भारत की राजधानी में इस हफ्ते दुनिया के सबसे ताकतवर नेता एक मंच पर जुटने वाले हैं क्योंकि दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान इस आयोजन में शामिल हो रहे हैं. औपचारिक तौर पर बातचीत का दायरा खेती-बाड़ी, स्वास्थ्य क्षेत्र और डिजिटल सहयोग तक सीमित रखा गया है, मगर इस चमक-दमक की आड़ में एक बिल्कुल अलग रणनीतिक खेल आकार ले रहा है. ठीक इसी वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ऐसी योजना पर काम कर रहे हैं जिसमें वे मॉस्को और बीजिंग को साथ लेकर एक तीन देशों वाला अलग गठबंधन, यानी G3, खड़ा करना चाहते हैं.
दिल्ली में जुटेंगे दुनिया के दिग्गज नेता
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग साल 2019 के बाद पहली बार भारत की धरती पर कदम रख रहे हैं, इसलिए हर किसी की नजर उनकी और पीएम मोदी की मुलाकात पर है. पिछले कुछ बरसों से दोनों पड़ोसी मुल्कों के रिश्तों में सीमा को लेकर तनाव और कारोबारी मोर्चे पर खींचतान बनी रही है. यही वजह है कि माना जा रहा है कि यह सम्मेलन दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को कुछ हद तक पिघला सकता है और व्यापार को दोबारा सही दिशा में ला सकता है. इसके अलावा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान का इस बार सम्मेलन में हिस्सा लेना भी इसकी अहमियत को और बढ़ा रहा है.
ब्रिक्स के भीतर बढ़ती खींचतान
ब्रिक्स संगठन लंबे समय से खुद को पश्चिमी देशों की बादशाहत को चुनौती देने वाले एक विकल्प के रूप में पेश करता रहा है, लेकिन जैसे-जैसे इसमें नए सदस्य जुड़े हैं, इसके भीतर की दरारें भी उतनी ही साफ नजर आने लगी हैं. फिलहाल ईरान और यूएई के बीच रिश्तों में खटास है. ईरान की मांग है कि ब्रिक्स का यह मंच अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों पर कड़ा और साफ रुख अपनाए. दूसरी ओर यूएई इस विवाद में उलझने की बजाय अपने समुद्री रास्तों और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कार्गो जहाजों की हिफाजत को प्राथमिकता दे रहा है. इसी असहमति के चलते मई में दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद कोई सामूहिक वक्तव्य जारी नहीं हो पाया था.
ट्रंप का G3 दांव: रूस-चीन को साधने की कोशिश
एक तरफ ब्रिक्स अपने ही सदस्यों के बीच मतभेदों से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ वाशिंगटन, बीजिंग और मॉस्को के त्रिकोण में कुछ नया आकार ले रहा है. डोनाल्ड ट्रंप की लंबे समय से यह सोच रही है कि अगर वे खुद पुतिन और शी जिनपिंग से आमने-सामने बातचीत करें, तो दुनिया के बड़े-बड़े झगड़े जल्दी सुलझाए जा सकते हैं. मगर ट्रंप की इस निजी शैली की कूटनीति ने खुद अमेरिका के विदेश विभाग, वहां की संसद और उसके यूरोपीय साथी देशों को असहज कर दिया है. यूरोप को आशंका है कि ट्रंप, यूक्रेन और यूरोपीय महाद्वीप की सुरक्षा को कमजोर करते हुए रूस के साथ समझौता कर सकते हैं. वहीं एशिया के देशों को यह डर सता रहा है कि चीन के साथ किसी बड़े सौदे की चाहत में अमेरिका इस क्षेत्र को दिए अपने सुरक्षा भरोसे से पीछे न हट जाए.
पुतिन की मजबूरी, शी की मजबूती
रूसी राष्ट्रपति पुतिन के पास भी अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने के अपने ठोस कारण हैं. यूक्रेन के साथ करीब साढ़े चार वर्षों से चल रही जंग ने रूसी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया है और युद्ध के मैदान में भी कोई निर्णायक बढ़त नजर नहीं आ रही. इसके उलट, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की स्थिति फिलहाल कहीं अधिक मजबूत मानी जा रही है. वे बिश्केक, काहिरा और दिल्ली की यात्राओं के तुरंत बाद सीधे व्हाइट हाउस जाने की योजना बना रहे हैं. इसी बीच क्रेमलिन ने यह स्वीकार किया है कि पुतिन और शी जिनपिंग के बीच नवंबर में शेनजेन में प्रस्तावित APEC सम्मेलन के मौके पर ट्रंप के साथ तीनों देशों की एक साझा बैठक कराने पर बातचीत हुई है.
याल्टा सिस्टम के खात्मे का खतरा
अगर सच में अमेरिका, रूस और चीन एक साझा मेज पर बैठ जाते हैं, तो इसका मतलब होगा दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी उस व्यवस्था का अंत जिसे याल्टा सिस्टम कहा जाता है और जिसने संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद को जन्म दिया था. यह सिर्फ एक कूटनीतिक फेरबदल भर नहीं होगा, बल्कि दशकों पुराने वैश्विक सत्ता संतुलन को फिर से लिखने जैसा कदम माना जाएगा.
भारत के लिए तीन रास्ते
अगर ट्रंप का यह G3 प्लान आगे बढ़ता है, तो भारत के सामने खुद को इस नए समीकरण में अप्रासंगिक होने से बचाने के तीन बड़े रास्ते हो सकते हैं.
- आर्थिक ताकत बढ़ाना: भारत अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास की गति तेज करके खुद को इतना सशक्त बना सकता है कि G3 का कोई भी सदस्य देश उसे नजरअंदाज करने की स्थिति में न रहे.
- व्यावहारिक और चतुर कूटनीति: जिस तरह रूस और चीन ब्रिक्स का हिस्सा रहते हुए भी अमेरिका के साथ सीधा फायदा उठाते हैं, उसी तरह भारत भी हर बड़ी शक्ति से अपने हितों के मुताबिक सीधे रिश्ते बनाकर वैश्विक मंच पर अपनी पकड़ मजबूत रख सकता है.
- मध्यम शक्तियों का नया मोर्चा: भारत, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील जैसे देशों को साथ जोड़कर एक नया समूह खड़ा कर सकता है, ऐसे देश जो दुनिया की बागडोर सिर्फ तीन शक्तियों के हाथ में सिमटते नहीं देखना चाहते.





















