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FATF समीक्षा से पहले मसूद अजहर और हाफिज सईद पर पाकिस्तानी दावों की टीवी डिबेट में खुली पोलदुनिया
15 सित॰ 2026, 6:49 pm (45 दिन पहले)· 1

FATF समीक्षा से पहले मसूद अजहर और हाफिज सईद पर पाकिस्तानी दावों की टीवी डिबेट में खुली पोल

आगामी FATF समीक्षा को लेकर एक लाइव टीवी डिबेट में मसूद अजहर और हाफिज सईद जैसे आतंकियों को छुपाने के पाकिस्तान के दावों को भारतीय पैनलिस्टों और एंकर ने पूरी तरह खारिज कर दिया।

हाल ही में एक टेलीविजन डिबेट शो के दौरान आगामी FATF समीक्षा को लेकर भारतीय और पाकिस्तानी पैनलिस्टों के बीच जबरदस्त तीखी बहस देखने को मिली। इस चर्चा का मुख्य केंद्र बिंदु यह था कि पाकिस्तान खुद को वैश्विक संस्था की ग्रे लिस्ट से बचाने के लिए किस प्रकार की रणनीतियां अपना रहा है और साथ ही वह अपनी सरजमीं पर सक्रिय अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने में किस तरह नाकाम रहा है। इस गरमागरम बहस ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच के कूटनीतिक और रणनीतिक तनाव को एक बार फिर से सतह पर ला दिया, जहां भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने पाकिस्तानी तंत्र द्वारा आतंकवादी सरगनाओं को दिए जा रहे सुरक्षित पनाहगाहों की पोल खोलकर रख दी।

FATF समीक्षा और टेरर फंडिंग को लेकर तीखी तकरार

इस चर्चा की शुरुआत पाकिस्तानी पत्रकार राजा फैजल से पूछे गए एक सीधे और तीखे सवाल के साथ हुई। उनसे पूछा गया कि क्या पाकिस्तान केवल दिखावे के लिए आतंकियों की निगरानी से जुड़ी वित्तीय सीमाओं या पेनाल्टी को 50 से बढ़ाकर 70 कर रहा है, ताकि आने वाली FATF समीक्षा के दौरान खुद का बचाव किया जा सके। सवाल में इस बात पर भी हैरानी जताई गई कि एक तरफ इस्लामाबाद का दावा है कि उसे इमरान मसूद जैसे आतंकियों के ठिकानों की कोई जानकारी नहीं है, वहीं दूसरी तरफ देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार ऐसी खबरें आती रहती हैं कि वह खुलेआम घूम रहा है और रैलियों को संबोधित कर रहा है। बहस के इस पहले हिस्से ने ही पूरी डिबेट का रुख तय कर दिया और पाकिस्तान के आधिकारिक बयानों व जमीनी हकीकत के बीच के बड़े अंतर को सबके सामने रख दिया।

आतंकवादियों की लोकेशन पर पाकिस्तानी पत्रकार के अजीब दावे

इन तीखे सवालों के जवाब में पाकिस्तानी पत्रकार राजा फैजल ने यह अजीबोगरीब दावा किया कि इन आतंकियों का पाकिस्तान की धरती पर कोई अस्तित्व ही नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि ये आतंकवादी पाकिस्तान में सक्रिय होते, तो क्षेत्र में अमेरिकी सेना की लंबी मौजूदगी के दौरान ही उनका पता चल गया होता। उन्होंने आगे कयास लगाते हुए कहा कि ये आतंकी शायद बोको हराम, अल-शबाब या आईएसआईएस जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों के साथ मिल चुके हैं। अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए फैजल ने यह भी दावा कर दिया कि चूंकि वर्तमान समय में नई दिल्ली के अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ बेहतर संबंध हैं, इसलिए भारतीय एजेंसियां मसूद अजहर के सटीक ठिकाने का पता लगाने के लिए कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं।

विदेशी ताकतों पर पाकिस्तान की निर्भरता पर एंकर का निशाना

पाकिस्तानी पत्रकार के इस तर्क पर कार्यक्रम की एंकर ने कड़ा विरोध जताया और कहा कि पाकिस्तान के कई राजनीतिक विश्लेषक व्यक्तिगत रूप से इन आतंकवादियों को जानते हैं, लेकिन वे कैमरे के सामने इस सच को स्वीकार नहीं करेंगे। एंकर ने ध्यान दिलाया कि अक्टूबर के महीने में जब FATF की एक विशेष टीम समीक्षा के लिए पाकिस्तान का दौरा करेगी, तब असलियत पूरी दुनिया के सामने आ जाएगी। इसके साथ ही एंकर ने विदेशी ताकतों, विशेष रूप से अमेरिका के निर्देशों पर चलने के लिए पाकिस्तान की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी पैनलिस्टों को इतिहास और तथ्यों की सही जानकारी नहीं है। भारत के गौरवशाली 5000 साल पुराने इतिहास का उल्लेख करते हुए एंकर ने याद दिलाया कि पाकिस्तान आखिरकार भारत की ही धरती से अलग होकर अस्तित्व में आया है।

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने उजागर किया पाकिस्तान का दोहरा रवैया

बहस में हिस्सा ले रहे भारतीय रक्षा विशेषज्ञों, जिनमें मेजर जनरल ए के सिवाच और कर्नल दानवीर शामिल थे, ने पाकिस्तानी वक्ताओं के दावों की पूरी तरह से धज्जियां उड़ा दीं। इन विशेषज्ञों ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान की दोहरी नीतियों को उजागर करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कही:

  • ग्रे लिस्ट और अमेरिकी मदद की गुहार: विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि पिछली बार पाकिस्तान केवल अमेरिका के सामने कूटनीतिक गुहार लगाने के बाद ही FATF की ग्रे लिस्ट से बाहर निकल पाया था। हालांकि, कड़े आर्थिक प्रतिबंधों से बचने के बावजूद इस्लामाबाद के सैन्य और कूटनीतिक नेतृत्व ने अपनी पुरानी आदतों में कोई सुधार नहीं किया है और वे लगातार आतंकी समूहों को पाल रहे हैं।
  • आतंकवाद का दंश और गृहयुद्ध की स्थिति: भारतीय विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि जिस आतंकवाद को पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए पाला था, वह अब खुद उसके अपने अस्तित्व के लिए खतरा बन चुका है। इसका असर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के मुजफ्फराबाद और मीरपुर जैसे क्षेत्रों में साफ देखा जा सकता है, जहां बुनियादी अधिकारों के लिए आम जनता सड़कों पर है और वहां गृहयुद्ध जैसे हालात बन रहे हैं।
  • रणनीतिक संपत्ति के रूप में आतंकी: रक्षा विश्लेषकों ने कहा कि मसूद अजहर और हाफिज सईद जैसे कुख्यात आतंकियों को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने बेहद सुरक्षित ठिकानों में छुपा रखा है। इन आतंकियों पर इनाम की राशि बढ़ाना केवल अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झोंकने का नाटक है, जबकि असलियत में ये भारत और विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर की शांति को बिगाड़ने के लिए उनके 'रणनीतिक एसेट' बने हुए हैं।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ावा: विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि पाकिस्तान की नीतियों के कारण उसके पड़ोसियों के साथ संबंध लगातार बिगड़ रहे हैं। जैश अल-अदल जैसे संगठनों के जरिए जहां ईरान के साथ तनाव बढ़ा है, वहीं अफगानिस्तान में तालिबान के साथ भी पाकिस्तान के रिश्ते बेहद अस्थिर दौर से गुजर रहे हैं।

BRICS के प्रस्ताव और आरोपों पर पलटवार

जब डिबेट के दौरान पाकिस्तानी पैनलिस्ट उजमा करदार से सीधे तौर पर पूछा गया कि मसूद अजहर, हाफिज सईद और सैयद सलाहुद्दीन जैसे UN द्वारा घोषित आतंकवादी वर्तमान में कहां छिपे हैं, तो उन्होंने मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए भारत पर मनगढ़ंत आरोप लगाने शुरू कर दिए। उजमा करदार ने दावा किया कि भारत अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है और वे टीटीपी तथा बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे प्रतिबंधित संगठनों को हथियार और फंडिंग मुहैया करा रहा है।

इस आरोप पर एंकर ने तुरंत हस्तक्षेप किया और उजमा से अपने दावों के समर्थन में कोई भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट या पुख्ता दस्तावेज पेश करने को कहा। पाकिस्तान के दावों को खारिज करते हुए एंकर ने याद दिलाया कि रूस और चीन जैसे देशों ने भी BRICS के संयुक्त बयान में आतंकवाद की कड़ी निंदा वाले प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसने पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है। इसके अलावा, एंकर ने पूर्व में हुए ऑपरेशन सिंदूर और खुद पाकिस्तानी नेताओं के पुराने बयानों का हवाला देकर उजमा करदार के दावों को पूरी तरह से खोखला साबित कर दिया।

वैश्विक साख और अंतरराष्ट्रीय पासपोर्ट की सच्चाई

कर्नल दानवीर ने उजमा करदार के बयानों पर तंज कसते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे वे ISI द्वारा तैयार किए गए बयानों को रटकर आई हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि पूरी दुनिया जानती है कि अल-कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के सैन्य छावनी क्षेत्र के ठीक बगल में किसकी सुरक्षा में रह रहा था। कर्नल दानवीर ने पाकिस्तानी पैनलिस्टों को चुनौती दी कि यदि उनके पास भारत के खिलाफ कोई भी पुख्ता सबूत हैं, तो वे इसे UN में डॉजियर के रूप में पेश क्यों नहीं करते। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तानी पासपोर्ट की गिरती साख खुद-ब-खुद पूरी कहानी बयां कर देती है।

बहस के अंतिम क्षणों में उजमा करदार ने अपना बचाव करते हुए कहा, "मैं अभी हाल ही में अमेरिका और ब्रिटेन के दौरे से लौटी हूं, और दुनिया भर में पाकिस्तान की अपनी एक बड़ी साख है।" इस दावे को एंकर ने तुरंत खारिज कर दिया और यह कहते हुए डिबेट को समाप्त किया कि पूरी दुनिया पाकिस्तान की जमीनी हकीकत से भली-भांति वाकिफ है।

मसूद अजहर का आतंकी इतिहास और इनाम की सच्चाई

इन कूटनीतिक बहसों के बीच जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर का मुद्दा सबसे गंभीर बना हुआ है। पाकिस्तान की संघीय जांच एजेंसी (FIA) ने अपनी वांटेड सूची में अजहर का नाम शामिल रखा है और उसकी गिरफ्तारी में मदद करने वाली जानकारी के लिए 70 लाख रुपये का इनाम बरकरार रखा है। हालांकि, भारत इस कार्रवाई को केवल एक दिखावा मानता है। मसूद अजहर भारत में हुए कई बड़े हमलों का मुख्य साजिशकर्ता रहा है, जिसमें 2001 में भारतीय संसद पर हुआ हमला भी शामिल है। वर्ष 2008 के मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद भारत ने पाकिस्तान को सौंपे जाने वाले 20 मोस्ट वांटेड भगोड़ों की सूची में अजहर का नाम शीर्ष पर रखा था और उसे भारत को सौंपने की मांग को लगातार दोहराया है।

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सवाल-जवाब

पाकिस्तान और FATF को लेकर डिबेट क्यों हुई?
यह डिबेट अक्टूबर में होने वाले आगामी FATF मूल्यांकन को लेकर हुई, जिसमें इस बात पर चर्चा की गई कि क्या पाकिस्तान वास्तव में टेरर फंडिंग के खिलाफ काम कर रहा है या केवल दिखावा कर रहा है।
पाकिस्तानी पत्रकार ने मसूद अजहर के ठिकाने को लेकर क्या तर्क दिया?
राजा फैजल ने दावा किया कि मसूद अजहर जैसे आतंकी पाकिस्तान में नहीं हैं और वे बोको हराम या अल-शबाब जैसे संगठनों के साथ हो सकते हैं।
भारतीय विशेषज्ञों ने पाकिस्तान के दावों का क्या जवाब दिया?
भारतीय सैन्य विशेषज्ञों ने कहा कि ISI मसूद अजहर और हाफिज सईद जैसे आतंकियों को जम्मू-कश्मीर में शांति भंग करने के लिए रणनीतिक संपत्ति के रूप में सुरक्षित पनाह दे रही है।
मसूद अजहर भारत में किस मामले में वांछित है?
जैश-ए-मोहम्मद का सरगना मसूद अजहर भारत में कई बड़े आतंकवादी हमलों के लिए वांछित है, जिसमें 2001 में भारतीय संसद पर हुआ हमला भी शामिल है।
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टिप्पणियाँ 5

Karan Malhotra@karan-malhotra·43 दिन पहले

एक अपराध और जाँच विशेषज्ञ के रूप में, FATF समीक्षा के संदर्भ में केवल टीवी बहसों में पल्ला झाड़ना कानूनी और वित्तीय जवाबदेही से बचने का समाधान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली और आतंकवाद-विरोधी वित्तीय मानकों (FATF) को केवल ज़बानी दावों की नहीं, बल्कि ठोस अदालती सबूतों, चार्जशीट और संपत्तियों को जब्त करने की सख्त कार्रवाई की आवश्यकता होती है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकियों पर कार्रवाई न करना केवल कूटनीतिक विफलता नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। आगामी समीक्षा में पाकिस्तान को कानूनी और जांच से जुड़े ठोस दस्तावेज पेश करने होंगे, जहां ऐसे खोखले तर्क खारिज हो जाएंगे।

Rohan Verma@rohan-verma·43 दिन पहले

FATF जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की समीक्षा से ठीक पहले यह डिबेट पाकिस्तान के कूटनीतिक दोहरेपन को उजागर करती है। आतंकियों की मौजूदगी से साफ इनकार करना और जिम्मेदारी अन्य देशों या संगठनों पर डालना यह दर्शाता है कि पड़ोसी देश अपनी सरजमीं से संचालित टेरर नेटवर्क पर ठोस कार्रवाई करने के बजाय केवल दिखावे के प्रशासनिक बदलावों तक सीमित है। आगामी समीक्षा के दौरान ऐसे खोखले तर्क अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की जवाबदेही तय होने से नहीं रोक पाएंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·43 दिन पहले

रोहन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह स्पष्ट है कि रणनीतिक स्तर पर पाकिस्तान की इनकार की नीति अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर असरहीन साबित हो रही है। जब कूटनीतिक तंत्र टेरर फंडिंग और सुरक्षित पनाहगाहों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अन्य संगठनों या पड़ोसी देशों पर दोष मढ़ने जैसे तर्कों का सहारा लेता है, तो इससे उसकी वैश्विक विश्वसनीयता समाप्त होती है। FATF जैसी संस्थाएँ केवल कागज़ी बदलावों को स्वीकार नहीं करतीं, बल्कि पारदर्शी और सत्यापन योग्य कार्रवाई की मांग करती हैं। आगामी समीक्षा में इन विरोधाभासों को छुपाना मुश्किल होगा, जिससे इस्लामाबाद पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ना तय है।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·44 दिन पहले

वित्तीय निगरानी संस्था की आगामी समीक्षा से पहले इस प्रकार की मीडिया बहसों में पाकिस्तान का रक्षात्मक रुख उसकी गहरी कूटनीतिक और आर्थिक विवशताओं को उजागर करता है। जब तक राज्य नीति और आतंकवाद के बीच का यह अंतर्विरोध दूर नहीं होता, तब तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़े प्रतिबंधों और ग्रे लिस्ट का खतरा इस्लामाबाद पर बना रहेगा, जिससे उसकी पहले से चरमराई अर्थव्यवस्था पर और अधिक दबाव पड़ेगा।

Li Wei@li-wei·44 दिन पहले

वित्तीय निगरानी संस्था की आगामी समीक्षा से पहले पाकिस्तान का यह रक्षात्मक रवैया उसकी कमजोर होती कूटनीति का प्रमाण है। जब तक राज्य स्तर पर आतंकवाद को पनाह देने की नीति समाप्त नहीं होती, तब तक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मंचों पर उसकी विश्वसनीयता बहाल नहीं हो सकती। इस निरंतर कूटनीतिक अलगाव और संभावित आर्थिक प्रतिबंधों का सीधा असर उसकी पहले से बदहाल अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक समुदाय में उसका संकट और गहराता जाएगा।

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