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मात्र 38 मिनट में समाप्त हुआ आंग्ल जांजीबार युद्ध और 1896 के इस सबसे छोटे सैन्य संघर्ष की पूरी दास्तानदुनिया
27 अग॰ 2026, 7:30 pm (1 घंटे पहले)· 2

मात्र 38 मिनट में समाप्त हुआ आंग्ल जांजीबार युद्ध और 1896 के इस सबसे छोटे सैन्य संघर्ष की पूरी दास्तान

27 अगस्त 1896 को ब्रिटिश साम्राज्य और जांजीबार के बीच छिड़ी सैन्य जंग केवल 38 मिनट में खत्म हो गई थी। उत्तराधिकार विवाद के कारण हुए इस हमले में 500 से अधिक लोग मारे गए थे।

मानव इतिहास में युद्धों की एक लंबी और दर्दनाक शृंखला रही है, जिनमें से कई संघर्ष दशकों तक खिंचते रहे और लाखों जिंदगियों को निगल गए। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध इसके प्रमुख उदाहरण हैं। हालांकि, औपनिवेशिक इतिहास के पन्नों में एक ऐसी सैन्य भिड़ंत भी दर्ज है जो किसी चाय के उबलने या टीवी कार्यक्रम के एक छोटे हिस्से जितना समय भी पूरा न ले सकी। 27 अगस्त 1896 की सुबह ब्रिटिश साम्राज्य और पूर्वी अफ्रीकी द्वीप जांजीबार के बीच लड़ा गया यह युद्ध मात्र 38 मिनट में अपने अंजाम तक पहुँच गया था। इस अभूतपूर्व और संक्षिप्त सैन्य कार्रवाई को आधिकारिक तौर पर आंग्ल जांजीबार युद्ध के रूप में जाना जाता है, जिसमें सत्ता के लालच, कूटनीतिक तनातनी और नौसैनिक बमबारी का ऐसा खूनी खेल देखने को मिला जिसने जांजीबार की स्वतंत्रता को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

1890 की ब्रिटिश जर्मन संधि और जांजीबार का औपनिवेशिक ढांचा

इस पूरे ऐतिहासिक घटनाक्रम की जड़ें उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में फैली हुई थीं। वर्ष 1890 में यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ब्रिटेन और जर्मनी के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समझौता संपन्न हुआ था। इस संधि के माध्यम से पूर्वी अफ्रीका के विस्तृत भूभाग को दोनों शक्तियों के बीच प्रभाव क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया। इसी समझौते के तहत जांजीबार द्वीप पर ब्रिटिश शासन का अप्रत्यक्ष नियंत्रण और संरक्षक अधिकार स्थापित हो गया। वर्तमान समय में जांजीबार तंजानिया का एक स्वायत्त हिस्सा है, लेकिन उस युग में यह हिंद महासागर का एक रणनीतिक व्यापारिक केंद्र हुआ करता था।

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अंग्रेजों ने अपनी औपनिवेशिक नीतियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपनी पसंद के स्थानीय सुल्तान को गद्दी पर बैठाया। सुल्तान हमद बिन थुवैनी ब्रिटिश हुकूमत के बेहद वफादार सहयोगी माने जाते थे और उनके शासनकाल के दौरान क्षेत्र में औपनिवेशिक प्रशासन शांतिपूर्वक चल रहा था। ब्रिटिश अधिकारी जांजीबार के आंतरिक मामलों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए हुए थे और द्वीप का पूरा राजनीतिक ढांचा ब्रिटिश रेजीडेंसी के निर्देशों के अनुसार ही संचालित होता था।

सुल्तान हमद की संदिग्ध मौत और खालिद बिन बरगश का अवैध कब्जा

सब कुछ पूर्व निर्धारित व्यवस्था के तहत सुचारू रूप से चल रहा था, लेकिन 25 अगस्त 1896 को अचानक एक ऐसी घटना घटी जिसने संपूर्ण राजनीतिक परिदृश्य को अस्थिर कर दिया। सुल्तान हमद बिन थुवैनी की महल के भीतर अचानक संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। कूटनीतिक गलियारों में यह आशंका जताई गई कि उन्हें जहर दिया गया था। सुल्तान की सांसें थमते ही उनके महत्वाकांक्षी भतीजे खालिद बिन बरगश ने बिना कोई समय गंवाए खुद को जांजीबार का नया सुल्तान घोषित कर दिया और शाही महल पर अपना अधिकार जमा लिया।

वर्ष 1890 के ब्रिटिश जांजीबार समझौते की शर्तों के अनुसार, जांजीबार के सिंहासन पर आसीन होने वाले किसी भी नए शासक के लिए ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास की पूर्व अनुमति और औपचारिक मंजूरी प्राप्त करना अनिवार्य कानूनी प्रावधान था। खालिद बिन बरगश ने इस स्थापित औपनिवेशिक नियम को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया। अंग्रेजों के लिए खालिद का यह एकतरफा कदम सिर्फ एक राजनीतिक उल्लंघन नहीं था, बल्कि इसे सीधे तौर पर महामहिम की सरकार के अधिकार की खुली अवहेलना और ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभुत्व को दी गई सीधी चुनौती माना गया।

ब्रिटिश अल्टीमेटम और महल की किलेबंदी

ब्रिटिश अधिकारी खालिद बिन बरगश की इस धृष्टता को स्वीकार करने के लिए कतई तैयार नहीं थे। वे सिंहासन पर अपने एक अन्य कठपुतली दावेदार हमुद बिन मोहम्मद को बैठाना चाहते थे, जो अंग्रेजों की हर आज्ञा मानने के लिए तैयार था। जांजीबार में नियुक्त वरिष्ठ ब्रिटिश राजनयिक बेसिल केव ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए खालिद को तुरंत सख्त चेतावनी जारी की। बेसिल केव ने अल्टीमेटम देते हुए सुल्तान खालिद से मांग की कि वह तुरंत अपने शाही दावों को वापस ले, अपनी सशस्त्र टुकड़ियों को बर्खास्त करे और राजमहल खाली करके पीछे हट जाए।

हालांकि, सत्ता के नशे में धुत खालिद बिन बरगश ने ब्रिटिश राजनयिक की इस चेतावनी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। खालिद को अपनी सैन्य ताकत पर अटूट विश्वास था। उसने अपनी रक्षा के लिए लगभग 3,000 वफादार और सशस्त्र सैनिकों को राजमहल के चारों ओर तैनात कर दिया। उसने महल के तोपखाने को सजवा दिया और खुद को मजबूत किलेबंदी के भीतर बंद कर लिया। खालिद का मानना था कि अंग्रेज केवल राजनयिक दबाव बना रहे हैं और वे कभी भी सीधे सैन्य हमले का जोखिम नहीं उठाएंगे। खालिद का यह गलत आकलन उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ।

27 अगस्त 1896: सुबह 9:02 बजे तोपखाने का भयंकर हमला

खालिद के अडिग रुख को देखते हुए ब्रिटिश नौसेना ने पूर्ण सैन्य कार्रवाई का खाका तैयार कर लिया। बंदरगाह में ब्रिटिश बेड़े का नेतृत्व रियर एडमिरल हैरी रॉसन कर रहे थे। ब्रिटिश जहाजों ने बंदरगाह में मोर्चाबंदी कर ली थी और उनके तोपखाने राजमहल की ओर लक्षित कर दिए गए थे। ब्रिटिश कमान ने खालिद को अंतिम मौका देते हुए अल्टीमेटम की समय सीमा 27 अगस्त 1896 की सुबह 9:00 बजे तक तय कर दी। अंग्रेजों ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि तय समय तक सुल्तान ने आत्मसमर्पण नहीं किया, तो सीधे युद्ध छिड़ जाएगा।

जब 27 अगस्त की सुबह 9:00 बजे तक सुल्तान खालिद की ओर से आत्मसमर्पण या बातचीत का कोई संकेत नहीं मिला, तो ठीक 9:02 बजे रियर एडमिरल हैरी रॉसन के आदेश पर ब्रिटिश युद्धपोतों ने राजमहल पर भारी बमबारी शुरू कर दी। ब्रिटिश बेड़े के आधुनिक तोपों से निकले गोलों ने कुछ ही मिनटों के भीतर लकड़ी और चूने से बने भव्य सुल्तानी महल को आग के शोलों में बदल दिया। जांजीबार के तोपखाने और तटीय रक्षा तंत्र को ब्रिटिश तोपखाने ने शुरुआती कुछ मिनटों में ही ध्वस्त कर दिया।

एचएचएस ग्लासगो का डूबना और 9:40 बजे युद्ध का अंत

बमबारी के बीच जांजीबार की ओर से एकमात्र नौसैनिक प्रतिरोध सुल्तान की शाही नौका एचएचएस ग्लासगो ने दिखाने का प्रयास किया। यह जहाज ब्रिटेन द्वारा ही पूर्व सुल्तान को उपहार में दिया गया था। जैसे ही एचएचएस ग्लासगो ने ब्रिटिश युद्धपोतों पर गोलीबारी की, ब्रिटिश नौसेना ने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए अपनी घातक तोपों से हमला कर दिया। महज कुछ ही पलों में एचएचएस ग्लासगो को समुद्र की गहराइयों में डुबो दिया गया।

राजमहल परिसर में चारों तरफ तबाही और चीख पुकार का माहौल था। महल की सुरक्षा में तैनात सैनिकों और नागरिकों के पास बचाव का कोई रास्ता नहीं बचा था। भीषण तोपखाने के हमले ने किलेबंदी को मलबे के ढेर में बदल दिया। आखिरकार सुबह 9:40 बजे राजमहल के मुख्य मस्तूल पर फहरा रहा जांजीबार का शाही झंडा गोलों की चपेट में आकर नीचे गिर गया। इसके साथ ही मात्र 38 मिनट तक चला यह ऐतिहासिक युद्ध आधिकारिक तौर पर समाप्त घोषित कर दिया गया।

हताहतों का विवरण और जांजीबार पर ब्रिटिश नियंत्रण

यह 38 मिनट का संघर्ष एक तरफा विनाश का गवाह बना। ब्रिटिश बमबारी और महल में लगी भीषण आग के कारण जांजीबार के लगभग 500 सैनिक और निर्दोष नागरिक मारे गए या गंभीर रूप से घायल हुए। इसके विपरीत, दुनिया की सबसे शक्तिशाली ब्रिटिश नौसेना को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा। इस पूरे युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना का एक भी सैनिक नहीं मारा गया। केवल एक ब्रिटिश नाविक गंभीर रूप से घायल हुआ था, जो बाद में इलाज के दौरान पूरी तरह स्वस्थ हो गया।

युद्ध का मैदान छोड़ कर भागे विद्रोही सुल्तान खालिद बिन बरगश ने तुरंत शहर में स्थित जर्मन दूतावास में शरण ले ली। ब्रिटिश अधिकारियों के बार बार मांगने के बावजूद जर्मन राजनयिकों ने उसे सौंपने से इनकार कर दिया और बाद में चुपके से उसे नौका के जरिए सुरक्षित निकाल लिया। युद्ध समाप्त होते ही अंग्रेजों ने बिना किसी देरी के अपने वफादार कठपुतली शासक सुल्तान हमुद बिन मोहम्मद को जांजीबार की गद्दी पर बैठा दिया। इस संक्षिप्त लेकिन विनाशकारी युद्ध के साथ ही जांजीबार की बची कुची संप्रभुता और स्वायत्तता पूरी तरह समाप्त हो गई तथा उस पर ब्रिटिश हुकूमत का शिकंजा हमेशा के लिए कस गया।

सवाल-जवाब

दुनिया का सबसे छोटा युद्ध कितने समय तक चला था?
यह युद्ध मात्र 38 मिनट तक चला था, जो 27 अगस्त 1896 की सुबह 9:02 बजे शुरू होकर 9:40 बजे समाप्त हो गया था।
आंग्ल जांजीबार युद्ध किन दो पक्षों के बीच लड़ा गया था?
यह युद्ध ब्रिटिश साम्राज्य की नौसेना और पूर्वी अफ्रीकी द्वीप जांजीबार के विद्रोही सुल्तान खालिद बिन बरगश की सेना के बीच लड़ा गया था।
इस 38 मिनट की जंग में कितने लोग मारे गए थे?
बमबारी और आग में जांजीबार के लगभग 500 सैनिक और नागरिक मारे गए या घायल हुए, जबकि ब्रिटिश पक्ष का एक भी सैनिक नहीं मरा और केवल एक नाविक घायल हुआ।
युद्ध खत्म होने के बाद सुल्तान खालिद बिन बरगश का क्या हुआ?
खालिद बिन बरगश युद्ध के दौरान महल से भाग निकला और जर्मन दूतावास में शरण ले ली, जहाँ से बाद में वह जर्मनी की मदद से बाहर निकलने में सफल रहा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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