बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय के सामने हालात लगातार गंभीर बने हुए हैं और डर, धमकी तथा असुरक्षा का माहौल गहराता जा रहा है। देश के सर्वोच्च न्यायालय की जानी-मानी वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता चैताली चक्रवर्ती ने एक इंटरव्यू के दौरान आशंका जताई है कि यदि मौजूदा हालात पर काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले एक दशक के भीतर बांग्लादेश से हिंदू आबादी पूरी तरह समाप्त हो सकती है।
साप्ताहिक पोर्टल को दिए इंटरव्यू में रखी बात
चैताली चक्रवर्ती ने यह गंभीर टिप्पणी 30 अगस्त को बांग्लादेश के समाचार पोर्टल वीकली ब्लिट्ज में प्रकाशित एक साक्षात्कार के दौरान की। उन्होंने संपादक सलाह उद्दीन शोएब चौधरी के साथ बातचीत में 5 अगस्त 2024 के बाद देश में हुए बड़े राजनीतिक बदलावों और उसके बाद उपजे हालात पर खुलकर चर्चा की। उनका कहना था कि संकट केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि देश का आम नागरिक भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है। हालांकि, हिंदुओं की धार्मिक पहचान उनके लिए एक अतिरिक्त चुनौती और संकट का कारण बन गई है, और जो लोग सार्वजनिक रूप से अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं, उन्हें गंभीर धमकियों का सामना करना पड़ता है।
अस्थिरता और सुरक्षा का संकट
वकील ने बातचीत में स्पष्ट किया कि 5 अगस्त के घटनाक्रम से लेकर अब तक देश में पूरी तरह से अस्थिरता का माहौल बना हुआ है और नागरिकों के पास किसी भी प्रकार की पुख्ता सुरक्षा नहीं है। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश के भीतर होने वाली सांप्रदायिक हिंसा, अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों और कमजोर होती कानून व्यवस्था को लेकर गहरी चिंता जताई जा रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मौजूदा हालात में केवल चुप रहना भी किसी की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं बनता है, जबकि मानवाधिकारों के हनन और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर सरकारी और सामाजिक दोनों स्तरों पर दबाव बढ़ जाता है.
बैंक खातों पर पाबंदियां और आर्थिक तंगी
चैताली चक्रवर्ती ने अपनी निजी परेशानियों का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हें किस तरह की प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। उनके और उनके परिवार के कई सदस्यों के बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया है अथवा उन पर ऐसी पाबंदियां लगा दी गईं हैं कि वे किसी भी तरह का वित्तीय लेन-देन नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रशासन की ओर से उन्हें अभी तक कोई भी ऐसा औपचारिक या लिखित आदेश नहीं दिया गया है जिसमें इन कार्रवाइयों का कोई कानूनी आधार या कारण बताया गया हो। अपनी आजीविका के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि वह पूरी तरह से अपने कानूनी पेशे पर निर्भर हैं और उन्हें किसी भी ऐसे गैरकानूनी काम की जानकारी नहीं है जिसके चलते उनके पैसों के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए। उन्होंने इस स्थिति को गंभीर आर्थिक समस्या करार देते हुए कहा कि यदि हालात नहीं सुधरे तो वह इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने और कानूनी कदम उठाने पर विचार कर रही हैं.
मोबाइल फोन पर लगातार उत्पीड़न और धमकियां
कानूनी काम करने वाली चैताली चक्रवर्ती को केवल वित्तीय मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि संचार के माध्यमों पर भी भारी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। उनके अनुसार उन्हें लगातार फोन कॉल्स के जरिए परेशान किया जाता था और फोन करने वाले लोग अश्लील भाषा का इस्तेमाल कर गालियां देते थे। इन हरकतों से तंग आकर उन्हें अपने उस सिम कार्ड को पूरी तरह से बंद करना पड़ा जिसका उपयोग वह पिछले कई वर्षों से कर रही थीं। उन्होंने बताया कि इस नंबर के बंद होने से उनके पेशेवर काम पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, क्योंकि उनके मुवक्किल और अन्य संपर्क इसी नंबर के जरिए उनसे बातचीत करते थे। जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने इस फोन उत्पीड़न की शिकायत पुलिस या साइबर क्राइम सेल में क्यों नहीं दर्ज कराई, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि लगातार मिल रही गालियों और धमकियों से परेशान होकर उन्होंने केवल फोन बंद करना ही उचित समझा और कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई।
रंगपुर में हिंदू परिवार की हत्या के मामले की जांच
साक्षात्कार के दौरान उन्होंने रंगपुर में एक हिंदू परिवार के चार सदस्यों की निर्मम हत्या के चर्चित मामले का भी उल्लेख किया। मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर वह इस सनसनीखेज घटना की अपने स्तर पर जांच कर रही थीं। उन्होंने बताया कि इलाके में इतना खौफ का माहौल है कि स्थानीय लोग इस घटना के बारे में कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। लोगों के मन में यह डर बैठा हुआ है कि यदि उन्होंने इस मामले में कुछ कहा, तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं और किसी प्रकार की बदले की कार्रवाई का शिकार होना पड़ सकता है। इस घटना की गंभीरता को रेखांकित करते हुए उन्होंने मांग की कि मामले की पूरी, निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि इसके पीछे किसी संगठित गिरोह या वैचारिक रूप से प्रेरित तत्वों का हाथ था या नहीं। हालांकि, इन तमाम पहलुओं पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के जरिए आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है.
प्रशासन और पुलिस व्यवस्था की नाकामी
चैताली चक्रवर्ती ने बांग्लादेश की प्रशासनिक व्यवस्था और पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर भी तीखे सवाल उठाए। हाल के दिनों में पुलिसकर्मियों पर हुए विभिन्न हमलों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब सुरक्षा बल खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ और कमजोर स्थिति में हैं, तो वे आम नागरिकों को प्रभावी सुरक्षा कैसे प्रदान कर सकते हैं। उनका तर्क था कि यदि देश का प्रशासनिक ढांचा मजबूत होता, तो आज इस तरह की विकट समस्याएं पैदा ही नहीं होतीं और सभी मुद्दों का समाधान आसानी से निकल जाता.
एक दशक में बांग्लादेश से हिंदुओं के सफाए की आशंका
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने हिंदू आबादी के भविष्य को लेकर सबसे डरावनी और गंभीर चेतावनी दी। उनका कहना था कि यदि देश में लगातार बढ़ रही हिंसा, भय और भेदभाव के चक्र को तुरंत नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में बांग्लादेश की डेमोग्राफी में भारी बदलाव आएगा और हिंदू आबादी तेजी से घटती चली जाएगी। उन्होंने कहा कि इस निरंतर असुरक्षा के कारण आम लोगों के सामने यह मजबूरी खड़ी हो रही है कि वे या तो अपनी पुरखों की जमीन छोड़कर हमेशा के लिए पलायन कर जाएं या फिर अत्यधिक जोखिम भरे माहौल में जीने को विवश रहें। यदि यही हालात बने रहे तो वह दिन दूर नहीं जब अगले दस वर्षों के भीतर यह देश लगभग हिंदू-विहीन हो जाएगा।
मातृभूमि छोड़ने की नहीं, बल्कि अधिकारों की लड़ाई
हालांकि इन तमाम डरावनी परिस्थितियों के बीच उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश का हिंदू समुदाय अपनी मर्जी से बांग्लादेश को छोड़कर नहीं जाना चाहता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह उनकी अपनी मातृभूमि है जहां उनके पिता, दादा और परिवार के कई पूर्वज पैदा हुए थे और पले-बढ़े हैं। उनकी मांग देश छोड़ने की नहीं है, बल्कि वे अपने देश में पूरी सुरक्षा, सम्मान और समान अधिकारों के साथ जीने की उम्मीद रखते हैं। बातचीत के अंत में उन्होंने बांग्लादेश में सदियों से चली आ रही हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच आपसी सद्भाव और साथ मिलकर रहने की पुरानी साझा परंपरा का भी विशेष रूप से स्मरण किया।




















