भारत में लगातार बढ़ती अनचाही और फर्जी कॉल्स की समस्या पर लगाम कसने के लिए दूरसंचार नियामक ने एक बड़ा कदम उठाया है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई ने कमर्शियल कम्युनिकेशंस से जुड़े नियमों में संशोधन किया है। नए प्रावधानों के तहत अब कॉलर आईडी और कॉल मैनेजमेंट ऐप्स के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर यूजर्स द्वारा दर्ज की जाने वाली स्पैम और जंक कॉल्स की शिकायतों को सीधे टेलीकॉम कंपनियों के साथ साझा करें। इस पूरी व्यवस्था को टेलीकॉम ऑपरेटर्स द्वारा संचालित ब्लॉकचेन आधारित सिस्टम से जोड़ा जाएगा, जो कमर्शियल कॉल्स पर नजर रखता है और नियमों का क्रियान्वयन करता है।
ट्राई के अनुसार, इस नए नियम का मुख्य उद्देश्य स्पैम कॉल्स से जुड़ी शिकायतों के दायरे को बड़ा करना है। जब अलग-अलग कॉलर आईडी ऐप्स पर आने वाली रिपोर्ट टेलीकॉम कंपनियों के प्रवर्तन तंत्र से जुड़ेंगी, तो फर्जीवाड़ा करने वालों और नियम तोड़ने वाले स्पैमर्स की पहचान कर उनके खिलाफ तेजी से कार्रवाई की जा सकेगी। हालांकि, इस फैसले के बाद ऐप डेवलपर्स और रेगुलेटर के बीच मतभेद भी सामने आने लगे हैं।
ट्रूकॉलर ने बताया प्रतिस्पर्धा विरोधी, डेटा शेयरिंग पर जताई आपत्ति
स्पैम ब्लॉकिंग सेवा प्रदान करने वाली प्रमुख कंपनी ट्रूकॉलर ने इस अनिवार्यता पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। कंपनी का मानना है कि यह नियम पूरी तरह से एकतरफा आदान-प्रदान है और प्रतिस्पर्धा के नियमों के खिलाफ है। कंपनी के मुताबिक, इस कदम से कॉल मैनेजमेंट ऐप्स द्वारा जुटाया गया बेहद मूल्यवान और व्यावसायिक डेटा सीधे टेलीकॉम ऑपरेटर्स के हाथों में चला जाएगा, जिससे बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा प्रभावित होगी।
स्वीडन के स्टॉकहोम स्थित ट्रूकॉलर के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। कंपनी के विश्व भर में 500 मिलियन से अधिक मंथली एक्टिव यूजर्स हैं, जिनमें से 350 मिलियन से भी ज्यादा यूजर्स अकेले भारत में मौजूद हैं। कंपनी संदिग्ध और अवांछित कॉल्स की पहचान करने के लिए अपने कम्युनिटी मेंबर्स की रिपोर्ट्स के साथ-साथ ऑटोमेटेड डिटेक्शन और अन्य तकनीकी सिग्नल्स का सहारा लेती है।
भारत में स्पैम कॉल्स का विशाल दायरा और पुराना विवाद
यह नया नियम ऐसे समय में आया है जब देश के भीतर स्पैम और वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ी कॉल्स बहुत बड़े पैमाने पर परेशानी पैदा कर रही हैं। फरवरी की अपनी एक रिपोर्ट में ट्रूकॉलर ने बताया था कि साल 2025 में देश के यूजर्स को लगभग 42 बिलियन स्पैम कॉल्स का सामना करना पड़ा था। इन आंकड़ों में वे सभी कॉल्स शामिल थीं जिन्हें ब्लॉक किया गया, स्पैम के तौर पर लेबल किया गया या फिर यूजर्स ने नजरअंदाज कर दिया। इसी अवधि में कंपनी ने लगभग 12 बिलियन स्पैम कॉल्स को ब्लॉक करने का दावा किया था।
यह पहला मौका नहीं है जब ट्रूकॉलर और भारतीय नियामक के बीच नियमों को लेकर असहमति बनी हो। इससे पहले भी कंपनी ने उस पाबंदी का विरोध किया था, जिसके तहत कॉल मैनेजमेंट ऐप्स को सरकार द्वारा तय की गई कुछ खास नंबर सीरीज वाली कॉल्स को अपने आप स्पैम मार्क करने से रोका गया था। ट्रूकॉलर का कहना था कि इस तरह की छूट मिलने से अनचाही कॉल्स उसके सुरक्षा फिल्टर से बच निकलती हैं।
शुक्रवार को अधिसूचित किए गए नए संशोधनों में भी ट्राई ने उस प्रतिबंध को पूरी तरह बरकरार रखा है। नए आदेश के अनुसार, कॉल मैनेजमेंट ऐप्स प्रमोशनल, सर्विस और ट्रांजैक्शनल कम्युनिकेशंस के लिए तय विशेष नंबर सीरीज को सीधे ब्लॉक, फिल्टर या स्पैम टैग नहीं कर सकते। हालांकि, नियामक ने यह स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत यूजर चाहें तो अपने डिवाइस पर ऐसी कॉल्स को खुद ब्लॉक करने का फैसला ले सकते हैं। ट्रूकॉलर के एक प्रवक्ता ने इस पर कहा कि डेटा और यूजर्स की भावनाएं साफ दिखाती हैं कि स्पैमर्स को खुली छूट मिलने से स्पैम में भारी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन कंपनी पिछले साल के अंत से ही इन नियमों का पूरी तरह पालन कर रही है।
तकनीकी और क्षेत्राधिकार की जटिलताएं
नई दिल्ली स्थित कंसल्टिंग फर्म द क्वांटम हब के पार्टनर और टेलीकॉम रेगुलेशन पॉलिसी मामलों के प्रमुख सुमेष श्रीवास्तव के अनुसार, यह फैसला टेलीकॉम व्यवस्था के दो अलग-अलग स्तरों को आपस में जोड़ता है। एक तरफ टेलीकॉम ऑपरेटर्स हैं जो बुनियादी नेटवर्क ढांचा मुहैया कराते हैं और ब्लॉकचेन आधारित एंटी-स्पैम सिस्टम चलाते हैं। दूसरी तरफ कॉलर आईडी ऐप्स हैं, जो नेटवर्क के ऊपर स्वतंत्र रूप से काम करते हुए कॉल्स की पहचान और फिल्टरिंग करते हैं।
सुमेष श्रीवास्तव ने उल्लेख किया कि इस व्यवस्था से कई तकनीकी और कानूनी अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवाल खड़े होते हैं। इनमें यह शामिल है कि ऐप्स को रिपोर्टिंग के लिए कौन से तकनीकी मानक अपनाने होंगे और टेलीकॉम ऑपरेटर न होने वाली कंपनियों पर इस नियम को किस कानूनी दायरे के तहत लागू कराया जाएगा। मार्च में जारी एक ड्राफ्ट प्रस्ताव में इन नियमों को लागू कराने के लिए देश के आईटी कानूनों का इस्तेमाल करने की बात कही गई थी, लेकिन नई घोषणा में यह साफ नहीं किया गया है कि अंतिम नियमों में वह व्यवस्था रखी गई है या नहीं।
नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक द डायलॉग के फाउंडिंग डायरेक्टर काज़िम रिज़वी ने भी डेटा की प्रकृति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि किसी यूजर द्वारा दर्ज की गई स्पैम रिपोर्ट को टेलीकॉम कंपनियों तक पहुंचाना एक बात है, लेकिन ऐप्स द्वारा संदिग्ध कॉल्स की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाले व्यापक डेटासेट्स, रेपुटेशन सिग्नल्स या एनालिटिकल सिस्टम्स को साझा करना बिल्कुल अलग मामला है। रिज़वी का मानना है कि नियमों में इस बात की स्पष्टता बेहद जरूरी है कि वास्तव में कौन सी जानकारी साझा करनी होगी, यूजर्स से सहमति कैसे ली जाएगी और उस डेटा को आगे किस तरह स्टोर व इस्तेमाल किया जा सकेगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोकॉल्स पर नया शिकंजा
ट्राई के इन नए संशोधनों में सॉफ्टवेयर और एआई वॉइस एजेंट्स के बढ़ते इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए भी सख्त प्रावधान शामिल किए गए हैं। ऐसे सभी कॉल्स, जिन्हें किसी इंसान द्वारा सीधे डायल किए बिना ऑटोमेटेड तरीके से किया जाता है, अब ट्राई के एप्लीकेशन-टू-पर्सन यानी A2P फ्रेमवर्क के अंतर्गत आएंगे। इसमें रोबोकॉल्स और पहले से रिकॉर्ड की गई या कृत्रिम आवाज वाली कॉल्स भी शामिल हैं।
जो भी कंपनियां इस प्रकार के कॉलिंग सिस्टम का इस्तेमाल करेंगी, उन्हें अपने टेलीकॉम ऑपरेटर को पहले से इसकी जानकारी देनी होगी और उपयोग किए जाने वाले फोन नंबर घोषित करने होंगे। ट्राई ने साफ किया है कि बिना पूर्व घोषणा के की जाने वाली ऐसी सभी A2P कॉल्स को स्पैम माना जाएगा। सुमेष श्रीवास्तव ने बताया कि इस नियम की मुख्य कसौटी यह होगी कि कॉल किस तरह शुरू की गई, न कि सिर्फ यह कि उसमें एआई की आवाज है या नहीं। ऐसे में उन एआई आधारित कॉल्स को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है जिनकी शुरुआत किसी इंसान द्वारा की जाती है।
ट्राई के पूर्व अतिरिक्त सचिव सत्य एन. गुप्ता के अनुसार, ये नए नियम व्यवसायों को एआई या ऑटोमेटेड कॉलिंग तकनीकों का उपयोग करने से रोकते नहीं हैं, बल्कि यह व्यवस्था बनाते हैं कि वे टेलीकॉम ऑपरेटर्स के समक्ष इसका खुलासा अनिवार्य रूप से करें।
इसके अतिरिक्त, टेलीकॉम कंपनियों को A2P कॉल्स पर प्रति मिनट 5 पैसे यानी लगभग 0.052 सेंट्स तक का टर्मिनेशन चार्ज लगाने की अनुमति दी गई है। हालांकि, कुछ विशेष निर्धारित नंबर सीरीज से की जाने वाली कॉल्स को इस शुल्क से छूट दी जाएगी। काज़िम रिज़वी ने आगाह किया कि नए दायरे में कॉन्टैक्ट सेंटर्स और क्लिक-टू-कॉल जैसी सेवाएं भी आ सकती हैं जहां सॉफ्टवेयर के साथ-साथ इंसान भी शामिल होता है। अगर इस अंतर को स्पष्ट नहीं किया गया, तो A2P श्रेणी बहुत ज्यादा व्यापक हो सकती है।



















