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प्रशांत महासागर की गर्माहट से बढ़ेगा मौसमी संकट, साल के अंत में चरम पर पहुंचेगा एल नीनोदुनिया
9 अक्तू॰ 2026, 1:54 pm (21 दिन पहले)· 0

प्रशांत महासागर की गर्माहट से बढ़ेगा मौसमी संकट, साल के अंत में चरम पर पहुंचेगा एल नीनो

विश्व मौसम संगठन ने प्रशांत महासागर में एल नीनो के मजबूत होने को लेकर आगाह किया है, जिसका चरम प्रभाव दिसंबर में दिखने का अनुमान है।

भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह पर तापमान में हो रही असामान्य बढ़ोतरी के कारण दुनिया भर में मौसमी असंतुलन गहराने का खतरा पैदा हो गया है। आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर कई इलाकों को गंभीर सूखे का सामना करना पड़ सकता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में अप्रत्याशित रूप से मूसलाधार बारिश और बाढ़ की परिस्थितियां बन सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध विश्व मौसम संगठन ने इस संदर्भ में आगाह करते हुए स्पष्ट किया है कि वर्तमान मौसमी परिघटना का सबसे गंभीर और व्यापक प्रभाव अभी सामने आना बाकी है, जो इस वर्ष के अंतिम चरण में अपने उच्चतम स्तर को छू सकता है।

दिसंबर में दिखेगा एल नीनो का सबसे उग्र रूप

विश्व मौसम संगठन के अनुसार वर्तमान में जारी एल नीनो चक्र अभी समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि यह धीरे-धीरे और अधिक सक्रिय होता जा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों का आकलन है कि अक्टूबर से दिसंबर के दौरान यह मौसमी बदलाव अपने चरम पर पहुंच जाएगा। इस परिघटना के प्रभाव से पृथ्वी के व्यापक भूभागों में औसत तापमान सामान्य से कहीं अधिक दर्ज किया जा सकता है। वर्षा के पारंपरिक चक्र में बड़ा फेरबदल होने के कारण एक तरफ जहां जलाभाव और सूखे के हालात पैदा होंगे, वहीं दूसरी तरफ कुछ हिस्सों में अत्यधिक वर्षा से बाढ़ जैसी आपदाएं सामने आ सकती हैं।

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एल नीनो मूल रूप से एक महासागरीय और वायुमंडलीय घटना है, जो प्रशांत महासागर के सतही जल के अत्यधिक गर्म होने पर सक्रिय होती है। विश्व मौसम संगठन की महासचिव सेलेस्टे साउलो के अनुसार,

"एल नीनो मजबूती से स्थापित हो चुका है और तेजी से मजबूत हो रहा है।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुमानों के आधार पर फरवरी 2027 तक इस परिघटना के सक्रिय रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है। यदि यह गति बनी रहती है, तो यह 1950 के बाद से दर्ज की गई सबसे शक्तिशाली मौसमी घटनाओं में शामिल हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह मौसमी दबाव 2027 के वसंत ऋतु तक खिंच सकता है, जिससे फरवरी के आसपास तक विषम मौसमी परिस्थितियां बनी रह सकती हैं।

भारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर दिखा प्रतिकूल प्रभाव

इस मौसमी उथल-पुथल की सीधी मार भारतीय उपमहाद्वीप पर भी साफ देखी गई है। देश में इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज करने के साथ समाप्त हुआ है। पर्याप्त मानसूनी वर्षा न होने के कारण महाराष्ट्र और कर्नाटक के व्यापक क्षेत्रों में आधिकारिक तौर पर सूखा घोषित करना पड़ा है। पानी की गंभीर किल्लत से निपटने और जल संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से महाराष्ट्र प्रशासन ने कई जिलों में जलापूर्ति में 10 प्रतिशत की कटौती भी लागू की है।

यूरोप में नदियों का जलस्तर घटा और गर्मी के रिकॉर्ड टूटे

महासागरों के बढ़ते तापमान और मौसमी बदलावों का असर पश्चिमी देशों में भी बेहद स्पष्ट रूप से दिखाई दिया है। यूरोप में इस वर्ष ग्रीष्मकाल के दौरान अब तक की सबसे भीषण गर्मी दर्ज की गई, जिसने पूर्व के सभी कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में पारा सामान्य से कहीं ऊपर पहुंच गया। अत्यधिक ताप और कम वर्षा की वजह से डेन्यूब, राइन और टेम्स जैसी प्रमुख ऐतिहासिक नदियों का जलस्तर तेजी से गिर गया और कई स्थानों पर वे लगभग सूखने के कगार पर पहुंच गईं, जहां अब नाममात्र का पानी शेष बचा है।

महासागरीय तापमान में दर्ज हुआ तेज उछाल

प्राकृतिक रूप से यह समुद्री-वायुमंडलीय प्रक्रिया प्रत्येक दो से सात वर्षों के अंतराल में दोहराई जाती है, जिसके मुख्य रूप से तीन चरण होते हैं। इनमें पहला गर्म चरण एल नीनो कहलाता है, दूसरा सामान्य चरण होता है, जबकि तीसरा ठंडा चरण ला नीना के नाम से जाना जाता है। हालिया महीनों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के तापमान में अप्रत्याशित तेजी देखी गई है। आंकड़ों के अनुसार अगस्त में नीनो 3.4 क्षेत्र में सतही जल का तापमान सामान्य औसत से 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया था। यह विसंगति सीधे तौर पर वर्षा के सामान्य वितरण को प्रभावित करती है, जिसके कारण दुनिया भर की सरकारों और आम नागरिकों को आगामी जटिल मौसम के लिए सतर्क रहने की आवश्यकता है।

सवाल-जवाब

एल नीनो क्या है और यह कैसे बनता है?
एल नीनो एक समुद्री और वायुमंडलीय परिघटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इससे दुनिया भर के मौसम और वर्षा चक्र पर व्यापक असर पड़ता है।
विश्व मौसम संगठन ने एल नीनो के चरम को लेकर क्या चेतावनी दी है?
विश्व मौसम संगठन के अनुसार यह परिघटना अक्टूबर से दिसंबर के दौरान अपने चरम पर पहुंचेगी और इसके प्रभाव से वैश्विक तापमान सामान्य से काफी ऊपर जा सकता है।
वर्तमान एल नीनो कब तक जारी रहने की संभावना है?
पूर्वानुमानों के मुताबिक फरवरी 2027 तक इसके सक्रिय रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है, और यह संकट 2027 के वसंत तक खिंच सकता है।
भारत के मॉनसून पर इस साल क्या प्रभाव पड़ा है?
भारत का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश के साथ समाप्त हुआ है, जिसके कारण महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखा घोषित करना पड़ा है।
महाराष्ट्र में जल संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठाया गया है?
जल संतुलन बनाए रखने के लिए महाराष्ट्र प्रशासन ने कई जिलों में 10 प्रतिशत पानी की कटौती लागू की है।
यूरोप में इस मौसमी बदलाव का क्या असर देखा गया?
यूरोप में इतिहास की सबसे गर्म गर्मियां दर्ज की गईं, फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन में तापमान के रिकॉर्ड टूटे और डेन्यूब, राइन तथा टेम्स जैसी प्रमुख नदियां सूखने की कगार पर पहुंच गईं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rohan Verma@rohan-verma·19 दिन पहले

महाराष्ट्र और कर्नाटक में पानी की कटौती सचमुच डरावनी है। जब फरवरी 2027 तक ऐसा ही हाल रहने की बात सामने आती है, तो समझ आता है कि आने वाले दिन कितने मुश्किल होने वाले हैं।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·19 दिन पहले

मौसम विभाग का हर बार यही रहता है कि साल के अंत तक सब कुछ चरम पर पहुंच जाएगा, पर असल में दक्षिण एशिया में तो हर साल ही मॉनट्रियल और बारिश का ऐसा हाल रहता है। इस बार सीधे एल नीनो पर सब कुछ मढ़ देना थोड़ा अजीब लगता है, जबकि स्थानीय नीतियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·19 दिन पहले

आयशा जी, आपकी बात ठीक है। पिछले साल जब मैं कैलिफ़ोर्निया में था, तब भी सूखे और पानी की कटौती को सिर्फ मौसम पर टाल दिया गया था, जबकि असल दिक्कत स्थानीय कुप्रबंधन की थी।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·19 दिन पहले

मौसम का ये मिजाज पूरी दुनिया की इकॉनमी और ऊर्जा बाजारों पर भारी पड़ने वाला है। जब खेती और पानी का संकट गहराएगा, तो महंगाई खुद-ब-खुद बढ़ जाएगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·19 दिन पहले

उमर भाई, आपकी बात बिल्कुल सही है। पिछले महीने जब पुणे में पानी की कटौती शुरू हुई थी, तो घर चलाना मुश्किल हो गया था।

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