झारखंड के पलामू जिले में कृषि परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, जहां किसान पारंपरिक खेती के ढर्रे को छोड़कर आधुनिक और संरक्षित फूलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। कम भूमि में अधिक लाभ देने वाली फसलों के प्रति बढ़ते आकर्षण के बीच जरबेरा फूल की खेती एक फायदे का जरिया बनकर उभरी है। राज्य सरकार नए वित्तीय सत्र में पॉलीहाउस और संरक्षित संरचनाओं के तहत फूलों की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए भारी वित्तीय सहायता दे रही है, जिससे स्थानीय किसानों के लिए इस क्षेत्र में कदम रखना बेहद आसान हो गया है।
6.60 लाख रुपये प्रति यूनिट लागत पर 80 प्रतिशत सहायता
पलामू जिले में संरक्षित तरीके से फूलों की खेती का दायरा बढ़ाने के उद्देश्य से उद्यान विभाग ने विशेष कार्ययोजना तैयार की है। विभाग ने जिले में कुल सात यूनिट स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। उद्यान विभाग के अधिकारी सावन कुमार के अनुसार, इस योजना के अंतर्गत एक कमर्शियल यूनिट की कुल स्थापना लागत लगभग 6 लाख 60 हजार रुपये तय की गई है। इस लागत को सुलभ बनाने के लिए राज्य सरकार 80 प्रतिशत राशि सब्सिडी के रूप में प्रदान कर रही है, जबकि शेष 20 प्रतिशत राशि का भुगतान किसान को स्वयं करना होता है। इस वित्तीय तंत्र से किसानों पर शुरुआती ढांचे का ढांचागत वित्तीय बोझ काफी हद तक कम हो जाता है।
पारंपरिक फसलों के मुकाबले रोजाना की नियमित आय
पलामू के किसान शंकर मेहता कई वर्षों से धान और गेहूं की पारंपरिक खेती करते आ रहे थे। हालांकि, समय के साथ उन्होंने अपनी कृषि रणनीति में बदलाव किया और वैज्ञानिक तरीके से जरबेरा फूलों का उत्पादन शुरू किया। उनके अनुभव के मुताबिक, पारंपरिक खाद्यान्न फसलों की तुलना में जरबेरा की खेती से कई गुना अधिक रिटर्न मिलता है। वर्तमान में उनके पॉलीहाउस से प्रतिदिन लगभग 300 से 400 गुणवत्तापूर्ण फूल प्राप्त होते हैं। इन फूलों को दैनिक आधार पर मेदिनीनगर और आसपास के प्रमुख व्यावसायिक बाजारों में आपूर्ति के लिए भेजा जाता है।
शादी और पूजा सीजन में 8 से 10 रुपये प्रति पीस की कीमत
बाजार की स्थिति और मांग के आधार पर स्थानीय मंडियों में एक जरबेरा फूल की कीमत 8 रुपये से 10 रुपये प्रति पीस तक मिल जाती है। रोजाना सैकड़ों की संख्या में फूलों की बिक्री होने से किसानों को दैनिक रूप से नकदी प्राप्त होती है। शंकर मेहता के अनुसार, लगभग चार महीने के एक फसल चक्र में करीब 1 लाख रुपये तक की शुद्ध आमदनी होने का अनुमान रहता है। क्षेत्र में शादी-विवाह के लग्न, धार्मिक पूजा-पाठ और विभिन्न सार्वजनिक आयोजनों के कारण फूलों की मांग लगातार बनी रहती है। शुरुआत में पॉलीहाउस संरचना और गुणवत्तापूर्ण पौधों के चयन में पूंजी लगानी पड़ती है, लेकिन 80 प्रतिशत सरकारी अनुदान मिलने के बाद यह मॉडल छोटे और मध्यम किसानों के लिए एक टिकाऊ आय का साधन साबित हो रहा है।



















