नाइट्रोजन गैस से मौत की सजा: हवा में सबसे ज्यादा मौजूद यह गैस इंसान की जान कैसे ले लेती है, डॉक्टर से समझिए पूरा विज्ञानदुनिया
3 घंटे पहले· 0

नाइट्रोजन गैस से मौत की सजा: हवा में सबसे ज्यादा मौजूद यह गैस इंसान की जान कैसे ले लेती है, डॉक्टर से समझिए पूरा विज्ञान

अमेरिका के अल्बामा में एक कैदी को नाइट्रोजन गैस से मौत देने पर कोर्ट ने रोक लगा दी है, जिसे क्रूर और अमानवीय बताया जा रहा है। फोर्टिस अस्पताल, मानेसर के डॉ. कर्ण मेहरा ने बताया कि ज़हरीली न होने के बावजूद यह गैस कैसे जानलेवा बन जाती है।

मौत की सजा देने के तरीके हर दौर में बदलते रहे हैं। पुराने ज़माने में कैदियों को सूली पर लटका देना या पत्थरों से मार-मारकर मार डालना आम था। आधुनिक दौर में कहीं गले में फंदा डालकर फांसी दी जाती है तो कुछ देशों में ज़हरीला इंजेक्शन लगाकर मौत दे दी जाती है। अब इसी कड़ी में एक नया और बेहद विवादित तरीका सामने आया है, जिसने अमेरिका में बवाल खड़ा कर दिया है।

अल्बामा से शुरू हुआ विवाद

अमेरिका के अल्बामा में एक कैदी को नाइट्रोजन गैस देकर मौत देने की तैयारी थी, लेकिन इसके भारी विरोध के बाद कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। इसे क्रूर और अमानवीय करार दिया जा रहा है। आरोप है कि इस प्रक्रिया में कैदी लंबे समय तक तड़पता रहता है और तब कहीं जाकर उसकी मौत होती है, इसलिए इसे तत्काल बंद किया जाना चाहिए।

सबसे आम गैस, फिर भी जानलेवा कैसे

यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि पृथ्वी पर जो गैस सबसे ज्यादा मात्रा में मौजूद है और जो ज़हरीली भी नहीं है, वही किसी की जान कैसे ले सकती है। इसी पहेली को समझने के लिए फोर्टिस अस्पताल, मानेसर के पल्मोनोलॉजी डिपार्टमेंट के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. कर्ण मेहरा ने पूरी प्रक्रिया विस्तार से समझाई।

डॉ. मेहरा के मुताबिक नाइट्रोजन से शरीर में पहले हाइपोक्सिया और फिर एनोक्सिया की स्थिति बनती है, जिसमें शरीर की 100 प्रतिशत ऑक्सीजन खत्म हो जाती है और कैदी की मौत हो जाती है। यह बेहद दर्दनाक मौत मानी जाती है।

सांस लेने का सामान्य तरीका

इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि हमारा शरीर सांस के जरिए हवा को फेफड़ों में खींचता है। इस हवा में कई गैसें मिली होती हैं — सबसे ज्यादा 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, इसके बाद 21 प्रतिशत ऑक्सीजन, और बाकी मामूली मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, हीलियम, नियन और हाइड्रोजन। हमारे लंग्स इन सबमें से छानकर सिर्फ ऑक्सीजन को अपने पास रखते हैं और बाकी गैसों को वापस बाहर धकेल देते हैं।

यही ऑक्सीजन खून में मौजूद हीमोग्लोबिन खींच लेता है और शरीर के हर अंग तक पहुंचा देता है। इसी ऑक्सीजन के सहारे हमारा शरीर जिंदा रहता है। डॉ. मेहरा बताते हैं कि जब शरीर में ऑक्सीजन पहुंचनी बंद हो जाए और कोशिकाओं तक इसकी आपूर्ति रुक जाए, तो मेडिकल भाषा में इसे हाइपोक्सिया कहते हैं। इसका सीधा मतलब है कि कोशिकाएं सांस नहीं ले पातीं और दम तोड़ देती हैं। नाइट्रोजन से मौत देते समय ठीक यही प्रक्रिया घटती है।

फांसी की पूरी प्रक्रिया

डॉ. मेहरा के अनुसार जिस दिन सजा देनी होती है, उस दिन सबसे पहले कैदी को एक खास मेडिकल स्ट्रेचर पर सीधा लिटाकर मजबूत पट्टियों से बांध दिया जाता है ताकि वह हिल-डुल न सके। इसके बाद उसके पूरे चेहरे — आंख, नाक, कान और मुंह — को ढकते हुए एक रेस्पिरेटर मास्क लगा दिया जाता है। यह मास्क ऐसा होता है कि बाहर की हवा पूरी तरह रुक जाती है और ऑक्सीजन लगभग न के बराबर पहुंचती है।

इस मास्क को एक ट्यूब के जरिए दूसरे कमरे में रखे शुद्ध नाइट्रोजन गैस के सिलेंडरों से जोड़ दिया जाता है। फिर इसे रिमोट के जरिए चालू किया जाता है। चालू होते ही नाइट्रोजन की सप्लाई शुरू हो जाती है और कैदी के फेफड़ों में सौ फीसदी सिर्फ नाइट्रोजन ही पहुंचने लगती है।

शरीर के अंदर क्या-क्या टूटता है

डॉ. मेहरा समझाते हैं कि नाइट्रोजन अपने आप में ज़हरीली गैस नहीं है, लेकिन जब फेफड़ों में दूसरी कोई गैस न जाए और सिर्फ नाइट्रोजन भरती जाए, तो यह वहां पहले से बची हुई ऑक्सीजन को भी बाहर धकेल देती है, क्योंकि ऑक्सीजन गैस हल्की होती है। नतीजा यह कि शरीर से ऑक्सीजन पूरी तरह खत्म हो जाती है — यही हाइपोक्सिया की स्थिति है।

जब फेफड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिलती तो खून शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाना बंद कर देता है। सबसे पहले दिमाग की कोशिकाएं काम करना बंद करती हैं, जिससे व्यक्ति कुछ ही सेकंडों में बेहोश हो जाता है। इसके तुरंत बाद हार्ट, फेफड़े और दूसरे अहम अंगों की कोशिकाएं ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ने लगती हैं। कुछ ही मिनटों में दिल की धड़कनें पूरी तरह रुक जाती हैं और व्यक्ति की सडन कार्डियक डेथ हो जाती है।

विरोध की असली वजह

बचाव पक्ष का तर्क है कि कैदी के चेहरे पर लगाया गया रेस्पिरेटर मास्क पूरी तरह एयर-टाइट नहीं हो पाता। इस वजह से थोड़ी-बहुत ऑक्सीजन भीतर जाती रहती है। नाइट्रोजन गैस छोड़े जाने के बावजूद कैदी जल्दी नहीं मरता और ऐसी स्थिति में वह वेजिटेटिव स्टेज में भी पहुंच सकता है, जिससे उसकी मौत होने में बहुत लंबा समय लग सकता है। यही वजह है कि इस तरीके को बेहद क्रूर और अमानवीय बताया जा रहा है।

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