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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परमाणु बम के धमाके से दहल उठा था हिरोशिमा, जानिए इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी की दास्तानदुनिया
6 अग॰ 2026, 4:41 pm (11 घंटे पहले)· 0

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परमाणु बम के धमाके से दहल उठा था हिरोशिमा, जानिए इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी की दास्तान

6 अगस्त 1945 की सुबह जापान के हिरोशिमा शहर पर अमेरिका ने 'लिटिल बॉय' नाम का पहला परमाणु बम गिराया था, जिससे पल भर में पूरा शहर तबाह हो गया।

वर्ष 1945 में 6 अगस्त की सुबह जापान के हिरोशिमा शहर में हर दिन की तरह सामान्य गतिविधियों के साथ शुरू हुई थी। नागरिक अपने दैनिक कार्यों में लगे थे और सड़कों पर सामान्य चहल-पहल थी। हालांकि, सुबह के समय आसमान में उड़ते एक अमेरिकी सैन्य विमान के दिखाई देने के कुछ ही क्षण बाद एक अप्रत्याशित घटना घटी। पलक झपकते ही क्षितिज पर ऐसी तीव्र रोशनी फैली जिसने आसपास मौजूद हर व्यक्ति की आंखों को चौंधिया दिया। इस तीव्र प्रकाश के तुरंत बाद एक अकल्पनीय क्षमता वाला परमाणु विस्फोट हुआ, जिसने हिरोशिमा को क्षण भर में आग और राख के ढेर में बदल दिया। इस भयावह घटना ने न केवल एक पूरे जीवंत शहर का अस्तित्व मिटा दिया, बल्कि मानव इतिहास की दिशा को भी सदैव के लिए बदल कर रख दिया।

मैनहैटन प्रोजेक्ट और परमाणु बम का निर्माण

द्वितीय विश्व युद्ध के घटनाक्रम को समझने के लिए इस हमले की पृष्ठभूमि में जाना आवश्यक है। वर्ष 1945 तक यूरोपीय मोर्चे पर जर्मनी आत्मसमर्पण कर चुका था, परंतु प्रशांत महासागर के क्षेत्र में जापानी सेनाएं मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध कड़ा मुकाबला कर रही थीं। अमेरिकी सैन्य रणनीतिकारों को यह आशंका थी कि यदि जापान की मुख्य भूमि पर पैदल सेना से हमला किया गया, तो युद्ध में उनके लाखों सैनिकों की जान जा सकती है। इसी संभावित जनहानि से बचने के उद्देश्य से अमेरिका ने अपने अत्यंत गोपनीय परमाणु कार्यक्रम का सहारा लेने का निर्णय लिया।

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इस गुप्त अभियान की शुरुआत वर्ष 1939 में वैज्ञानिकों द्वारा दी गई उस चेतावनी के बाद हुई थी, जिसमें परमाणु ऊर्जा के माध्यम से अत्यंत विनाशकारी हथियार निर्मित करने की संभावना जताई गई थी। इसके जवाब में अमेरिका ने ब्रिटेन और कनाडा के साथ मिलकर एक साझा गोपनीय मिशन प्रारंभ किया, जिसे 'मैनहैटन प्रोजेक्ट' नाम दिया गया। लगभग दो अरब डॉलर की विशाल धनराशि और हजारों शीर्ष वैज्ञानिकों के निष्ठावान प्रयासों के बल पर यह परियोजना संचालित हुई। वर्षों की निरंतर शोध के पश्चात, जुलाई 1945 में न्यू मैक्सिको के मरुस्थलीय क्षेत्र में दुनिया का पहला परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जिसे 'ट्रिनिटी टेस्ट' के नाम से जाना जाता है।

हिरोशिमा को ही निशाना क्यों चुना गया?

परमाणु बम के इस्तेमाल का अंतिम निर्णय लेने के बाद अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने लक्ष्य के रूप में जापान के कई प्रमुख शहरों का गहन अध्ययन किया। अंततः हिरोशिमा को प्राथमिक निशाना बनाने पर सहमति बनी। इस चुनाव के पीछे कई रणनीतिक कारण मौजूद थे। पहला प्रमुख कारण यह था कि हिरोशिमा में जापानी सेना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्रीय मुख्यालय स्थित था। इसके अलावा, युद्ध के दौरान अन्य शहरों की तुलना में हिरोशिमा पहले से हुए हवाई हमलों और बमबारी से काफी हद तक सुरक्षित बचा हुआ था। अमेरिकी प्रशासन चाहता था कि इस नए हथियार के वास्तविक विनाशकारी प्रभाव को पूरी दुनिया स्पष्ट रूप से देख सके, इसलिए हिरोशिमा को मुख्य लक्ष्य के रूप में चिन्हित किया गया।

एनोला गे की उड़ान और 'लिटिल बॉय' का धमाका

6 अगस्त 1945 की तड़के अमेरिकी वायु सेना का B-29 बॉम्बर विमान, जिसका नाम 'एनोला गे' रखा गया था, टिनियन द्वीप के सैन्य अड्डे से उड़ान भरकर जापान की सीमा में प्रविष्ट हुआ। इस ऐतिहासिक और संवेदी मिशन की कमान पायलट कर्नल पॉल टिब्बेट्स के हाथों में थी। विमान के पेंदे में यूरेनियम आधारित एक विनाशकारी परमाणु बम लोड किया गया था, जिसका कुल वजन लगभग चार टन था और जिसे 'लिटिल बॉय' कोड नाम दिया गया था। सम्पूर्ण अभियान को इतनी गोपनीयता के साथ अंजाम दिया जा रहा था कि जापानी रक्षा प्रणाली को इसकी कोई पूर्व सूचना नहीं मिल सकी।

सुबह ठीक 8 बजकर 15 मिनट पर एनोला गे विमान से 'लिटिल बॉय' को हिरोशिमा शहर के ठीक ऊपर छोड़ दिया गया। हवा में गिरते हुए लगभग 43 सेकंड का समय बीतने के पश्चात, जमीन से करीब 600 मीटर की ऊंचाई पर इस बम में भीषण धमाका हुआ। विस्फोट के साथ ही उत्पन्न हुई प्रचंड गर्मी, पराबैंगनी किरणों के प्रभाव और विनाशकारी आघात तरंगों ने पल भर में पूरे शहर को मलबे में तब्दील कर दिया। शहर की हजारों इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं और चारों तरफ भीषण आग की लपटें फैल गईं, जिससे नागरिकों को संभलने अथवा सुरक्षित स्थान पर भागने का कोई अवसर नहीं मिल सका।

तत्काल तबाही और रेडिएशन के दूरगामी परिणाम

धमाके के क्षणिक प्रभाव से ही हिरोशिमा में लगभग 70 से 80 हजार लोगों की मौके पर ही दुखद मृत्यु हो गई। विस्फोट के केंद्र के पास मौजूद तापमान इतना अधिक था कि अनगिनत लोग क्षण भर में जलकर राख हो गए, जिससे उनकी पहचान तक करना असंभव हो गया। हजारों की संख्या में नागरिक ढही हुई इमारतों के भारी मलबे के नीचे दब गए। इस प्रलयकारी दृश्य के बाद पूरे क्षेत्र में केवल चीख-पुकार और तबाही का मंजर था। शहर के लगभग सभी अस्पताल और चिकित्सा केंद्र पूरी तरह नष्ट हो चुके थे, जिसके कारण जीवित बचे गंभीर घायलों तक बुनियादी प्राथमिक चिकित्सा पहुंचाना भी असंभव साबित हो रहा था।

प्रारंभिक तबाही से बच निकलने वाले लोगों के लिए विपदा यहीं समाप्त नहीं हुई। विस्फोट के उपरांत फैले रेडियोधर्मी विकिरण ने बचे हुए नागरिकों के जीवन पर प्राणघातक प्रहार किया। आने वाले समय में हजारों लोग कैंसर, ल्यूकेमिया और अन्य गंभीर असाध्य बीमारियों की चपेट में आ गए। इतना ही नहीं, जन्म लेने वाले अनेक शिशुओं में गंभीर जन्मजात शारीरिक और मानसिक विकार देखने को मिले। परमाणु विकिरण का यह अदृश्य और जहरीला प्रभाव केवल उसी समय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पीड़ितों की आने वाली कई पीढ़ियों ने भी इसके दर्दनाक दुष्परिणामों को झेला।

नागासाकी पर हमला और द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति

हिरोशिमा पर हुए इस अभूतपूर्व हमले के बाद भी जापानी नेतृत्व ने तुरंत आत्मसमर्पण करने की घोषणा नहीं की। इसके परिणामस्वरूप, अमेरिका ने हमले के ठीक तीन दिन बाद, यानी 9 अगस्त 1945 को जापान के एक अन्य औद्योगिक शहर नागासाकी पर 'फैट मैन' नाम का दूसरा प्लूटोनियम आधारित परमाणु बम गिरा दिया। नागासाकी में हुए इस दूसरे धमाके ने भी हजारों निर्दोष लोगों की जान ले ली। लगातार दो शहरों पर हुए इन विध्वंसकारी हमलों ने जापान की सैन्य संरचना, राजनीतिक शक्ति और युद्ध जारी रखने की क्षमता को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया।

आखिरकार परिस्थितियों की विभीषिका को देखते हुए 15 अगस्त 1945 को जापान के सम्राट हिरोहितो ने राष्ट्रीय रेडियो प्रसारण के माध्यम से मित्र राष्ट्रों के समक्ष बिना शर्त आत्मसमर्पण करने का ऐतिहासिक ऐलान किया। इसके बाद 2 सितंबर 1945 को औपचारिक रूप से संधि दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके साथ ही मानव इतिहास का सबसे भयानक संघर्ष यानी द्वितीय विश्व युद्ध आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गया। यद्यपि युद्ध का अंत हो गया, किंतु हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी विश्व सभ्यता के इतिहास में एक अमिट और पीड़ादायक अध्याय के रूप में दर्ज हो गई।

वर्तमान समय में हिरोशिमा का पुनर्निर्माण हो चुका है और यह एक समृद्ध तथा आधुनिक शहर के रूप में स्थापित है। तथापि, शहर में स्थित पीस मेमोरियल, एटॉमिक बॉम्ब डोम और वहां का संग्रहालय आज भी हर वर्ष आने वाले लाखों अंतरराष्ट्रीय आगंतुकों को 6 अगस्त 1945 के उस भयानक सवेरे और परमाणु हथियारों के विनाशकारी परिणामों की याद दिलाते हैं।

सवाल-जवाब

हिरोशिमा पर परमाणु बम कब और किस समय गिराया गया था?
अमेरिका ने 6 अगस्त 1945 की सुबह 8 बजकर 15 मिनट पर हिरोशिमा शहर पर परमाणु बम गिराया था।
हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम का नाम और वजन क्या था?
इस परमाणु बम का कोड नाम 'लिटिल बॉय' था, जो यूरेनियम आधारित था और इसका वजन लगभग 4 टन था।
हिरोशिमा हमले को अंजाम देने वाले विमान और पायलट कौन थे?
इस मिशन को अमेरिकी वायु सेना के B-29 बॉम्बर जेट 'एनोला गे' के जरिए अंजाम दिया गया था, जिसकी कमान पायलट कर्नल पॉल टिब्बेट्स के पास थी।
अमेरिका ने परमाणु हमले के लिए हिरोशिमा शहर को ही क्यों चुना?
हिरोशिमा में जापानी सेना का एक बड़ा मुख्यालय मौजूद था और यह शहर पूर्ववर्ती हवाई बमबारी से लगभग सुरक्षित बचा हुआ था, जिससे बम के वास्तविक प्रभाव का आकलन संभव था।
हिरोशिमा में हुए परमाणु विस्फोट में तुरंत कितने लोगों की जान गई थी?
धमाके के तुरंत बाद और शुरुआती कुछ ही समय में लगभग 70 से 80 हजार लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी।
नागासाकी पर दूसरा परमाणु हमला कब हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध कब खत्म हुआ?
नागासाकी पर 9 अगस्त 1945 को 'फैट मैन' बम गिराया गया, जिसके बाद 15 अगस्त को जापान के सम्राट हिरोहितो ने आत्मसमर्पण की घोषणा की और 2 सितंबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ।
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