अमेरिका और इजराइल ने अपने साझा सैन्य अभियान और ईरान के साथ जारी संघर्ष को निर्णायक मोड़ पर ले जाने के लिए अब तक के सबसे कड़े वित्तीय प्रतिबंधों की घोषणा की है। वॉशिंगटन का दावा है कि इस अभूतपूर्व आर्थिक आक्रामक रुख से ईरान पर शिकंजा कसा जाएगा। हालांकि, ईरानी हुकूमत के लिए अमेरिकी पाबंदियां कोई नई बात नहीं हैं। साल 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही यह देश लगातार अमेरिकी प्रतिबंधों के साये में जीता आया है। इन दशकों के दौरान ईरान ने अपनी अर्थव्यवस्था को ऐसे राष्ट्रों के साथ व्यापारिक रिश्तों में पिरोया है जो या तो अमेरिकी दबाव को नजरअंदाज करने का लंबा इतिहास रखते हैं या फिर ईरान के साथ कारोबार पूरी तरह बंद करने का जोखिम नहीं उठा सकते।
इन परिस्थितियों के चलते ईरानी प्रशासन का कहना है कि वह नए अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है। दूसरी ओर, कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार भी अमेरिकी कदमों का असर सीमित ही रहने वाला है। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर ईरान का मुख्य कारोबार किन देशों के साथ है और क्या अमेरिका के कथित आर्थिक डी-डे का कोई वास्तविक प्रभाव देखने को मिल सकेगा?
चीन: ईरान का सबसे बड़ा निर्यात बाजार
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र (International Trade Centre) के आंकड़ों के मुताबिक, चीन ईरानी वस्तुओं का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। साल 2025 में ईरान के कुल निर्यात का 26.9% हिस्सा अकेले चीन को गया था। हालांकि, इन आंकड़ों को समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना जरूरी है, क्योंकि यह रिपोर्ट अमेरिका और इजराइल के साथ ईरान का मौजूदा संघर्ष शुरू होने से पहले की अवधि को कवर करती है। पहला यह कि कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि संघर्ष शुरू होने से पहले भी चीन को होने वाले ईरानी तेल की बिक्री के आंकड़े राजनीतिक कारणों से कम करके दर्ज किए जाते रहे हैं। दूसरा यह कि इस संस्था ने ईरान से सीधे अप-डेट आंकड़े मिलने में आने वाली कठिनाइयों के कारण ज्यादातर व्यापारिक साझीदार देशों द्वारा घोषित आयात डेटा के आधार पर ही ईरान के निर्यात की गणना की है। तीसरा यह कि इराक जैसे कुछ पड़ोसी देशों के आयात आंकड़े अधूरे हैं।
इन सीमाओं के बावजूद, बीजिंग की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट है कि ईरान के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते कितने अहम हैं। चीन ने अमेरिकी घोषणा की तीखी आलोचना करते हुए इसे अवैध और एकतरफा प्रतिबंध करार दिया। चीनी अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के आर्थिक दबाव से किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता और बीजिंग अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध रहेगा।
तुर्की और पाकिस्तान: पड़ोसी देशों की उलझनें
व्यापार आंकड़ों के अनुसार, तुर्की भी ईरान का एक बड़ा व्यापारिक साझीदार है, लेकिन चीन के विपरीत अंकारा के वॉशिंगटन के साथ काफी गहरे और मित्रवत संबंध हैं। यह स्थिति तुर्की के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती पेश करती है। अमेरिका ने पहले ही चेतावनी दी है कि जो देश ईरान के साथ व्यापार जारी रखेंगे, उन्हें सख्त आर्थिक दंड भुगतना पड़ सकता है। नाटो का एकमात्र ऐसा सदस्य देश होने के नाते जिसकी सीमा ईरान से मिलती है, तुर्की को एक तरफ अपने सैन्य सहयोगियों के साथ समीकरण बिठाने हैं तो दूसरी तरफ अपने करीबी आर्थिक पड़ोसी के साथ रिश्ते भी बनाए रखने हैं।
तुर्की की तरह पाकिस्तान की सीमा भी ईरान से सटी हुई है और वह भी ईरान के प्रमुख निर्यात साझीदारों में शामिल है। लेकिन तुर्की से एक बड़ा फर्क यह है कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात बाजार खुद अमेरिका है, जिसका अर्थ है कि वॉशिंगटन द्वारा किसी भी प्रकार की आर्थिक कार्रवाई किए जाने पर पाकिस्तान को बहुत कुछ गंवाना पड़ सकता है। इसके अलावा, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ताओं में एक अहम मध्यस्थ की भूमिका भी निभा रहा है। यदि इन दोनों देशों के साथ पाकिस्तान के संबंधों में खटास आती है, तो इस पूरे क्षेत्रीय संघर्ष का हल तलाशना और भी ज्यादा जटिल हो जाएगा।
एक और जटिल पहलू यह है कि पाकिस्तान और ईरान के बीच होने वाला पूरा व्यापार सरकारी नियंत्रण के दायरे में नहीं आता है। ईरान के साथ युद्ध शुरू होने से पहले भी यह स्थिति थी, लेकिन उपलब्ध डेटा संकेत देता है कि संघर्ष के बाद से इस तरह की गतिविधियों में और तेजी आई है। हालांकि अमेरिकी और पाकिस्तानी तेल कंपनियों ने इस्लामाबाद सरकार पर इस अवैध कारोबार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का दबाव बनाया है, लेकिन लगभग 900 किलोमीटर लंबी उस दूरदराज और दुर्गम सीमा पर पुलिसिंग करना सरकार के लिए बेहद कठिन साबित हुआ है। इस विषय पर टिप्पणी के लिए पहले भी संपर्क किया गया था, लेकिन ईरानी सरकार ने इस ईंधन तस्करी के आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी।
आर्मीनिया और वैश्विक प्रतिबंधों का दायरा
व्यापार आंकड़ों के अनुसार आर्मीनिया भी ईरान के प्रमुख व्यापारिक सहयोगियों की सूची में आता है। लेकिन अन्य देशों के मुकाबले आर्मीनिया की स्थिति इस लिहाज से अलग है कि उसका मुख्य निर्यात गंतव्य रूस है। साल 2025 में आर्मीनिया द्वारा बेचे गए कुल सामानों में से 34.9% हिस्सा रूस को गया था। यह तथ्य तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम यह याद रखें कि रूस खुद साल 2022 में यूक्रेन पर अपने पूर्ण आक्रमण के बाद से अमेरिका और उसके सहयोगियों के भारी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि आर्मीनिया बढ़ता अमेरिकी दबाव होने के बावजूद ईरान के साथ अपना व्यापार जारी रखने को लेकर तैयार हो सकता है।
विशेषज्ञों की राय और वैश्विक बाजारों की प्रतिक्रिया
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का कहना है कि ईरान के खिलाफ लगाए जा रहे ये नए प्रतिबंध शिकंजा कसेंगे और आय के हर संभावित स्रोत को पूरी तरह अवरुद्ध कर देंगे। इसके बावजूद, कई विशेषज्ञ इस दावे से इत्तेफाक नहीं रखते। सलाहकार फर्म ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का आकलन है कि ईरानी राजस्व पर इन प्रत्यक्ष प्रतिबंधों का असर बहुत ज्यादा बड़ा नहीं होगा, बल्कि यह एक फीके पटाखे जैसा साबित होगा।
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के उप निदेशक अली वैज ने इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि ईरान में जो कुछ भी हिलता-डुलता है, उस पर पहले से ही कई स्तरों के प्रतिबंध लग चुके हैं। उनका कहना था, असली सवाल अब इन पाबंदियों के क्रियान्वयन का है, क्योंकि क्या अमेरिका के पास वास्तव में वह ताकत है कि वह उन देशों पर भारी जुर्माने और लेवी लगा सके जो ईरान के साथ कारोबार करना बंद नहीं कर रहे हैं? उन्होंने याद दिलाया कि पिछले साल ही अमेरिका ने चीन के साथ एक आर्थिक युद्ध की शुरुआत की थी, लेकिन बाद में उसे पीछे हटना पड़ा था।
विदेश विभाग की पूर्व वरिष्ठ सलाहकार आया इब्राहिम ने चेतावनी दी कि प्रणालियों पर अत्यधिक अमेरिकी निर्भरता अन्य देशों को इस सिस्टम से बचने के नए रास्ते तलाशने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने यह चिंता भी जताई कि इन प्रतिबंधों का सबसे बुरा असर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बजाय आम जनता पर पड़ सकता है, क्योंकि ऐसी पाबंदियां लोगों को जिंदा रहने के लिए जरूरी बुनियादी जरूरतों से भी वंचित कर देती हैं।
दूसरी ओर, इन घोषणाओं के बाद वैश्विक बाजारों की प्रतिक्रिया बेहद ठंडी और संभली हुई रही है। इस खबर के सामने आते ही वैश्विक तेल की कीमतों में कुछ गिरावट जरूर दर्ज की गई, लेकिन इसके बावजूद दाम युद्ध-पूर्व के स्तरों से अभी भी काफी ऊंचे बने हुए हैं। स्टॉक मार्केट के निवेशकों पर इस खबर का और भी कम असर हुआ, क्योंकि अमेरिका, यूरोप और एशिया के प्रमुख बाजारों के सूचकांकों में बमुश्किल ही कोई फेरबदल देखने को मिला। साफ है कि अर्थशास्त्रियों, निवेशकों और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों को यह विश्वास दिलाने में अमेरिका को अभी लंबा सफर तय करना होगा कि उसकी इस नई प्रतिबंधात्मक धमकी को पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।



















