरा राज्य बनने जा रहा है जो इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। नागरिक नियमों में एकरूपता लाने के अतिरिक्त राज्य में लव जिहाद, लैंड जिहाद और जबरन धर्मांतरण के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए अलग से कठोर वैधानिक प्रावधान भी लाए जाएंगे।
सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा और असामाजिक तत्वों पर सख्त रुख
सार्वजनिक मंच से बात रखते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने रेखांकित किया कि बीजेपी सरकार संवैधानिक दायरे में ही अपने सारे कामकाज करेगी, परंतु भारतीय संस्कृति, परंपराओं तथा मठ-मंदिरों पर होने वाले किसी भी प्रहार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि राज्य के भीतर किसी भी प्रकार की राष्ट्रविरोधी गतिविधि को पनपने की अनुमति नहीं मिलेगी। नागरिकों से एकता बनाए रखने और समाज को बांटने वाली शक्तियों के प्रति पूरी तरह सतर्क रहने की अपील की गई।
विहिप का रुख और मुस्लिम महिलाओं के अधिकार
समान नागरिक संहिता को लेकर विश्व हिंदू परिषद ने इस प्रशासनिक पहल का खुला समर्थन किया है। संगठन का मानना है कि नागरिक कानूनों के एक समान होने से प्रत्येक नागरिक के मूल अधिकारों की रक्षा होगी। संगठन के अनुसार, इस नए कानूनी ढांचे का सबसे सकारात्मक प्रभाव मुस्लिम महिलाओं के जीवन पर पड़ेगा, क्योंकि उन्हें व्यक्तिगत कानूनों के भेदभाव से मुक्ति मिलेगी और अधिकार सुरक्षित होंगे।
मसौदा समिति और प्रमुख चुनावी संकल्प
पश्चिम बंगाल में इस कानून का खाका खींचने के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। सरकारी अधिसूचना में उल्लेख किया गया है कि इस विधेयक का प्राथमिक लक्ष्य हर धर्म और समुदाय के लोगों के लिए सिविल कानूनों को एकसमान स्तर पर लाना है। इसके दायरे में मुख्य रूप से विवाह, तलाक, संपत्ति उत्तराधिकार और बच्चे को गोद लेने से संबंधित प्रावधान रखे गए हैं। वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने समान नागरिक संहिता को अपने प्रमुख चुनावी वादों की सूची में प्रमुखता से शामिल किया था।
नागरिक जीवन में बदलाव और समान कानून के प्रभाव
समान नागरिक संहिता के क्रियान्वयन से समाज और कानूनी व्यवस्था पर कई दूरगामी असर पड़ने की बात कही गई है
- धर्म और लिंग के भेदभाव को समाप्त कर प्रत्येक नागरिक को बराबरी का अधिकार मिलेगा और महिलाओं के पैतृक संपत्ति अधिकारों में एकरूपता आएगी।
- तलाक से जुड़े नियम सभी समुदायों पर एक समान तरीके से लागू होंगे, जिससे पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण प्रथाओं पर पूर्ण विराम लगेगा।
- एक देश और एक विधान का विचार सशक्त होगा, जिससे विभिन्न समुदायों के मध्य कानूनी असमानताएं और दूरियां घटेंगी।
- अलग-अलग पर्सनल लॉ की जटिलताएं समाप्त होने से सामाजिक सौहार्द बढ़ेगा और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकरण को मजबूती मिलेगी।
- अदालतों में दीवानी मुकदमों की सुनवाई की प्रक्रिया तेज तथा पारदर्शी बनेगी, जिससे मामलों के निस्तारण में लंबे समय से बना भ्रम समाप्त होगा।
देश के अन्य राज्यों में समान नागरिक संहिता की वर्तमान स्थिति
देश भर में समान नागरिक संहिता को लेकर विभिन्न राज्यों ने अलग-अलग कदम उठाए हैं
- गोवा में आजादी मिलने से पूर्व से ही एकसमान नागरिक संहिता प्रभावी है।
- उत्तराखंड में जनवरी 2025 से समान नागरिक संहिता को पूरी तरह लागू किया जा चुका है।
- गुजरात में समान नागरिक संहिता से संबंधित विधेयक को विधानसभा द्वारा मंजूरी मिल चुकी है।
- असम में भी यूसीसी से जुड़ा विधेयक विधानसभा पटल से पारित हो चुका है।
- मध्य प्रदेश की विधानसभा ने भी समान नागरिक संहिता के विधेयक को औपचारिक रूप से पारित कर दिया है।























