कभी भारत और रूस ने हाथ मिलाकर जिस ब्रह्मोस मिसाइल को तैयार किया था, अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि यही मिसाइल भारत से रूस की ओर लौट सकती है — इस बार खरीदार के तौर पर मॉस्को होगा। ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने दो-टूक कहा है कि अगर रूस की तरफ से ऑर्डर आता है तो कंपनी उसे पूरा करने के लिए तैयार बैठी है। यानी जिस हथियार को भारत ने अपनी सैन्य ताकत का बड़ा प्रतीक बनाया, वह आने वाले समय में रूसी सेना और नौसेना के शस्त्रागार का भी हिस्सा बन सकता है।
कंपनी के एमडी ने क्या कहा
अंतरराष्ट्रीय नौसेना प्रदर्शनी 'फ्लीट-2026' के दौरान ब्रह्मोस एयरोस्पेस के मैनेजिंग डायरेक्टर अलेक्जेंडर मैक्सीचेव ने रूसी समाचार एजेंसी TASS से बातचीत में यह संकेत दिया। उन्होंने कहा, 'अगर रूस की तरफ से इसकी मांग आती है तो हम ऑर्डर पूरा करने के लिए तैयार हैं. यह मिसाइल नौसेना के लिए हो सकती है या फिर रूसी आर्मी के लिए. हमारे पास पर्याप्त उत्पादन क्षमता है और हम समझते हैं कि रूस की जरूरत क्या है.'
दोनों देशों की साझा विरासत है ब्रह्मोस
ब्रह्मोस असल में भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस के NPO मशीनोस्ट्रोयेनिया रॉकेट डिजाइन ब्यूरो की संयुक्त परियोजना है। दिलचस्प बात यह है कि यही रूसी संस्था ओनिक्स एंटी-शिप क्रूज मिसाइल भी बनाती है। दोनों देशों ने 1995 में मिलकर ब्रह्मोस एयरोस्पेस की नींव रखी थी। इस मिसाइल का नाम भी दोनों मुल्कों की नदियों को जोड़कर बना है — भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मॉस्कवा। आज यह दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। माना जा रहा है कि अगर रूस यह मिसाइल खरीदता है तो वह इसे यूक्रेन में अमेरिकी हथियारों के मुकाबले उतार सकता है।
ऑपरेशन सिंदूर में दिखा था दम
इस मिसाइल की मारक क्षमता और सटीकता की चर्चा तब पूरी दुनिया में हुई, जब भारत ने पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर में इसका इस्तेमाल किया। ब्रह्मोस की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे जमीन, हवा और समुद्र — तीनों मोर्चों से दागा जा सकता है। भारतीय थलसेना, वायुसेना और नौसेना पहले से ही इसका इस्तेमाल कर रही हैं।
विदेशी बाजार में बढ़ती मांग
ब्रह्मोस का पहला विदेशी खरीदार फिलीपींस बना। फिलीपींस ने 2022 में 37.5 करोड़ डॉलर का समझौता किया था, जिसकी पहली खेप अप्रैल 2024 में और दूसरी खेप अप्रैल 2025 में पहुंचाई गई। इस सौदे के तहत फिलीपींस को 189 किमी रेंज वाली तीन बैटरियां मिल रही हैं, और इसके साथ ऑपरेटरों की ट्रेनिंग तथा लॉजिस्टिक सपोर्ट भी दिया जा रहा है। इसी महीने भारत ने वियतनाम को भी ब्रह्मोस की आपूर्ति की पुष्टि कर दी है। उधर सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला डायलॉग के दौरान एक वरिष्ठ भारतीय रक्षा अधिकारी ने जानकारी दी कि इंडोनेशिया के साथ भी बातचीत अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।













