ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ईरान की भूमिका और उसके रुख को लेकर कई तरह के दावे सामने आए हैं। एक तरफ जहां पाकिस्तान ने यह दावा किया था कि उस सैन्य कार्रवाई के दौरान तेहरान ने उसका समर्थन किया था, वहीं दूसरी तरफ ईरानी पक्ष ने आधिकारिक और सार्वजनिक रूप से दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की थी और तनाव को तुरंत कम करने पर जोर दिया था। इस पूरे घटनाक्रम ने कूटनीतिक गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान के दावे
भारत की ओर से की गई इस सैन्य कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की तरफ से लगातार अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। पाकिस्तानी हलकों में यह प्रोपेगैंडा फैलाने की कोशिश की गई कि इस्लामिक देशों, विशेष रूप से ईरान का समर्थन उन्हें हासिल था। हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह के दावे अक्सर घरेलू जनता का ध्यान भटकाने और जमीनी हकीकत को छिपाने के लिए किए जाते हैं।
ईरान का वास्तविक आधिकारिक रुख
तनाव के उस दौर में ईरान के आधिकारिक बयानों ने स्पष्ट कर दिया था कि वह किसी भी पक्ष का आंख मूंदकर समर्थन करने से बच रहा था। ईरानी विदेश मंत्रालय और शीर्ष नेतृत्व ने सार्वजनिक मंचों पर साफ कहा था कि क्षेत्र में शांति बनाए रखना सबसे जरूरी है। भारत और पाकिस्तान दोनों को ही संयम का परिचय देना चाहिए ताकि बात और ज्यादा न बिगड़े। तेहरान का यह संतुलित बयान इस बात का सबूत था कि वह भारत के साथ अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी तवज्जो देता है।
सैन्य और कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की स्थिति
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने अपनी रणनीतिक और तकनीकी ताकत का लोहा मनवाया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रह्मोस जैसी अत्याधुनिक मिसाइलों और सटीक हमलों ने दुश्मन के ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया था। इस पूरे संघर्ष के दौरान भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों और त्वरित कार्रवाई की क्षमता से यह साबित कर दिया था कि देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। वहीं, विपक्षी दलों और सरकार के बीच संसद से लेकर बयानों के स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं, जहां रक्षा मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी कर स्थिति साफ की थी।





















