देश की राजधानी में आयोजित विपक्षी दलों के शक्ति प्रदर्शन के दौरान भारतीय राजनीति का एक बिल्कुल नया अध्याय देखने को मिला। दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में कथित वोट चोरी के विरोध में जुटी विपक्षी पार्टियों के मंच पर तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी के बदले हुए सियासी अंदाज ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचा। लंबे अरसे तक राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस को तवज्जो न देने वाली और केवल अपने प्रांतीय जनाधार पर भरोसा करने वाली ममता बनर्जी अब विपक्षी एकता की धुरी को मजबूती देने के लिए पुराने मतभेदों को पीछे छोड़ती नजर आ रही हैं।
मंच से रिश्तों की नई परिभाषा और पुराना आदर
सार्वजनिक मंच पर पहुंचते ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का रुख पूरी तरह बदला हुआ दिखा। उन्होंने सोनिया गांधी के ठीक बगल में अपनी जगह बनाई और अपने संबोधन की शुरुआत बेहद सम्मानजनक अंदाज में करते हुए कहा,
‘‘मेरी नेता सोनिया जी को मेरा नमस्ते।’’कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष के प्रति इस तरह का आदर भाव यह स्पष्ट करता है कि शीर्ष स्तर पर दोनों दलों के रिश्ते अब नई दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की सराहना करते हुए उन्हें संघर्षरत युवा चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया।
इतना ही नहीं, इस सभा में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला क्षण वह था जब ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में दशकों तक अपनी धुर विरोधी रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष नेता और महासचिव एम ए बेबी का नाम मंच से सार्वजनिक तौर पर पुकारा। इसके साथ ही उन्होंने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का उल्लेख करते हुए भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक अभेद्य विपक्षी मोर्चा तैयार करने का सीधा संदेश दिया।
रणनीतिक मजबूरियां और जमीनी हकीकत
सियासी विश्लेषकों का आकलन है कि तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच यह नजदीकी महज औपचारिकता नहीं, बल्कि बदले हुए राजनीतिक घटनाक्रमों का स्वाभाविक परिणाम है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान और उसके बाद दोनों पार्टियों के बीच पारंपरिक मतदाताओं को लेकर भारी खींचतान चलती रही थी। राज्य स्तर पर कार्यकर्ताओं का टकराव और राष्ट्रीय पटल पर सीटों के बंटवारे को लेकर उपजी तल्खी किसी से छिपी नहीं थी।
इस जमीनी तल्खी के बावजूद जब विधानसभा चुनावों के उपरांत चुनाव प्रक्रिया और नतीजों को लेकर सवाल खड़े किए गए, तब राहुल गांधी ने खुलकर ममता बनर्जी का साथ दिया था। इस शुरुआती समर्थन के बाद राष्ट्रीय राजधानी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ ममता बनर्जी की बंद कमरों में सिलसिलेवार बातचीत हुई। इन आंतरिक मुलाकातों ने दोनों दलों के बीच वर्षों से जमी राजनीतिक बर्फ को पिघलाने में अहम भूमिका निभाई और अविश्वास की खाई को पाटने का काम किया।
राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी एकजुटता के मायने
क्षेत्रीय राजनीति में पूरी तरह दबदबा बनाए रखने वाली ममता बनर्जी का यह रणनीतिक यू-टर्न बताता है कि वह अब स्थानीय महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर वृहद गठजोड़ को जरूरी मान रही हैं। सत्ताधारी दल के विरुद्ध आगामी आम चुनावों और नीतिगत लड़ाइयों में कांग्रेस जैसी अखिल भारतीय पार्टी को किनारे रखकर आगे बढ़ना जोखिम भरा साबित हो सकता था।
सोनिया गांधी को अपनी नेता स्वीकार करने और वामपंथी नेताओं के साथ एक मंच साझा करने की यह पहल दर्शाती है कि लोकतांत्रिक राजनीति में कोई भी शत्रुता स्थायी नहीं होती। समय और परिस्थितियों के अनुकूल दोनों पक्षों ने अपने वैचारिक और रणनीतिक तालमेल को दुरुस्त कर लिया है, जिससे पूरे विपक्षी खेमे में नए उत्साह का संचार हुआ है।



















