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जमीनी अनुभवों से बनी है भारत की आतंक-रोधी रणनीति, सेबू में बोले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंहदुनिया
30 अक्तू॰ 2026, 4:34 am (3 घंटे पहले)· 0

जमीनी अनुभवों से बनी है भारत की आतंक-रोधी रणनीति, सेबू में बोले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

फिलीपींस के सेबू में आयोजित बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की आतंक-रोधी क्षमताएं दशकों के वास्तविक अभियानों पर आधारित हैं। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नौसैनिक सुरक्षा प्रयासों को रेखांकित किया।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद और समुद्री सुरक्षा पर भारत का रुख स्पष्ट करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 29 अक्टूबर को कहा कि देश की आतंक-रोधी क्षमताएं किसी क्लासरूम या सैद्धांतिक पढ़ाई की देन नहीं हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि दशकों तक सीमा पार से आने वाली गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का जमीनी स्तर पर सामना करके भारत ने यह अनुभव हासिल किया है। भारत की हर रणनीति वास्तविक अभियानों की कसौटी पर कसी जा चुकी है और उसने हर बार अपनी प्रभावशीलता को साबित किया है।

ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख और कड़ा संदेश

फिलीपींस के सेबू शहर में आयोजित आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस (एडीएमएम-प्लस) के दौरान रक्षा मंत्री ने आतंकवाद से निपटने के भारतीय दृष्टिकोण को विस्तार से साझा किया। अपने संबोधन में उन्होंने पिछले वर्ष संचालित किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की चर्चा की। उन्होंने रेखांकित किया कि इस विशेष सैन्य कार्रवाई के तहत बड़े पैमाने पर आतंकी नेटवर्क और उनके बुनियादी ढांचे को ध्वस्त किया गया था। राजनाथ सिंह के अनुसार, यह अभियान सीधे तौर पर राज्य प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ देश के सख्त और अडिग संकल्प का स्पष्ट प्रमाण था।

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वैश्विक समुद्री गलियारों और नौवहन की सुरक्षा

समुद्री सुरक्षा के आयाम पर विचार रखते हुए रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का न केवल पुरजोर समर्थन करता है, बल्कि स्वयं भी उनका पूरी निष्ठा से पालन करता है। नौवहन की स्वतंत्रता को बनाए रखना और वैश्विक समुद्री संचार मार्गों (सी लाइन्स ऑफ कम्युनिकेशन) को सुरक्षित रखना भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का हिस्सा है, जिसे कई दशकों के निरंतर अनुभव से मजबूती मिली है।

भारतीय नौसेना की वैश्विक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2008 से ही नौसेना अदन की खाड़ी जैसे बेहद संवेदनशील और जोखिम भरे समुद्री इलाकों में लगातार तैनात है। इस पूरी अवधि में भारत ने कभी भी ऐसा बल प्रयोग नहीं किया जिससे अन्य देशों के हितों को नुकसान पहुंचे। इसके विपरीत, अग्रिम पंक्ति के युद्धपोतों की तैनाती के माध्यम से भारतीय नौसेना ने हजारों वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराया और समुद्री लुटेरों द्वारा जहाजों के अपहरण के कई प्रयासों को सफलतापूर्वक विफल किया।

एडीएमएम-प्लस मंच और भारत की भागीदारी

एडीएमएम-प्लस मंच दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) के 11 सदस्य देशों और उसके आठ संवाद साझेदारों का एक प्रमुख सुरक्षा तंत्र है। इन आठ संवाद साझेदारों में भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया, रूस और अमेरिका शामिल हैं। भारत के इस मंच से जुड़ाव का इतिहास काफी पुराना है, जहां देश 1992 में आसियान का संवाद साझेदार बना था।

इस सुरक्षा मंच की औपचारिक शुरुआत 12 अक्टूबर, 2010 को हनोई में आयोजित पहली बैठक के साथ हुई थी। वर्ष 2026 के लिए फिलीपींस इस मंच की अध्यक्षता कर रहा है। इसके अलावा, एडीएमएम-प्लस रूपरेखा के तहत भारत 2024 से 2027 तक की अवधि के लिए मलेशिया के साथ मिलकर आतंकवाद-रोधी विशेषज्ञ कार्य समूह की सह-अध्यक्षता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी निभा रहा है।

सवाल-जवाब

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह संबोधन किस स्थान पर और कब दिया?
उन्होंने यह संबोधन 29 अक्टूबर को फिलीपींस के सेबू में आयोजित एडीएमएम-प्लस बैठक के दौरान दिया।
राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में किस सैन्य अभियान का उल्लेख किया?
उन्होंने पिछले वर्ष चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उल्लेख किया, जिसमें आतंकी ढांचे को नष्ट किया गया था।
भारतीय नौसेना कब से अदन की खाड़ी में सक्रिय रूप से तैनात है?
भारतीय नौसेना वर्ष 2008 से अदन की खाड़ी जैसे संवेदनशील समुद्री गलियारों में लगातार गश्त और सुरक्षा अभियान चला रही है।
एडीएमएम-प्लस मंच क्या है और इसमें कौन से देश शामिल हैं?
यह आसियान के 11 सदस्य देशों और आठ संवाद साझेदारों (भारत, चीन, अमेरिका, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया) का रक्षा मंच है।
एडीएमएम-प्लस की पहली बैठक कब और कहाँ आयोजित की गई थी?
इस मंच की पहली बैठक 12 अक्टूबर, 2010 को वियतनाम के हनोई में आयोजित हुई थी।
एडीएमएम-प्लस में भारत के पास वर्तमान में क्या जिम्मेदारी है?
भारत 2024 से 2027 की अवधि के लिए मलेशिया के साथ मिलकर आतंकवाद-रोधी विशेषज्ञ कार्य समूह की सह-अध्यक्षता कर रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Karan Malhotra@karan-malhotra·33 मिनट पहले

अदन की खाड़ी में जब हमारे युद्धपोतों ने उन मर्चेंट जहाजों को बचाया था, तब पास ही खड़े एक कप्तान से बात हुई थी। उनका कहना था कि किताबों की थ्योरी से समुद्र में जान नहीं बचती, असली ट्रेनिंग तो गोलियों की आवाज के बीच ही होती है।

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·52 मिनट पहले

राजनाथ सिंह ने सेबू में आतंकवाद और समुद्री सुरक्षा को लेकर भारत का रुख साफ कर दिया। क्या इस तरह के मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ देशों से कोई ठोस सहयोग मिल भी पाता है?

Arjun Mehta@arjun-mehta·51 मिनट पहले

युकी, ऐसे मंचों पर सीधा सहयोग मिलना मुश्किल होता है, लेकिन चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के बीच भारत का अपना पक्ष मजबूती से रखना ही बड़ी कूटनीति है।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·1 घंटे पहले

जब मैं कुछ साल पहले फिलीपींस की यात्रा पर गया था, तब क्षेत्रीय सुरक्षा पर वहां के अधिकारियों से लंबी चर्चा हुई थी। आतंकवाद से निपटने का जमीनी तजुर्बा किताबों से नहीं मिलता, ये बात बिल्कुल सही है।

Sophie Laurent@sophie-laurent·1 घंटे पहले

कार्लोस, बिल्कुल सही कहा। यूरोपीय मंचों पर भी अक्सर यही बात उठती है कि सुरक्षा नीतियां किताबों से नहीं, बल्कि जमीनी चुनौतियों से ही तय होती हैं।

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