हिमालयी देश नेपाल के रसुवा जिले में बुधवार सुबह आई प्राकृतिक विभीषिका ने पूरे इलाके में भारी तबाही मचाई है। भोटेकोशी नदी के तटीय क्षेत्र में अचानक आए भयंकर भूस्खलन और तेज बहाव वाले पानी के कारण विशाल तबाही देखने को मिली है। इस आपदा में अब तक कम से कम 160 लोगों की दर्दनाक मौत दर्ज की जा चुकी है, जबकि 844 लोग अभी भी लापता हैं। गायब हुए लोगों में स्थानीय निवासियों के अलावा कैलाश-मानसरोवर की पवित्र यात्रा पर निकले कई भारतीय नागरिक और विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं। इस भीषण त्रासदी ने उन तीर्थयात्रियों के दिलों में गहरा खौफ पैदा कर दिया है, जो कुछ ही समय पहले इस मार्ग से अपनी यात्रा पूरी करके सुरक्षित वापस लौटे थे।
रसुवा के गांव का मिटा नामोनिशान और चीन का इमिग्रेशन सेंटर ध्वस्त
इस प्राकृतिक आपदा का सबसे भयंकर प्रभाव नेपाल, तिब्बत और चीन की सीमा से लगे रसुवा और केरुंग क्षेत्र में देखने को मिला है। पहाड़ी इलाकों में हुए इस विनाशकारी हादसे के कारण सीमा पर बना चीन का प्रमुख इमिग्रेशन सेंटर पूरी तरह मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। इसके अलावा त्रिशूली नदी, भोटेकोशी नदी के तटीय क्षेत्र, त्रिशूली बाजार और शाफ्रुबेसी के नजदीकी बस्तियों में भारी नुकसान की सूचना मिली है। कई रिहायशी इमारतें और दुकानें पानी के तेज बहाव में बह गईं। नदी किनारे स्थित एक पूरा गांव इस बाढ़ और मलबे की चपेट में आकर पूरी तरह नष्ट हो गया है, जिससे वहां का भूगोल ही बदल गया है।
कोलकाता के श्रद्धालु का डरावना अनुभव और बाल-बाल बची जान
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के निवासी अनिंद्य मुखर्जी हाल ही में अपने परिवार के सदस्यों, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ कैलाश-मानसरोवर यात्रा पूरी करके लौटे हैं। अनिंद्य ने बताया कि लगभग ढाई महीने पहले अपनी यात्रा के दौरान वह इसी तबाह हुए गांव में लगातार तीन रातों तक ठहरे थे। जब उन्हें यह खबर मिली कि जिस गांव में उन्होंने समय बिताया था, वह अब पूरी तरह उजड़ चुका है, तो वह स्तब्ध रह गए। अनिंद्य ने कहा कि वह यह सोचकर ही कांप उठते हैं कि अगर उनका यात्रा कार्यक्रम कुछ दिन आगे होता, तो वे भी इस जानलेवा आपदा की चपेट में आ सकते थे।
आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जारी है राहत कार्य
आपदा की सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों ने प्रभावित इलाकों में व्यापक रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया है। हालांकि, क्षेत्र में लगातार खराब बने मौसम और भूस्खलन के कारण तबाह हुई सड़कों की वजह से राहत टीमों को दूरदराज के हिस्सों तक पहुंचने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी चुनौती उन दर्जनों लोगों की तलाश करना है, जिनसे हादसे के बाद से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। लापता भारतीय तीर्थयात्रियों के परिजनों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं और खोज अभियान को तेजी से आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ते कुदरती खतरों पर चिंता
पहाड़ी इलाकों में हर साल होने वाले इस तरह के हादसों पर अनिंद्य मुखर्जी ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने, अचानक बाढ़ आने और पहाड़ों के धंसने की घटनाएं अब हर साल की कहानी बन चुकी हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति लगातार इंसान को खतरे के संकेत दे रही है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हम उन चेतावनियों को गंभीरता से समझ रहे हैं। अपनी आंखों से देखे गए सुंदर पर्वतीय इलाके को इस तरह मलबे में तब्दील होते देखना हर किसी के लिए एक बेहद दर्दनाक और भयानक अनुभव है।





















