शिनजियांग प्रांत में टेस्ट फ्लाइट के दौरान उड़ता हुआ चीन का एक नया, बिना पूंछ वाला विमान कैमरे में कैद हुआ है और डिफेंस जानकार इसे मानवरहित बॉम्बर के शुरुआती प्रोटोटाइप के तौर पर देख रहे हैं, जिसे इंटरकॉन्टिनेंटल रेंज के लिए तैयार किया जा रहा है. अगर इसकी क्षमताओं को लेकर लगाए जा रहे मौजूदा अनुमान सही निकलते हैं, तो यह बीजिंग की लंबी दूरी की हवाई ताकत में अब तक की सबसे बड़ी छलांग साबित हो सकता है, क्योंकि यह विमान प्रशांत महासागर से अटलांटिक तक एक ही उड़ान में बिना रुके पहुंच सकता है.
नए प्रोटोटाइप में आखिर है क्या
सामने आई फुटेज में विमान का फ्लाइंग-विंग डिजाइन दिखता है, वही आकार जो दुनिया के मौजूदा स्टील्थ बॉम्बरों में इस्तेमाल होता है, क्योंकि तेज कोनों और खड़ी पूंछ वाली सतहों से बचकर यह रडार पर विमान की मौजूदगी को कम पकड़ में आने देता है. फुटेज पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि विमान के भीतर काफी जगह है, जिसमें भारी मात्रा में ईंधन के साथ-साथ हथियारों की अच्छी-खासी खेप भी बाहर की बजाय शरीर के भीतर ही रखी जा सकती है, जिससे विमान रडार की पकड़ में कम आता है.
पहले सैटेलाइट तस्वीर, फिर असली उड़ान
यह इस प्रोजेक्ट की पहली झलक नहीं है. शिनजियांग के मालान इलाके में मौजूद एक एयरफोर्स टेस्ट सेंटर के पास ली गई सैटेलाइट तस्वीरों से जून 2025 में ही यह संकेत मिल गया था कि चीन ऐसा विमान बना रहा है. इसके करीब चार महीने बाद, 19 अक्टूबर 2025 को इस विमान की पहली उड़ान की तस्वीरें सामने आईं.
अमेरिकी B-2 को टक्कर देने वाला डिजाइन
आकार में नए विमान की सीधी तुलना अमेरिका के B-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर से की जा रही है, क्योंकि दोनों का विंगस्पैन करीब 52 मीटर आंका गया है. सबसे बड़ा फर्क यह है कि चीन के इस डिजाइन में कोई पायलट नहीं बैठता, इसलिए कॉकपिट और लाइफ-सपोर्ट सिस्टम के लिए बचने वाली जगह में ज्यादा ईंधन, हथियार और दूसरे उपकरण समा सकते हैं.
चीन को इतनी लंबी रेंज की जरूरत क्यों
अभी लंबी दूरी तक मार करने के लिए चीन मुख्य रूप से अपने H-6 बॉम्बर के एक्सटेंडेड रेंज वर्जन, लंबी दूरी की मिसाइलों और नए YY-20 रिफ्यूलिंग टैंकरों पर ही निर्भर है. ये तीनों प्लेटफॉर्म अपनी जगह सक्षम माने जाते हैं, लेकिन स्टील्थ क्षमता वाला और इंटरकॉन्टिनेंटल रेंज रखने वाला मानवरहित विमान चीन को इस मौजूदा दायरे से कहीं आगे तक ऑपरेट करने की ताकत दे सकता है. डिफेंस एक्सपर्ट का कहना है कि इतनी रेंज वाला मानवरहित विमान चीन को अटलांटिक, आर्कटिक और उससे भी आगे तक हवाई पहुंच दिला सकता है, जो बड़ा फायदा है क्योंकि विदेशों में चीन के पास अमेरिका जितने सैन्य अड्डे मौजूद नहीं हैं.
बड़े सैन्य विस्तार का हिस्सा
यह नया विमान ऐसे समय सामने आया है जब चीन एक साथ कई मोर्चों पर अपनी मिलिट्री एविएशन क्षमता बढ़ा रहा है, जिसमें उसका खुद का छठी पीढ़ी का फाइटर जेट प्रोग्राम भी शामिल है, और इंजन टेक्नोलॉजी में हुई तरक्की से फाइटर जेट और बॉम्बर, दोनों प्रोग्राम को रफ्तार मिली बताई जा रही है. इसके उलट अमेरिका का सबसे नया स्टील्थ बॉम्बर B-21 आकार में तुलनात्मक रूप से छोटा है. अगर चीन का यह बॉम्बर सच में इंटरकॉन्टिनेंटल रेंज हासिल कर लेता है तो इसका रणनीतिक महत्व काफी बड़ा होगा, खासकर इसलिए क्योंकि अमेरिकी विमानों को लंबे मिशन पूरे करने के लिए अभी भी हवा में ईंधन भरवाने की जरूरत पड़ती है.
चीन की बड़ी सैन्य महत्वाकांक्षा
यह नया बॉम्बर एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा है. चीन खुद को ग्लोबल सुपर पावर के तौर पर स्थापित करना चाहता है, और आर्थिक मोर्चे पर वह पहले ही इतना मजबूत हो चुका है कि अमेरिका समेत बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी उसकी अनदेखी नहीं कर सकतीं. अब बीजिंग यही मंशा अपने डिफेंस सेक्टर में भी दिखा रहा है और फाइटर जेट, ड्रोन और मिसाइल, तीनों क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक चीन के पास पहले से ही 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट के कई स्क्वाड्रन मौजूद हैं.
भारत के लिए इसका क्या मतलब
इसके मुकाबले भारत के पास फाइटर जेट के उतने स्क्वाड्रन नहीं हैं, जितने होने चाहिए. नई दिल्ली ने इस कमी को पाटने के लिए दो रास्ते अपनाए हैं, विदेश से लड़ाकू विमान खरीदना और साथ ही स्वदेशी टेक्नोलॉजी से नेक्स्ट जेनरेशन फाइटर जेट डेवलप करने का प्रोजेक्ट शुरू करना. वहीं मिसाइल के मामले में भारत की पकड़ पहले से ही मजबूत मानी जाती है. फुटेज के साथ आई तस्वीरों के कैप्शन में यह भी बताया गया है कि रेंज और वजन ले जाने की क्षमता, दोनों मामलों में भारत का राफेल फाइटर जेट इस नए चीनी स्टील्थ विमान से काफी पीछे है, यही वजह है कि इस नए बॉम्बर की मौजूदगी पर सिर्फ वॉशिंगटन ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में करीबी नजर रखी जा रही है.



















