भूटान के दक्षिणी हिस्से में स्थित गेलेफू कस्बे के पास रविवार को एक अभूतपूर्व निर्माण कार्य पूरा किया गया, जहाँ करीब 40,000 स्वयंसेवकों ने मिलकर महज 12 घंटे के भीतर 108 विशाल स्तूपों के बाहरी ढांचे खड़े कर दिए। माओ छू नदी के तट पर आयोजित इस आध्यात्मिक व निर्माण अभियान को देखने के लिए विभिन्न बौद्ध परंपराओं के धर्मगुरुओं समेत लगभग 2,00,000 श्रद्धालु और आगंतुक एकत्रित हुए थे। यह पूरी कवायद भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक की दूरदर्शी योजना 'गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी' का एक केंद्रीय और प्रतीकात्मक आधारस्तंभ है। योजना के प्रबंधकों के अनुसार, निर्माण कार्य रविवार सुबह 2 बजे प्रारंभ हुआ था और दोपहर 2 बजे तक सभी 108 स्तूपों की बाह्य संरचना पूरी तरह स्थापित कर दी गई।
प्रीफैब्रिकेटेड तकनीक और 40 हजार स्वयंसेवकों का श्रमदान
इस बड़े पैमाने के निर्माण को निर्धारित 12 घंटों में अंजाम देने के लिए कई महीनों से तकनीकी योजना और स्टेजिंग की जा रही थी। कार्यस्थल पर निर्माण वेस्ट और सुरक्षात्मक हार्ड हैट पहने स्वयंसेवकों की टोलियों ने पहले से तैयार किए गए प्रीफैब्रिकेटेड हिस्सों को आपस में तेजी से जोड़ा। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि रविवार को केवल इन स्तूपों के बाहरी ढांचे मुकम्मल किए गए हैं, जबकि बाद के चरण में इन्हें पारंपरिक विधि से सील कर इनके भीतर प्रार्थनाएं, आशीर्वाद, पवित्र अवशेष और धार्मिक ग्रंथ स्थापित किए जाएंगे। यह प्रक्रिया हर स्तूप को प्रार्थना के एक स्थायी और भौतिक स्वरूप में रूपांतरित करेगी। रात के समय निर्माण स्थल के आसपास भारी भीड़ उमड़ी, जहाँ श्रद्धालुओं ने पीले रंग की चमकदार रोशनी वाली गेंदें हाथों में लेकर मंत्रोच्चार किया और स्तूपों के आधार पर नमन किया।
माइंडफुलनेस सिटी और भूटान की आर्थिक चुनौतियां
गेलेफू वर्तमान में भारत की सीमा से सटा हुआ लगभग 10,000 की आबादी वाला एक छोटा सा शहर है, जो राजधानी थिम्पू से दक्षिण की ओर करीब 240 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भूटान इस समय बढ़ती बेरोजगारी, घटती जन्मदर और विदेशों में हुनरमंद युवाओं के पलायन जैसी गंभीर सामाजिक व आर्थिक दिक्कतों से जूझ रहा है। समर्थकों का मानना है कि 'गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी' देश की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती देगी और स्थानीय युवाओं को स्वदेश में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराएगी। इस पूरे शहर की अवधारणा को डेनिश वास्तुकारों ने तैयार किया है। इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य एक ऐसे आर्थिक केंद्र की स्थापना करना है जो व्यावसायिक लाभ की तुलना में नागरिकों की प्रसन्नता और पर्यावरणीय स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
परियोजना 108 और वज्रयान परंपरा का महत्व
'प्रोजेक्ट 108' के तहत योजनाबद्ध किए गए ये सभी 108 स्तूप करीब 50 फीट ऊंचे हैं और इन्हें माओ छू नदी के समानांतर एक सीधी कतार में तैयार किया गया है। परियोजना से जुड़ी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, प्रत्येक स्तूप के बीच की दूरी लगभग 354 फीट रखी गई है, जिससे नदी किनारे इनका विहंगम दृश्य किसी भव्य आध्यात्मिक शोभायात्रा की तरह प्रतीत होता है। बौद्ध धर्म में 108 की संख्या को अत्यंत पवित्र माना जाता है। वज्रयान बौद्ध परंपरा में इन विशिष्ट संरचनाओं को 'जांगचूब चोर्तेन' के नाम से जाना जाता है। वज्रयान बौद्ध धर्म की एक प्रमुख शाखा है जिसका उदय 5वीं और 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास भारत में हुआ था, जो एक ही जीवनकाल के भीतर आत्मज्ञान प्राप्ति का मार्ग सिखाती है। आयोजकों ने रेखांकित किया कि ये स्तूप भगवान बुद्ध के ज्ञानोदय का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आध्यात्मिक दान और पर्यावरणीय निष्ठा
आयोजन को लेकर जारी बयान में जोर देकर कहा गया कि यह केवल एक इंजीनियरिंग का कमाल नहीं है, बल्कि बौद्ध परंपरा में चोर्तेन का निर्माण करना किसी व्यक्ति द्वारा किए जा सकने वाले सबसे पुण्य कार्यों में से एक माना जाता है। यह एक ऐसा आध्यात्मिक उपहार है जिसका लाभ केवल निर्माण करने वालों को ही नहीं, बल्कि इसके संपर्क में आने वाले हर इंसान को मिलता है, और यह प्रोजेक्ट समूचे विश्व के लिए एक सामूहिक समर्पण है। भूटान दुनिया का एकमात्र ऐसा संप्रभु राष्ट्र है जिसके संविधान में वज्रयान बौद्ध धर्म को राजधर्म घोषित किया गया है। यहाँ धर्म सीधे तौर पर शासन, संस्कृति और कानूनी व्यवस्था से गहराई से जुड़ा है। ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस (सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो नीति-निर्माण में विशुद्ध आर्थिक वृद्धि से ऊपर शांति और साझे कल्याण को रखता है। इसके अलावा, वज्रयान शिक्षाओं में प्रकृति को अत्यंत पवित्र माना जाता है और पहाड़ों, नदियों तथा जंगलों में प्राकृतिक शक्तियों का वास स्वीकार किया जाता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण एक धार्मिक कर्तव्य बन जाता है। भूटान में चोर्तेन निर्माण की यह परंपरा 2,500 साल से भी अधिक पुरानी है, जिसे मूल रूप से बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके पवित्र अवशेषों को संजोने के लिए शुरू किया गया था।
अंतरराष्ट्रीय धर्मगुरुओं की उपस्थिति और ऐतिहासिक क्षण
गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी के प्रवक्ता किन्ले दोरजी ने इस आयोजन को भूटान के इतिहास का एक अत्यंत गौरवशाली अध्याय बताया। दोरजी के अनुसार, स्तूपों का यह निर्माण स्थल भौगोलिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही वह बिंदु है जहाँ भारत के मैदानी इलाके आगे बढ़कर हिमालय पर्वतमाला से मिलते हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में कुछ हजार लोगों के आने की संभावना थी, मगर देखते ही देखते 1,00,000 से अधिक लोग एक साथ आ जुटे। दुनिया भर के बौद्ध मठों और मंदिरों से आए आध्यात्मिक गुरुओं ने इन नवस्थापित स्तूपों के लिए अनमोल भेंटें और आशीर्वाद अर्पित किए। समारोह में उपस्थित विशिष्ट अतिथियों में थेरवाद बौद्ध भिक्षु वेनेरेबल पन्नाकारा भी शामिल थे। पन्नाकारा ने इस वर्ष की शुरुआत में फोर्ट वर्थ, टेक्सास स्थित हुआंग दाओ विपश्यना भावना केंद्र से वॉशिंगटन, डी.सी. तक 2,300 मील लंबी और 108 दिनों तक चलने वाली शांति पदयात्रा पूरी की थी। इस प्रतिनिधिमंडल में मोस्ट वेनेरेबल रत्नगुणा भी शामिल थे। इस दल ने सोशल मीडिया पर अपनी भूटान यात्रा को एक पावन यात्रा बताया। पन्नाकारा ने निर्माण स्थल का वीडियो साझा करते हुए पुष्टि की कि यह काम निर्धारित समय से करीब चार घंटे पहले, लगभग 12 घंटे में ही पूरा कर लिया गया था।






















