पश्चिम एशिया के अशांत माहौल में अपनी कूटनीतिक साख बचाने और मध्यस्थ की भूमिका तलाशने की पाकिस्तान की कोशिशें एक अत्यंत जटिल चौराहे पर पहुंच गई हैं. इस्लामाबाद के सामने एक तरफ ईरान के साथ सीमाई अविश्वास और व्यापारिक रुकावटें हैं, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब के साथ उसके सैन्य रक्षा समझौते की नई प्रतिबद्धताएं सामने आ रही हैं. इसके साथ ही अमेरिका के साथ व्यावहारिक संतुलन बनाए रखने की रणनीतिक मजबूरी ने पाकिस्तानी नेतृत्व के नीतिगत फैसलों में गहरे अंतर्विरोध पैदा कर दिए हैं. क्षेत्रीय समीकरणों में आई तेजी के बीच इस्लामाबाद के लिए सुरक्षा, अर्थनीति और कूटनीति के धागों को एक साथ थामना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है.
तेहरान में कूटनीतिक मिशन और जमीनी व्यापारिक गतिरोध
पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने 20 अक्टूबर को तेहरान का दौरा किया था. इस उच्चस्तरीय यात्रा का मुख्य मकसद पश्चिम एशिया के वर्तमान तनावपूर्ण परिदृश्य में पाकिस्तान की भूमिका को सक्रिय मध्यस्थ के रूप में आगे बढ़ाना था. हालांकि यह कूटनीतिक कवायद जिस पृष्ठभूमि में हुई, उसने जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया. मुनीर की तेहरान रवानगी के वक्त ही दोनों देशों की साझी सीमा पर तफ्तान और गबद-रिमदान चौकियों पर वाणिज्यिक आवाजाही पूरी तरह बाधित हो चुकी थी. इस निलंबन के चलते लगभग 2,000 व्यापारिक ट्रक सीमा पर ही जाम होकर खड़े रह गए, जिसने दोनों मुल्कों के स्थानीय कारोबारियों और आयातकों के सामने भारी आर्थिक संकट खड़ा कर दिया.
सीमा पर लगे इस अघोषित विराम को लेकर दोनों राजधानियों ने अलग-अलग रुख पेश किए. इस्लामाबाद ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चिंताओं, अवैध तस्करी की रोकथाम और सीमा निगरानी के सख्त तंत्र को आवाजाही रोकने की मुख्य वजह करार दिया. इसके विपरीत, ईरानी अधिकारियों ने इसे मात्र एक अस्थायी तकनीकी अड़चन और एहतियाती प्रशासनिक कदम बताया. दोनों पक्षों के बयानों में मौजूद यह बुनियादी अंतर दर्शाता है कि कूटनीतिक मुस्कानों के नीचे सीमा प्रबंधन से जुड़ी गंभीर खींचतान अब भी बरकरार है.
सऊदी रक्षा तंत्र में भागीदारी और तेहरान की चिंताएं
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक पेंच सऊदी अरब के साथ उसकी रक्षात्मक साझेदारी से जुड़ा है. यमन में हूती विद्रोहियों के हमलों में तेजी आने के बाद 5 अक्टूबर को पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा समझौते को औपचारिक रूप से सक्रिय किया गया था. इस कदम ने रियाद के समग्र सुरक्षा ढांचे में पाकिस्तान की प्रत्यक्ष और परोक्ष हिस्सेदारी को अधिक स्पष्ट कर दिया. स्थिति की संवेदनशीलता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि फील्ड मार्शल असीम मुनीर की तेहरान यात्रा से ठीक एक दिन पहले पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व ने सऊदी अरब के राजदूत के साथ रणनीतिक समन्वय और रक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए की गई आधिकारिक बातचीत का ब्योरा सार्वजनिक किया था.
इस पूरे मामले पर अपना बचाव करते हुए इस्लामाबाद का लगातार यह कहना रहा है कि सऊदी अरब की जमीन पर तैनात उसके सैन्यकर्मी केवल विशुद्ध रक्षात्मक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं और वे यमन में होने वाले किसी भी सक्रिय सैन्य अभियान में भाग नहीं लेंगे. इस औपचारिक स्पष्टीकरण के बावजूद, रियाद के साथ पाकिस्तान के बढ़ते सामरिक तालमेल को तेहरान में हमेशा असहज नजरिए से देखा जाता रहा है, जिससे दोनों पड़ोसियों के बीच रणनीतिक विश्वास बहाली की प्रक्रिया और अधिक उलझ गई है.
सीमावर्ती मार्गों का आर्थिक गणित और प्रतिबंधों का पेंच
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ अपनी औपचारिक मुलाकात के दौरान पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख ने सीमाई अड़चनों को दूर करने और दोनों देशों के बीच वाणिज्यिक आवाजाही को जल्द बहाल करने का भरोसा दिलाया था. यह वार्ता केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी, क्योंकि ईरान और पाकिस्तान के बीच जमीनी रास्ते अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक धुरी का काम करते हैं. वर्तमान समय में जब समुद्री व्यापारिक मार्गों पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों का दबाव लगातार गहरा रहा है, तेहरान के लिए जीवन रक्षक और जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने के वास्ते यह जमीनी गलियारा बेहद अहम हो गया है. यद्यपि ये सड़क मार्ग विशाल समुद्री बंदरगाहों की क्षमता की पूरी भरपाई नहीं कर सकते, फिर भी वे प्रतिबंधों से घिरे ईरानी बाजार को जरूरी सहारा और स्थानीय आबादी को आजीविका प्रदान करते हैं.
इससे पहले पाकिस्तान ने अपनी अधिसूचित सीमा चौकियों के जरिए तीसरे देशों के सामान को ईरान तक ले जाने की विशेष छूट दे रखी थी. लेकिन हालिया दिनों में अचानक सीमा सील किए जाने के फैसले ने यह उजागर कर दिया कि सीमा पार व्यापारिक व्यवस्थाएं क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक फैसलों के सामने कितनी कमजोर हैं. दूसरी तरफ, प्रतिबंधों के अनुपालन को लेकर इस्लामाबाद का रुख भी लगातार अस्पष्ट बना हुआ है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने यह बयान तो दिया कि इस्लामाबाद लागू प्रतिबंध व्यवस्था का पालन करेगा, लेकिन उसने यह स्पष्ट करने से परहेज किया कि वह वास्तव में किन पाबंदियों को लागू कर रहा है. नीतिगत स्तर पर कायम इस अनिश्चितता ने सीमा पार व्यापार में पूंजी लगाने वाले व्यापारियों और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए भारी वित्तीय जोखिम पैदा कर दिया है.
अमेरिकी दबाव की चर्चा और तेहरान का सख्त रुख
सीमा चौकियों के अचानक बंद होने के बाद क्षेत्रीय विश्लेषकों में यह चर्चा भी शुरू हुई कि क्या इस्लामाबाद ने यह फैसला वाशिंगटन के इशारे पर लिया था. हालांकि उपलब्ध घटनाक्रम और तथ्य इस बात की कतई पुष्टि नहीं करते कि अमेरिका ने पाकिस्तान को दोनों सीमा चौकियां बंद करने का कोई सीधा निर्देश जारी किया था. पाकिस्तान अपने स्तर पर अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाए रखने की कोशिश में जुटा है, जबकि दूसरी ओर ईरान ने वाशिंगटन के साथ किसी भी कूटनीतिक संवाद को लेकर अपनी शर्तों को बेहद सख्त कर रखा है.
ईरानी नेतृत्व ने दो टूक शब्दों में दोहराया है कि जब तक तेहरान की बुनियादी मांगों पर सकारात्मक प्रगति नहीं होती, तब तक अमेरिका के साथ कोई सार्थक बातचीत शुरू नहीं हो सकती. ईरान की इन शर्तों में आर्थिक नाकेबंदी को पूरी तरह समाप्त करना, तेल निर्यात पर लगे सभी प्रतिबंधों से फौरी राहत देना और क्षेत्रीय स्तर पर शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयों को रोकना शामिल है. इसके साथ ही ईरान के सुरक्षा अधिकारी मोहसेन रजाई ने भी सार्वजनिक तौर पर घोषणा की कि देश की समृद्ध परमाणु सामग्री किसी भी कीमत पर बाहर नहीं जाएगी और वह ईरान की धरती पर ही सुरक्षित रहेगी. इस कड़े ईरानी रुख ने इस्लामाबाद के लिए किसी भी तरह की मध्यस्थता की गुंजाइश को लगभग नगण्य बना दिया है.
बलूचिस्तान में अस्थिरता और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर आघात
पाकिस्तान और ईरान के संबंधों में कूटनीति के अलावा सबसे संवेदनशील पहलू बलूचिस्तान प्रांत का सुरक्षा परिदृश्य है. बलूचिस्तान में लंबे समय से हिंसक राष्ट्रवादी उग्रवाद जारी है, जबकि सीमा के दोनों तरफ सक्रिय सशस्त्र गिरोह ईरानी सुरक्षा बलों के लिए भी लगातार सिरदर्द बने रहे हैं. जनवरी 2024 में दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे के संप्रभु क्षेत्रों में किए गए मिसाइल और हवाई हमलों की मिसाल यह साबित करने के लिए काफी है कि सीमाई अविश्वास कितनी जल्दी सीधे सैन्य टकराव का रूप ले सकता है.
इस पूरे भू-राजनीतिक टकराव का सबसे दर्दनाक और प्रत्यक्ष खामियाजा सीमावर्ती इलाकों की आम जनता और छोटे कारोबारियों को भुगतना पड़ता है. तफ्तान और गबद-रिमदान चौकियों पर व्यापार ठप होने से हजारों ट्रक चालक रेगिस्तानी इलाकों में भीषण परिस्थितियों में फंसे रहे. ट्रकों में लदे शीघ्र खराब होने वाले फल, सब्जियां और खाद्य उत्पाद बर्बाद हो गए, जिससे व्यापारियों को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ा. परिवहन लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी और आजीविका के अवसरों का खत्म होना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता के गलियारों में लिए गए सामरिक फैसले जमीन पर काम करने वाले निर्दोष लोगों के जीवन को किस कदर प्रभावित करते हैं.



















