इस पूरी राजनीतिक उथल-पुथल का सार यह है कि एक तरफ जहां डोनाल्ड ट्रंप की हार का असर इज़रायल की राजनीति पर पड़ा है, वहीं बेंजामिन नेतन्याहू के प्रधानमंत्री पद से हटने के आसार भी साफ नजर आने लगे हैं। नेतन्याहू को सत्ता से बेदखल करने में इज़रायल के अरब नागरिकों की अहम भूमिका सामने आ रही है। यहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि इज़रायल तो यहूदियों का देश माना जाता है, तो फिर वहां रहने वाले ये बीस प्रतिशत अरब नागरिक कौन हैं? क्या इनका संबंध गाजा या वेस्ट बैंक से है? असल में ऐसा नहीं है, क्योंकि गाजा और वेस्ट बैंक के लोग इज़रायल के आम चुनावों में मतदान नहीं कर सकते हैं। तो फिर ये मतदाता कौन हैं और इन्होंने किस तरह से पूरा राजनीतिक गणित बदल दिया है, इसे गहराई से समझने की जरूरत है।
इज़रायल की संसद और सीटों का गणित
आम जनता को भी अब यह बात अच्छी तरह समझ आ गई है कि इज़रायल की संसद में कुल 120 सीटें हैं और इन चुनावों में मुख्य तौर पर तीन बड़े राजनीतिक धड़े मैदान में उतरे थे। पहला धड़ा बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन था, जिसमें पूरी तरह से यहूदी पार्टियां शामिल थीं। दूसरा गठबंधन गदी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाला था, जो भी यहूदी पार्टियों का ही एक समूह था। वहीं तीसरा और निर्णायक धड़ा अरब पार्टियों का था। सरकार के गठन के लिए जादुई आंकड़ा यानी कम से कम 61 सीटों की दरकार थी, जो किसी भी दल को अकेले या अपने गठबंधन के दम पर नहीं मिलीं। यहूदी पार्टियों में से नेतन्याहू के खेमे के हिस्से में 53 सीटें आईं, जबकि गदी आइज़ेनकोट वाले पक्ष को 48 सीटें हासिल हुईं। इसके अलावा बची हुई 19 सीटें अरब पार्टियों की झोली में गईं। स्पष्ट बहुमत यानी 61 का आंकड़ा किसी को भी नहीं मिला था।
गठबंधन की पेचीदगियां और बदलती समीकरण
ऐसी स्थिति में या तो दोनों यहूदी धड़े आपस में हाथ मिलाकर यहूदी एकता की सरकार का गठन करते, या फिर गदी आइज़ेनकोट का खेमा अरब पार्टियों का समर्थन हासिल करके सरकार बनाता। पेच यह फंसा हुआ था कि हमास की तरफ से हुए हमलों के बाद से तीन साल बीत जाने के बावजूद कोई भी यहूदी पार्टी सार्वजनिक रूप से अरब पार्टियों का समर्थन लेते हुए खुद को दिखाना नहीं चाहती थी। लेकिन जब अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी चुनाव हार गई, तो इज़रायल की यहूदी पार्टियों को भी स्पष्ट संदेश मिल गया। भले ही ट्रंप की विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी इज़रायल का समर्थन करती रहे, लेकिन वह नेतन्याहू के साथ खड़े होने को तैयार नहीं थी। अमरीका में ट्रंप की पार्टी के भीतर से भी यह आवाज उठने लगी थी कि नेतन्याहू ने ही अपनी जिद की वजह से ट्रंप को ईरान के युद्ध में घसीटा और इसी कारण उनकी हार हुई। अमरीकी समर्थन के बिना इज़रायल का चल पाना असंभव है, इसलिए यहूदी दल यह अच्छी तरह समझ गए कि अब नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद पर नहीं बनाए रखा जा सकता। दूसरी तरफ, अरब पार्टियों को भी भांपने में देर नहीं लगी कि नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने का यह स्वर्णिम अवसर है, और उन्होंने गदी आइज़ेनकोट का समर्थन करने का मन बना लिया। इस प्रकार, आइज़ेनकोट के पक्ष की 48 और अरब पार्टियों की 19 सीटों को मिलाकर कुल 120 सांसदों में से 67 ऐसे सांसद सामने आ गए जो आइज़ेनकोट को आसानी से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा सकते हैं।
इजरायल का भूगोल और अरब नागरिकों की स्थिति
इससे यह तो साफ हो गया कि नेतन्याहू का पत्ता कटता हुआ नजर आ रहा है, लेकिन आम जनता के मन में अब भी यह सवाल बना हुआ है कि इज़रायल की सीमा के भीतर आखिर ये अरब वोटर कौन हैं, जिन्होंने अरब पार्टियों को 19 सीटें जिता दीं और नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर संकट खड़ा कर दिया। इस बात को पूरी तरह समझने के लिए इज़रायल के इतिहास और भूगोल को खंगालना होगा। पिछले तीन वर्षों के दौरान वहां जिस तरह के हालात रहे हैं, उसके बाद दुनिया भर के लोगों ने इज़रायल के नक्शे को इतनी बार देखा है कि भूगोल का यह हिस्सा काफी हद तक साफ हो गया है। इज़रायल भूमध्य सागर यानी मेडिटरेनियन सी के तट पर बसा हुआ है। इसके उत्तर में लेबनान देश है, पूर्व की ओर ऊपर की तरफ सीरिया और उसके साथ जॉर्डन की सीमाएं लगती हैं। इज़रायल के दक्षिण में मिस्र यानी ईजिप्ट स्थित है। इसके अलावा इज़रायल की भौगोलिक सीमा के भीतर ही दो विशेष क्षेत्र मौजूद हैं, जिन्हें वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी के नाम से जाना जाता है। ये इलाके भौगोलिक रूप से इज़रायल के अंदर आते हैं, लेकिन प्रशासनिक रूप से इन्हें इज़रायल का हिस्सा नहीं माना जाता है।
पैलेस्टिनियन अथॉरिटी और असली अरब वोटर
ये क्षेत्र चारों तरफ से इज़रायल से घिरे हुए जरूर हैं, लेकिन इन्हें इज़रायल के दायरे में शुमार नहीं किया जाता है। इन इलाकों में जो अरब आबादी निवास करती है, उसने इन चुनावों में कोई मतदान नहीं किया है। इन जगहों पर मुख्य रूप से पैलेस्टिनियन अथॉरिटी यानी फ़िलीस्तीन अथॉरिटी का शासन चलता है। हालांकि सुरक्षा के लिहाज से इन पर कब्जा इज़रायल का ही रहता है, लेकिन शासन संचालन पैलेस्टिनियन अथॉरिटी के हाथ में होता है। फ़िलीस्तीन अथॉरिटी के तहत हुए साल 2006 के चुनावों में हमास ने जीत हासिल की थी। इस प्रकार, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी के अरब नागरिक तो वहीं के चुनावों में वोट डालते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इज़रायल की अरब पार्टियों को असल में वोट कौन देता है? इसका जवाब यह है कि वे इज़रायल के अपने मूल अरब नागरिक हैं, जो देश के भीतर कानूनी रूप से रहते हैं और मतदान का अधिकार रखते हैं।
इतिहास के पन्ने: यहूदियों की वापसी और ब्रिटिश राज
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ तक पहुंचने के लिए यह समझना जरूरी है कि इज़रायल का गठन आखिरकार कैसे हुआ था। यह वही ऐतिहासिक भूभाग है जहां से यहूदी धर्म की उत्पत्ति हुई थी। इसके काफी समय बाद ईसा मसीह यानी जीज़स क्राइस्ट का आगमन हुआ और बाद में इस्लाम धर्म आया। यह सब सदियों पुरानी बातें हैं। एक वक्त ऐसा आया जब इस क्षेत्र पर रोमन साम्राज्य का कब्जा हो गया और यहूदियों पर भारी अत्याचार किए गए, जिसके बाद उन्हें यहां से खदेड़ दिया गया और वे यूरोप के अलग-अलग हिस्सों में जाकर शरणार्थी के रूप में बस गए। हालांकि, इज़रायल हमेशा उनकी धार्मिक गाथाओं और स्मृतियों में उनकी अपनी मातृभूमि के रूप में जीवित रहा। समय बीतने के साथ पूरे अरब क्षेत्र पर तुर्की के ऑटोमन तुर्क साम्राज्य का आधिपत्य स्थापित हो गया, जिसके चलते इस इलाके पर भी उन्हीं का शासन था। इस भूभाग को फ़िलीस्तीन के नाम से जाना जाने लगा था, जो उस समय एक बंजर रेगिस्तान की तरह था। ऑटोमन तुर्कों का भी इस इलाके पर कभी बहुत ज्यादा ध्यान नहीं रहा, और वहां रेगिस्तान में केवल कुछ घुमंतू अरब कबीले ही रहा करते थे। इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध में तुर्क साम्राज्य की हार हो गई, और फ़िलीस्तीन का यह पूरा इलाका ब्रिटेन के नियंत्रण में आ गया। फिर साल 1917 में ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा की कि इस बंजर इलाके में दुनिया भर से आने वाले यहूदियों को बसाने के लिए जमीन उपलब्ध कराई जाएगी, जो भी यहां आना चाहे आ सकता है। इसकी मुख्य वजह यह थी कि दुनिया के कई देशों में यहूदियों को सताया जा रहा था और उन्हें जबरन भगाया जा रहा था। इसी ब्रिटिश शासन के दौरान यहूदी लोग यहां आकर धीरे-धीरे बसने लगे।
हिटलर का आतंक और देश के दो टुकड़े
इसके बाद जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों पर भयंकर जुल्म ढाने शुरू कर दिए, जिसके कारण पूरे यूरोप से यहूदियों को खदेड़ा जाने लगा। जान बचाकर भागने वाले कई यहूदी शरणार्थी फ़िलीस्तीन के इस बंजर रेगिस्तान में आकर बसने लगे। आगे चलकर द्वितीय विश्व युद्ध हुआ जिसमें हिटलर की हार हुई, लेकिन तब तक इस भूभाग पर बाहर से आए यहूदियों और यहां पहले से रह रहे अरबों के बीच तनाव काफी बढ़ चुका था। ब्रिटेन ने ठीक वही नीति अपनाई जो उसने भारत के मामले में की थी। जिस तरह वह भारत में देश के टुकड़े करके चला गया था, उसी तरह फ़िलीस्तीन में भी ब्रिटेन ने यह घोषणा कर दी कि वह अब यहां का शासन छोड़कर जा रहा है और इस क्षेत्र में दो अलग-अलग देश बना दिए जाएं, जिसमें एक देश यहूदियों का हो और दूसरा अरबों का हो।
संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव और मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य
इस बंटवारे के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र यानी UN के समक्ष भी रखा गया ताकि इस पर मुहर लग सके। यहूदी इस दो-राष्ट्र के प्रस्ताव के लिए पूरी तरह से तैयार और राजी थे, लेकिन अरब पक्ष ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि यह मंजूर नहीं है। इस तरह से यह ऐतिहासिक विवाद पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा, और आज यही पेचीदगियां इज़रायल की मौजूदा संसद और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक पतन की मुख्य वजह बनती जा रही हैं, जहां 20 लाख अरब मतदाता देश की सियासत की धुरी बन चुके हैं।



















