वैश्विक स्तर पर गहराते पर्यावरण संकट के बीच संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने एक अत्यधिक चिंताजनक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले कुछ ही वर्षों में पृथ्वी का वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की उस सुरक्षित सीमा को लांघ जाएगा, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित किया गया था। इस सीमा के टूटने का सीधा अर्थ यह है कि दुनिया भर के देशों को आने वाले कई दशकों तक विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं, समुद्र के जलस्तर में लगातार वृद्धि, बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने तथा जीव-जंतुओं की प्रजातियों के विलुप्त होने जैसे गंभीर संकटों का सामना करना पड़ेगा। वॉशिंगटन से सामने आए इस दस्तावेज ने स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती अब केवल भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की भयावह वास्तविकता बन चुकी है।
1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल करना अब क्यों कठिन हुआ
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की यह विस्तृत रिपोर्ट वर्ष 2015 के ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते के संदर्भ में तैयार की गई है। पेरिस समझौते का मुख्य ध्येय वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक काल के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना था। हालांकि वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, हमारी धरती पहले ही पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो चुकी है। अब केवल 0.1 डिग्री सेल्सियस का अंतर बचा है, जिसे बचा पाना वैश्विक उत्सर्जन दरों को देखते हुए लगभग असंभव सा लग रहा है।
तापमान वृद्धि के संभावित आंकड़े और भविष्य की रणनीति
रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रहना अब व्यवहारिक रूप से संभव नहीं रह गया है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के प्रयासों को रोकना नहीं चाहिए। इसके स्थान पर अब एक नई रणनीति अपनाने की सलाह दी जा रही है। इस रणनीति के तहत वैश्विक तापमान को पहले एक निश्चित स्तर तक बढ़ने की अनुमति दी जाएगी और उसके बाद व्यापक तकनीकी तथा प्राकृतिक प्रयासों के जरिए इसे धीरे-धीरे नीचे लाया जाएगा। आंकड़ों के अनुसार, इस शताब्दी के मध्य तक वैश्विक तापमान वृद्धि 1.8 डिग्री सेल्सियस के स्तर तक पहुंच सकती है। यदि वर्तमान में लागू नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया, तो वर्ष 2100 तक धरती का तापमान 2.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।
मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर पड़ने वाला दीर्घकालिक प्रभाव
वैज्ञानिकों का आंकलन है कि एक बार 1.5 डिग्री की सीमा पार हो जाने के बाद, पूरी मानव सभ्यता को कई दशकों तक एक अत्यधिक गर्म वातावरण में जीवन यापन करना होगा। इस अवधि के दौरान भीषण गर्मी की लहरें, बेमौसम मूसलाधार बारिश, भयंकर बाढ़, सूखा और विनाशकारी चक्रवातों की आवृत्ति में भारी वृद्धि होगी। इसका सबसे प्रतिकूल प्रभाव खाद्य सुरक्षा और जल संसाधनों पर पड़ेगा, जिससे अनाज का उत्पादन घटने लगेगा और पीने के पानी की भीषण किल्लत पैदा होगी। इसके साथ ही, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका अत्यधिक दबाव पड़ेगा। इस पर्यावरणीय आपदा का सबसे अधिक खामियाजा गरीब और विकासशील देशों की असहाय आबादी को भुगतना पड़ेगा। कई क्षेत्रों में हालात इतने बदतर हो जाएंगे कि वहां इंसान का रहना नामुमकिन हो जाएगा और उन इलाकों में बीमा कवरेज मिलना भी बंद हो जाएगा।
बर्फ की चादरों का पिघलना और अंटार्कटिका-ग्रीनलैंड का खतरा
इस रिपोर्ट में पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र में आने वाले कुछ अपरिवर्तनीय बदलावों के प्रति भी चेतावनी दी गई है। इनमें मुख्य रूप से पश्चिम अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में फैली बर्फ की विशाल चादरों का तेजी से पिघलना शामिल है। इसके अलावा, दक्षिण अमेरिका के विशाल अमेजन वर्षावनों के पारिस्थितिकी संतुलन में बड़ा नकारात्मक बदलाव आने की आशंका जताई गई है। जलवायु विज्ञानियों ने इस बात पर जोर दिया है कि तापमान में होने वाली प्रत्येक दशमलव डिग्री की अतिरिक्त वृद्धि तबाही के पैमाने को कई गुना बढ़ा देती है। यही वजह है कि 1.5 डिग्री की सीमा पार करने के बाद भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना बेहद अनिवार्य रहेगा।
कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीक और उत्सर्जन में कटौती
वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने के लिए केवल जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल को बंद करना ही पर्याप्त नहीं होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि वातावरण में पहले से मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालने की आधुनिक तकनीकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना होगा। यद्यपि वृक्षारोपण एक पारंपरिक और प्राकृतिक माध्यम है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल पेड़ लगाने से तापमान में बहुत मामूली गिरावट हासिल की जा सकती है। इसलिए, कार्बन कैप्चर और रिमूवल की नई वैज्ञानिक प्रणालियों का विकास और उनका शीघ्र कार्यान्वयन समय की मांग है।
नेपाल की हालिया आपदा: जलवायु परिवर्तन की भयावह झलक
जलवायु परिवर्तन के इस विनाशकारी प्रभाव का प्रत्यक्ष उदाहरण पड़ोसी देश नेपाल में देखने को मिला है। गत 26 अगस्त को नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने तबाही का मंज़र पैदा कर दिया। इस आपदा में 1 हजार से अधिक लोगों की जान जाने की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 5 हजार से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। राहत और बचाव कार्यों के लिए 20 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों और 20 से अधिक हेलिकॉप्टरों को तैनात किया गया है। संकट की इस घड़ी में नेपाल की सेना के साथ-साथ भारतीय सेना के जवान भी जोखिम भरे क्षेत्रों और सुरंगों में मलबे से लोगों को सुरक्षित निकालने के ऑपरेशन में जुटे हुए हैं।



















