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पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता ने भड़काऊ बयान देकर साधा अफगानिस्तान और भारत पर निशाना, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर उठे सवालदुनिया
2 अग॰ 2026, 1:27 am (3 घंटे पहले)· 2

पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता ने भड़काऊ बयान देकर साधा अफगानिस्तान और भारत पर निशाना, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर उठे सवाल

पाकिस्तानी सेना के मीडिया विंग के प्रवक्ता अहमद शरीफ चौधरी के हालिया बयानों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। धार्मिक विभाजन और आनुवंशिक पहचान पर दी गई टिप्पणी के बाद क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के साथ पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं।

पाकिस्तानी सेना के आधिकारिक सूचना विंग, डीजी आईएसपीआर के प्रवक्ता अहमद शरीफ चौधरी द्वारा आयोजित एक हालिया पत्रकार वार्ता ने कूटनीतिक और राजनीतिक गलियारों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। रावलपिंडी में दिए गए इस वक्तव्य के दौरान रक्षा प्रवक्ता ने न केवल गंभीर सांप्रदायिक और नफरत भरी बयानबाजी का सहारा लिया, बल्कि क्षेत्रीय देशों के बीच संबंधों को लेकर भी कई भड़काऊ टिप्पणियां कीं। विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामाबाद और रावलपिंडी के सैन्य-नागरिक प्रतिष्ठान में इस समय व्याप्त अभूतपूर्व आंतरिक दबाव और कूटनीतिक संकट की वजह से इस प्रकार की भाषा का उपयोग किया जा रहा है। अपने वक्तव्य में उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए कुछ समुदायों से दूरी बनाने की वकालत की और अफगानिस्तान तथा भारत के नागरिकों की सामाजिक एवं आनुवंशिक पहचान को लेकर विवादित दावे पेश किए। इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयानों के सामने आने के बाद पड़ोसी देशों के साथ पाकिस्तान के राजनयिक संबंधों में और अधिक कड़वाहट आने के संकेत मिले हैं, वहीं देश के भीतर निवास करने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं की जीवन सुरक्षा पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।

सांप्रदायिक बयानबाजी और आनुवंशिक पहचान का विवाद

पत्रकार वार्ता के दौरान सैन्य प्रवक्ता ने खुले तौर पर धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि विश्वासियों को गैर-विश्वासियों के साथ मित्रता नहीं रखनी चाहिए और ऐसा न करने वालों की धार्मिक पहचान पर सवाल खड़ा होता है। अहमद शरीफ चौधरी ने अपने संबोधन के दौरान विवाद को आगे बढ़ाते हुए कहा, "ईमान वालों को छोड़कर काफिरों को दोस्त ना बनाओ अगर तुम ऐसा करोगे तो प्रॉबलम है, फिर तुम मुस्लिम्स में नहीं आते।" इसके तुरंत बाद उन्होंने अफगान नागरिकों और भारतीयों के संबंधों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अफगान नागरिक अपने और भारतीयों के बीच एक समान आनुवंशिक संरचना यानी डीएनए होने की बात कहते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दोनों के बीच ऐसी समानता है, तो अफगान समुदाय की धार्मिक पहचान किस आधार पर तय होगी। इस प्रकार के अत्यंत संकीर्ण बयानों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की स्थिति को और अधिक असहज कर दिया है। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, किसी देश की आधिकारिक सेना के प्रवक्ता द्वारा इस स्तर की भाषा का प्रयोग करना सामान्य कूटनीतिक मर्यादाओं के सर्वथा विपरीत है। जब देश की सर्वोच्च सैन्य संस्था का कोई प्रतिनिधि इस तरह की विभाजनकारी भाषा का प्रयोग करता है, तो स्थानीय स्तर पर मौजूद कट्टरपंथी तत्वों को अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और हिंसा भड़काने का सीधा उकसावा मिलता है।

अफगानिस्तान और अफगान तालिबान पर तीखे हमले

एक समय था जब पाकिस्तान की रणनीतिक नीति में अफगान तालिबान को एक महत्वपूर्ण संपत्ति के रूप में देखा जाता था। हालांकि, बदलते घटनाक्रम के साथ अब यही तालिबान प्रशासन इस्लामाबाद प्रशासन के लिए एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बन चुका है। प्रेस वार्ता के दौरान डीजी आईएसपीआर ने काबुल में सत्तारूढ़ अफगान तालिबान व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि अफगान तालिबान की संपूर्ण शासन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था का संचालन केवल आतंकवाद के बल पर हो रहा है। सैन्य प्रवक्ता का दावा था कि प्रतिबंधित संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और अफगान प्रशासन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उन्होंने कहा कि काबुल का वर्तमान शासन अपने देश की सरकार, अर्थव्यवस्था और यहां तक कि अपनी विदेश नीति को भी केवल हिंसक गतिविधियों और दहशतगर्दी के जरिए ही चला रहा है। भारत और अफगानिस्तान के बीच विकसित हो रहे द्विपक्षीय संबंधों पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच केवल साझा डीएनए और आतंकवाद ही एकमात्र समानता है। इस प्रकार के तीखे बयानों से स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा पार तनाव और अधिक गहराने वाला है।

'फ़ितना-अल-खवारिज' और 'फ़ितना-अल-हिंदुस्तान' का नया नामकरण

अपनी आंतरिक सुरक्षा विफलताओं और प्रशासनिक कमजोरियों को छिपाने के लिए पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान और सरकार ने नए धार्मिक एवं अरबी शब्दावलियों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। हालिया पत्रकार वार्ता में सैन्य प्रवक्ता ने सशस्त्र विद्रोही गुटों को संबोधित करने के लिए नई शब्दावलियां प्रस्तुत कीं। पाकिस्तान सरकार ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को 'फ़ितना-अल-खवारिज' नाम दिया है, ताकि इस संगठन को धार्मिक विचारधारा से अलग थलग दिखाया जा सके। दूसरी ओर, बलूचिस्तान प्रांत में अपनी क्षेत्रीय स्वायत्तता और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे बलोच विद्रोही समूहों को पाकिस्तानी सेना द्वारा 'फ़ितना-अल-हिंदुस्तान' का नया तमगा दिया गया है। ऐसा करने के पीछे पाकिस्तानी सेना का मुख्य उद्देश्य बलूचिस्तान में उठने वाली हर राजनीतिक और स्थानीय आवाज के पीछे भारत का हाथ होने का दावा पेश करना है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में डीजी आईएसपीआर ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि एक ओर जहां बलोच विद्रोही एक धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं दूसरी ओर टीटीपी एक अत्यंत कट्टरपंथी धार्मिक संगठन है। इसके बावजूद दोनों अलग-अलग विचारधारा वाले संगठन पाकिस्तान के खिलाफ एक साथ मिलकर रणनीतिक अभियान संचालित कर रहे हैं। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के नए नामकरण का उद्देश्य अपनी घरेलू असफलताओं को बाहरी ताकतों पर थोपना मात्र है।

बलूचिस्तान में गहराता असंतोष और बाहरी ताकतों पर आरोप

पत्रकार वार्ता का एक बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान की वर्तमान स्थिति और वहां लंबे समय से चल रहे सशस्त्र विद्रोह पर केंद्रित रहा। सैन्य प्रवक्ता ने क्षेत्र में जारी हिंसा और अशांति के लिए पूरी तरह से बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि बलूचिस्तान के स्थानीय अभिजात वर्ग और आदिवासी सरदारों का एक साझा एजेंडा बन चुका है, जो बाहरी ताकतों के इशारे पर काम कर रहे हैं। रक्षा विंग के अनुसार, विदेशी शक्तियों को बलूचिस्तान के रणनीतिक महत्व, वहां मौजूद विशाल प्राकृतिक संसाधनों और तटीय 'ब्लू इकोनॉमी' की विशाल क्षमता का भली-भांति अहसास है। उन्होंने दावा किया कि जब बलूचिस्तान का आर्थिक विकास होगा, तो इससे पूरे पाकिस्तान की प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा। इसी कारण बाहरी ताकतें बलूचिस्तान के विकास को रोकने के लिए स्थानीय आतंकवादियों और आदिवासी सरदारों के साथ मिलकर सीधा हस्तक्षेप कर रही हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि बलूचिस्तान के नागरिक दशकों से जारी आर्थिक शोषण, राज्य द्वारा संचालित बर्बरता और युवाओं के रहस्यमय ढंग से गायब होने की घटनाओं से पीड़ित हैं। क्षेत्र के लोगों में व्याप्त इसी असंतोष ने विद्रोह का रूप लिया है, जिसे पाकिस्तान की सेना हमेशा से एक बाहरी साजिश बताकर खारिज करने का प्रयास करती रही है।

आंतरिक विफलताओं को छिपाने की पुरानी रणनीति

पाकिस्तान का राजनीतिक और सैन्य इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब भी वहां की सरकार या सेना आंतरिक मोर्चों पर पूरी तरह विफल होने लगती है, तो वे जनता का ध्यान भटकाने के लिए नफरती कार्ड खेलने लगते हैं। वर्तमान समय में पाकिस्तान गंभीर आर्थिक तंगी, महंगाई, राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ती उग्रवादी घटनाओं से जूझ रहा है। ऐसे में सेना द्वारा 'काफिरों', 'डीएनए' और भारत-विरोधी बयानबाज़ी का इस्तेमाल केवल अपने नागरिकों का ध्यान असली समस्याओं से हटाने की एक सोची-समझी कोशिश मानी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, किसी देश की आधिकारिक मीडिया विंग से इस प्रकार की सांप्रदायिक और नफरत फैलाने वाली बातें आना अत्यंत चिंताजनक है। इससे न केवल दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अस्थिरता और तनाव बढ़ता है, बल्कि पाकिस्तान के भीतर रह रहे अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भी जीवन बेहद असुरक्षित हो जाता है। दुनिया के तमाम प्रमुख देश अब इस बात को भली-भांति समझने लगे हैं कि अपनी प्रशासनिक विफलताओं का दोष दूसरों पर मढ़ने से पाकिस्तान का अपना घर सुरक्षित नहीं हो सकता। इसके लिए इस्लामाबाद को अपनी नीतियों में वास्तविक सुधार करने होंगे, न कि नफरती बयानों का सहारा लेना होगा।

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सवाल-जवाब

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने पत्रकार वार्ता में क्या विवादित बयान दिया?
सैन्य प्रवक्ता अहमद शरीफ चौधरी ने धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए गैर-विश्वासियों से दूरी बनाने की बात कही और अफगान तथा भारतीय नागरिकों के डीएनए की तुलना करते हुए विवादित सवाल उठाए।
अफगानिस्तान और अफगान तालिबान को लेकर क्या दावे किए गए?
पाकिस्तानी सेना ने आरोप लगाया कि काबुल में सत्तारूढ़ अफगान तालिबान प्रशासन और टीटीपी का पूरा कामकाज और अर्थव्यवस्था केवल आतंकवाद पर आधारित है।
टीटीपी और बलोच विद्रोहियों के लिए कौन से नए नाम जारी किए गए?
पाकिस्तान ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को 'फ़ितना-अल-खवारिज' और बलोच विद्रोही गुटों को 'फ़ितना-अल-हिंदुस्तान' का नया तमगा दिया है।
बलूचिस्तान में जारी असंतोष का क्या कारण बताया गया?
सैन्य प्रवक्ता ने बलूचिस्तान की अशांति के लिए बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप को जिम्मेदार ठहराया, जबकि स्थानीय स्तर पर यह असंतोष दशकों के शोषण और बर्बरता का परिणाम माना जाता है।
इस बयानबाजी से पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
आधिकारिक सैन्य मंच से नफरती और सांप्रदायिक टिप्पणियां आने से पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं और अन्य समुदायों के खिलाफ हिंसा भड़कने का खतरा बढ़ जाता है।
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