अगली बार जब आप दुनिया का नक्शा देखें तो ज़रा गौर से देखिएगा, क्योंकि बचपन से जो नक्शा हम सब देखते आए हैं वो अब बदलने वाला है। जमीन पर कुछ नहीं बदलेगा, न कोई सीमा खिसकेगी और न किसी देश की एक इंच ज़मीन कम होगी, लेकिन कागज़ पर महाद्वीपों का आकार-प्रकार अब ठीक होने वाला है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र ने मान लिया है कि क्लासरूम की दीवारों पर टंगा, किताबों में छपा और फोन के ऐप्स में बसा नक्शा करीब साढ़े चार सौ साल से दुनिया की सही तस्वीर नहीं दिखा रहा था।
न्यूयॉर्क में हुई वोटिंग
इस पुराने नक्शे को हटाने की मांग, जिसे तकनीकी भाषा में मर्केटर प्रोजेक्शन कहा जाता है, न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की महासभा तक पहुंच गई। पुराने नक्शे को छोड़ने का एक प्रस्ताव वोटिंग के लिए रखा गया, जिसके पक्ष में 164 देशों ने वोट डाला। सिर्फ अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया, जबकि 6 देशों ने कोई राय नहीं दी। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पास होने का मतलब यह नहीं कि किसी देश को तुरंत नक्शा बदलना पड़ेगा, क्योंकि ऐसा कोई नियम नहीं है कि स्कूल या सरकार किस नक्शे का इस्तेमाल करे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की मुहर का वजन होता है, इससे स्कूल-कॉलेजों, सरकारी दस्तावेज़ों, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और टेक कंपनियों के मैप ऐप्स तक में अब सुधरा हुआ नक्शा अपनाए जाने का रास्ता खुल गया है।
विवाद शुरू कहां से हुआ
यह मामला संयुक्त राष्ट्र में यूं ही नहीं पहुंचा, इसकी शुरुआत अफ्रीकी देशों की उस शिकायत से हुई जो बरसों से चली आ रही थी, कि आम इस्तेमाल होने वाला नक्शा अफ्रीका को असल से कहीं छोटा दिखाता है, उसे सिकोड़ कर और पिचका कर पेश करता है जबकि असल में यह महाद्वीप बहुत विशाल है। अफ्रीकी संघ ने इसे लेकर अभियान चलाया, टोगो ने औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र की महासभा में रखा, और फ्रांस ने इसका साथ दिया। उनकी दलील सिर्फ दिखावे भर की नहीं थी, उनका कहना था कि नक्शा केवल कागज़ का टुकड़ा नहीं होता, यह लोगों के दिमाग में दुनिया की जो तस्वीर बैठाता है वह लंबे समय तक बनी रहती है। एक बिगड़ा हुआ नक्शा चुपचाप यह धारणा बना देता है कि कौन सा इलाका बड़ा और अहम है और कौन सा छोटा और कमतर। इसी सोच से ऑनलाइन #correctthemap नाम का अभियान भी चला, जिसमें लोगों ने बताया कि अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और यूरोप का बड़ा हिस्सा मिलाकर भी अफ्रीका की रूपरेखा के भीतर समा जाएं तो जगह बच जाएगी, जो पुराना नक्शा देखकर कभी समझ नहीं आता।
गोल धरती को सपाट कागज़ पर उतारने की दिक्कत
नक्शा इस हाल में क्यों पहुंचा, यह समझने के लिए पहले उस बुनियादी मुश्किल को समझना होगा जिससे नक्शा बनाने वाले हमेशा जूझते रहे हैं, धरती संतरे की तरह गोल है जबकि नक्शा बनाना है सपाट कागज़ पर। किसी संतरे का छिलका एक टुकड़े में उतारकर टेबल पर सपाट बिछाने की कोशिश करें, तो वह ऊपर और नीचे से फट जाएगा, जबकि बीच का हिस्सा, जहां उभार सबसे ज़्यादा था, कमोबेश अपनी शक्ल बनाए रखेगा। धरती के नक्शे को सपाट करने में भी यही हुआ। भूमध्य रेखा के आसपास, जहां धरती सबसे ज़्यादा उभरी हुई है और जहां अफ्रीका मौजूद है, आकार लगभग सही बना रहा। लेकिन भूमध्य रेखा से दूर, उत्तरी ध्रुव की तरफ बढ़ते देशों को सपाट कागज़ पर भरने के लिए खींचना और फैलाना पड़ा, और यही खिंचाव है जिसकी वजह से रूस, ग्रीनलैंड और कनाडा नक्शे पर बहुत बड़े दिखते हैं।
इस नक्शे को बनाने वाला फ्लेमिश नक्शानवीस
जो सपाट नक्शा पूरी दुनिया में फैला, वह एक शख्स की देन है, गेरार्डस मर्केटर नाम के फ्लेमिश नक्शानवीस ने इसे 1569 में बनाया था, यही वजह है कि आज भी इसे मर्केटर प्रोजेक्शन कहा जाता है। मर्केटर का मकसद हर देश का सही आकार दिखाना नहीं था, वे एक अलग समस्या सुलझा रहे थे, समुद्री यात्रा की। उस दौर में समुद्र में निकलने वाले जहाज़ों को अपनी मंज़िल तक पहुंचने का सबसे छोटा और सीधा रास्ता चाहिए होता था, और मर्केटर के नक़्शे पर एक सीधी लाइन खींचकर और कंपस की सुई उसी दिशा में रखकर नाविक अपनी मंज़िल तक पहुंच सकते थे। समुद्री यात्रियों और जहाज़ चलाने वालों के लिए यह बेहद काम का औज़ार साबित हुआ, और यही वजह है कि यह नक्शा दुनिया भर में फैल गया, स्कूलों की दीवारों पर टंगा, किताबों में छपा और आगे चलकर आज के गूगल मैप्स जैसे टूल्स में भी शामिल हो गया।
आकार में कितना बड़ा फर्क है
दिक्कत यह है कि जिस प्रोजेक्शन ने कंपस से दिशा तय करना आसान बनाया, उसी ने देशों के आकार को बुरी तरह बिगाड़ भी दिया, और भूमध्य रेखा से जितना दूर जाएं, यह गड़बड़ी उतनी बढ़ती जाती है। मिसाल के तौर पर, आम नक्शे पर ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखता है, जबकि असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब चौदह गुना बड़ा है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका दोनों फूले हुए दिखते हैं, रूस और कनाडा अपने असली आकार से कहीं ज़्यादा फैले हुए नज़र आते हैं, जबकि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और भूमध्य रेखा के पास बसे देश असल से छोटे और सिकुड़े हुए दिखाए जाते रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो इस नक्शे ने साढ़े चार सौ साल तक यह धारणा बनाए रखी कि उत्तरी गोलार्ध में असल से ज़्यादा ज़मीन है, जबकि भूमध्य रेखा के पास के महाद्वीप कागज़ पर भले ही सिकुड़ गए हों, हकीकत में उनकी एक इंच ज़मीन भी कम नहीं हुई।
आगे क्या बदलेगा
यह नक्शा शुरुआत में सिर्फ एक काम के लिए बनाया गया था, समुद्र में जहाज़ों को दिशा दिखाने के लिए, लेकिन वक़्त के साथ यही दुनिया की डिफ़ॉल्ट तस्वीर बन गया और भूगोल की किताबों से लेकर खबरों तक हर जगह छा गया। अब संयुक्त राष्ट्र की महासभा में प्रस्ताव पास होने के बाद किसी भी देश पर तुरंत नक्शा बदलने की बाध्यता नहीं है, और अमेरिका पहले ही साफ कर चुका है कि वह इस बदलाव के पक्ष में नहीं है। इसके बावजूद, इस वोटिंग ने वह ज़मीन तैयार कर दी है जिस पर स्कूल-कॉलेज, सरकारी विभाग, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और डिजिटल मैप बनाने वाली टेक कंपनियां धीरे-धीरे उस नक्शे की तरफ बढ़ सकती हैं जो अफ्रीका जैसे महाद्वीपों का असली आकार दिखाए, न कि साढ़े चार सौ साल पहले नाविकों के लिए बनाए गए उस प्रोजेक्शन का, जिसे दुनिया अब तक देखती आई है। जिसने भी कभी दीवार पर टंगा नक्शा देखा है, स्कूल में भूगोल पढ़ा है या किसी किताब में दुनिया का नक़्शा पलटा है, उसके लिए यह बदलाव आखिरकार तस्वीर को असली धरती के करीब ले आएगा।



















