बर्फ से ढकी ऊंची चोटियां, दुर्गम पहाड़ियां और साल के अधिकतर समय बंद रहने वाले रास्ते… इन सबके बीच अफगानिस्तान में एक ऐसी भौगोलिक पट्टी छिपी है जो दुनिया के नक्शे पर भले ही बेहद पतली दिखाई दे, लेकिन भू-राजनीतिक समीकरणों में इसकी अहमियत बहुत ज्यादा है. करीब 350 किलोमीटर लंबी इस पट्टी को वाखान कॉरिडोर कहा जाता है. इसके चारों तरफ भारत, चीन, पाकिस्तान और मध्य एशिया की बड़ी ताकतें अपनी रणनीतिक चालें चल रही हैं. इतिहास में इस इलाके को ब्रिटिश भारत और रूसी साम्राज्य के बीच एक बफर जोन के रूप में गढ़ा गया था, लेकिन मौजूदा समय में यही इलाका बीजिंग की पेशानी पर बल डाले हुए है.
यह संकरा गलियारा एक तरफ पाकिस्तान की मध्य एशिया तक पहुंचने की महत्वकांक्षाओं से जुड़ा है, तो दूसरी तरफ यह भारत की उत्तरी सुरक्षा रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है. हाल ही में भारत और अफगानिस्तान के बीच हुए संपर्कों में इस इलाके के जिक्र ने वैश्विक कूटनीति का ध्यान एक बार फिर इस तरफ खींच लिया है.
नक्शे पर एक लकीर, लेकिन इसके मायने बहुत बड़े
अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत से शुरू होने वाला यह गलियारा पूरब की दिशा में आगे बढ़कर सीधे चीन के शिनजियांग तक पहुंचता है. इसके उत्तरी हिस्से में ताजिकिस्तान की सीमा लगती है, जबकि दक्षिण में पाकिस्तान के कब्जे वाला गिलगित-बाल्टिस्तान और उससे जुड़े पर्वतीय इलाके स्थित हैं. इसका पूर्वी छोर सीधे चीन से जाकर मिलता है. इस तरह जमीन की एक पतली सी पट्टी पर चार देशों और क्षेत्रों की सीमाएं एक-दूसरे के बेहद करीब आ जाती हैं.
इस कॉरिडोर का सबसे संवेदनशील हिस्सा इसका पूर्वी सिरा है, जहां चीन और अफगानिस्तान के बीच लगभग 74 से 76 किलोमीटर लंबी सीमा साझा होती है. यहीं पर वाखजिर दर्रा मौजूद है जो दोनों देशों को आपस में जोड़ता है. लगभग 5,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यह दुनिया के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण पहाड़ी दर्रों में शुमार किया जाता है. अफगान भूभाग की तरफ से इस स्थान तक पहुंचने के लिए सड़कों का बुनियादी ढांचा लगभग न के बराबर है. हालांकि कूटनीति और रणनीति में रास्तों की महत्ता उनकी चौड़ाई से नहीं बल्कि उनकी रणनीतिक दिशा से तय होती है.
इतिहास के पन्नों से वर्तमान तक का सफर
उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान मध्य एशिया के क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए रूसी और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच एक लंबी कूटनीतिक जंग चली थी जिसे इतिहास में ग्रेट गेम के नाम से जाना जाता है. उस दौर में ब्रिटिश हुक्मरान कतई नहीं चाहते थे कि रूसी प्रभाव सीधे उनकी सीमाओं तक पहुंच जाए. इसी भू-राजनीतिक तनाव को कम करने के उद्देश्य से अफगानिस्तान के इस संकरे भूभाग को एक सुरक्षा कवच यानी बफर जोन के तौर पर स्थापित किया गया था. यानी इस कॉरिडोर का वजूद ही दो बड़ी महाशक्तियों के बीच एक निश्चित दूरी बनाए रखने के लिए हुआ था.
विडंबना यह है कि लगभग डेढ़ सदी बीत जाने के बाद भी इस क्षेत्र की मूल उपयोगिता में कोई खास बदलाव नहीं आया है. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब इस भूखंड पर रूस और ब्रिटेन की जगह चीन, पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान के हित आमने-सामने आ गए हैं.
चीन के लिए चिंता का बड़ा कारण क्यों है यह क्षेत्र
ड्रैगन के लिए यह गलियारा केवल अफगानिस्तान से सटी साधारण सीमा भर नहीं है. इस पट्टी का दूसरा सिरा सीधे तौर पर चीन के संवेदनशील शिनजियांग प्रांत के करीब पहुंचता है. बीजिंग लंबे समय से इस बात को लेकर आशंकित रहा है कि अफगान सरजमीं की अस्थिरता और वहां सक्रिय चरमपंथी ताकतें सीमा लांघकर उसके अपने इलाकों तक न पहुंच जाएं. चीन मुख्य रूप से इस बात को लेकर सतर्कता बरतता रहा है कि उइगर विद्रोह से जुड़े संगठन अफगान भूमि का इस्तेमाल करके शिनजियांग में अशांति न फैलाएं. यही वजह है कि बीजिंग इस दुर्गम इलाके को एक सामान्य अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे अपनी सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील गलियारा मानता है.
दूसरी तरफ, पाकिस्तान अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान का इलाका वाखान कॉरिडोर के बेहद नजदीक स्थित है. यहीं से इस पूरी कहानी में भारत की रणनीतिक मौजूदगी का दायरा तय होता है. हाल ही में भारत और अफगानिस्तान के बीच हुए समझौतों और वार्ताओं में इस क्षेत्र का उल्लेख इसी वृहद भू-राजनीतिक सोच का परिणाम है.
चीन-पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी और भारत की निगाहें
इस पूरे इलाके में बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच गहराता रणनीतिक तालमेल भारत के लिए एक बड़ा विचारणीय बिंदु है. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC पहले से ही पाकिस्तान के नियंत्रण वाले गिलगित-बाल्टिस्तान के रास्ते गुजर रहा है. चीन लगातार इस क्षेत्र में परिवहन, ऊर्जा और कनेक्टिविटी से जुड़ी बुनियादी परियोजनाओं को आगे बढ़ा रहा है.
भविष्य में यदि वाखान क्षेत्र को चीन-अफगानिस्तान या फिर पाकिस्तान-मध्य एशिया संपर्क मार्ग के रूप में विकसित कर लिया जाता है, तो इस पूरे भूभाग का रणनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल सकता है. यदि इस दुर्गम इलाके में उन्नत सड़कों और परिवहन माध्यमों का जाल बिछ जाता है, तो चीन और पाकिस्तान दोनों को ही मध्य एशिया तक पहुंचने के नए और सुगम रास्ते मिल जाएंगे. भारत बहुत बारीकी से इन तमाम संभावनाओं पर अपनी नजर बनाए हुए है.
कनेक्टिविटी की इस शतरंज में भारत की चाल
भारत काफी समय से पाकिस्तान के भूभाग को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाने के लगातार प्रयास कर रहा है. इस दिशा में ईरान का चाबहार बंदरगाह बेहद अहम भूमिका निभाता है. भारत इसी बंदरगाह के जरिए अफगान क्षेत्र और आगे मध्य एशिया तक व्यापारिक एवं रणनीतिक संपर्क के विकल्प तैयार करना चाहता है. हालांकि वाखान क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की संभावित गतिविधियां इस समीकरण को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं.
इसी वजह से भारत के लिए यह इलाका केवल पहाड़ों के बीच फंसी साधारण जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह भविष्य की उस कनेक्टिविटी का हिस्सा है जहां हर दर्रा और हर सीमा कूटनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है.
मध्य एशिया की राजनीति में इसकी वास्तविक स्थिति
यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि वाखान कॉरिडोर उज्बेकिस्तान से लगभग 1,000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. वर्तमान समय में इसकी अहमियत सड़कों के आवागमन या बड़े पैमाने पर होने वाले व्यापार से ज्यादा इसकी भौगोलिक अवस्थिति और भविष्य की संभावनाओं में निहित है. हालांकि आने वाले वर्षों में यदि क्षेत्रीय ताकतें यहां रेल और सड़क नेटवर्क को बढ़ावा देती हैं, तो इस क्षेत्र के भू-राजनीतिक मायने और अधिक गहरे हो सकते हैं.





















