अमेरिकी सेना का AI टोकन वाला दांव बुरी तरह उलटा पड़ गया है, महीनों के लिए दिए गए टोकन महज छह हफ्तों में खत्म हो गए और सेना को दोबारा सीमाएं लगानी पड़ीं।
वादा जो टिक नहीं पाया
मई 2026 में सेना के CIO ने ऐलान किया था कि जवानों और सिविल कर्मचारियों को जेनरेटिव AI टूल्स के इस्तेमाल की कोई सीमा नहीं होगी। यह वादा गर्मियां आते-आते टूट गया। सेना के अंदरूनी एक ईमेल के मुताबिक, जून के मध्य तक CIO का पूरा टोकन भंडार खत्म हो चुका था, जिसके बाद अफसरों को दोबारा सीमाएं लागू करनी पड़ीं। इसी ईमेल में यह भी लिखा है कि सेना ने फिलहाल टोकन इस्तेमाल को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने का फैसला किया है, लेकिन यह साफ नहीं है कि 1 अक्टूबर के बाद यह भंडार दोबारा भरा जाएगा या नहीं।
एक साल का कोटा, सिर्फ छह हफ्तों में खत्म
सेना के एक कर्मचारी ने बताया, जो अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बोले क्योंकि उन्हें मीडिया से बात करने की अनुमति नहीं थी, कि पूरी सेना ने महज एक सर्विस पर पूरे साल के बराबर टोकन खर्च कर डाले। यह सर्विस है आस्क सेज, एक मल्टीमॉडल जेनरेटिव AI प्लेटफॉर्म, जिस पर यूजर अलग-अलग लार्ज लैंग्वेज मॉडल इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनमें अल्फाबेट का जेमिनी, मेटा का लामा और ओपनएआई का चैटजीपीटी शामिल हैं।
आस्क सेज करता क्या है
आस्क सेज सेना के एंटरप्राइज लार्ज लैंग्वेज मॉडल वर्कस्पेस को चलाता है और इसे कंट्रोल्ड अनक्लासिफाइड इन्फॉर्मेशन यानी संवेदनशील लेकिन गैर-गोपनीय जानकारी के लिए मान्यता मिली हुई है। रक्षा विभाग का चीफ डिजिटल एंड AI ऑफिस (CDAO) भी खरीद-प्रक्रिया के कामों के लिए इसी प्लेटफॉर्म का सहारा लेता है। सेना की अपनी वेबसाइट के मुताबिक, आस्क सेज का इस्तेमाल कर्मचारियों के पदनाम दोबारा वर्गीकृत करने जैसे कामों में भी हुआ है, जिसमें उनकी जिम्मेदारियां, अनुभव और पृष्ठभूमि को नए सिरे से तय और मिलाया जाता है।
टोकन बचाने की जगह ज्यादा इस्तेमाल पर जोर
टोकन कम करने की बजाय सेना महीनों से कर्मचारियों को इस टूल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए उकसाती रही। देखे गए ईमेल के मुताबिक, हर कर्मचारी को शुरुआत में कम से कम 2,00,000 टोकन प्रति माह दिए जाते थे, और तय सीमा खत्म होते ही सिस्टम अपने आप और टोकन जारी कर देता था। जिन कर्मचारियों ने आस्क सेज पर खाता तो बना लिया था लेकिन उसका नियमित इस्तेमाल नहीं कर रहे थे, उन्हें बार-बार ईमेल भेजकर अपना कोटा इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया जाता था।
सब्सक्रिप्शन का आंकड़ा कितना बड़ा
इस पूरे मामले के पीछे के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। सालाना एंटरप्राइज पैक सब्सक्रिप्शन के तहत सेना के पास आस्क सेज पर इस्तेमाल के लिए 10 करोड़ (100,000,000) टोकन उपलब्ध थे। एक टोकन किसी भी AI मॉडल के आउटपुट यानी टेक्स्ट या इमेज की सबसे छोटी इकाई होता है, और आस्क सेज पर एक टोकन लगभग 3.7 अक्षरों के बराबर होता है। यह अंदाजा लगाने के लिए कि तेज रफ्तार में टोकन कितनी जल्दी खत्म हो सकते हैं, रक्षा विभाग ने ईरान में चले 38 दिन के ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के दौरान रोजाना करीब 2,000 करोड़ यानी 20 अरब टोकन खर्च किए थे। सेना, रक्षा विभाग और आस्क सेज तीनों ने ही इस बारे में टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया। यह भी साफ नहीं है कि आम कर्मचारियों के टोकन उसी भंडार से निकलते हैं या फिर वर्गीकृत और गोपनीय जानकारी पर काम करने वाले कर्मचारियों का टोकन भंडार अलग है।
निगरानी घटी, फिर भी AI पर भरोसा बरकरार
इन सब के बावजूद पेंटागन का AI पर भरोसा कम नहीं हुआ है। रक्षा विभाग ने सिविलियन प्रोटेक्शन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के स्टाफ में कटौती की है, जिसका काम युद्ध क्षेत्रों में आम नागरिकों की जान बचाना और नुकसान रोकना था। इसकी जगह रक्षा विभाग अब एक ऐसा AI टूल बना रहा है जो उन आकलनों को तेजी से पूरा कर सके, जो पहले इसी सेंटर के कर्मचारी खुद करते थे।
सेना अकेली नहीं है
लगभग बेरोकटोक AI इस्तेमाल पर पुनर्विचार करने वाली सेना अकेली संस्था नहीं है। मेटा ने भी पहले अपने कर्मचारियों को टोकन के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल यानी टोकनमैक्स के लिए उकसाया था, लेकिन अब उसने टोकन इस्तेमाल दिखाने वाला लीडरबोर्ड चुपचाप हटा दिया है और इस्तेमाल पर लगाम कसने की कोशिश में जुटी है। पिछले हफ्ते ही मेटा में इंस्टाग्राम प्रमुख एडम मोसेरी ने हर इंजीनियर के लिए टोकन इस्तेमाल की सीमा तय करने का विचार रखा। उबर में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जहां इंजीनियरों ने पूरे साल के लिए तय जेनरेटिव AI टोकन महज चार महीनों में खर्च कर डाले।
सोच-समझकर इस्तेमाल जरूरी
सेना के जिस कर्मचारी ने यह पूरी कहानी बताई, उनका कहना है कि उन्हें अपने रोजमर्रा के काम में ये जेनरेटिव AI टूल्स खास फायदेमंद नहीं लगे, और जब भी उन्होंने इस्तेमाल किए, नतीजे अक्सर भरोसेमंद नहीं निकले, एक मौके पर तो एक मॉडल ने यह तक दावा कर दिया कि उसने कोई काम पूरा कर लिया है, जबकि हकीकत में वह काम हुआ ही नहीं था। उनका मानना है कि अमेरिकी संघीय सरकार की नौकरशाही के कुछ हिस्सों में ये टूल्स वाकई मददगार साबित हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने आगाह भी किया कि बिना सोचे-समझे इस्तेमाल करने से कभी असरदार, कुशल और भरोसेमंद नतीजे नहीं मिलेंगे।




















