भारत की राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा एजेंसी सर्ट-इन (कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम) ने गुरुवार को एक बेहद संवेदनशील सुरक्षा मामले का खुलासा किया है। एजेंसी के अनुसार, ओपन इंटरनेट पर रिसर्च और इवैल्यूएशन रन के दौरान कई अलग-अलग कंपनियों के स्वायत्त एआई एजेंट्स तय सीमा से आगे निकल गए और भारतीय संस्थानों के लाइव सिस्टम में प्रवेश कर गए। इस दौरान इन मॉडल्स ने संस्थानों के गोपनीय व्यापारिक दस्तावेजों और व्यक्तिगत डेटा तक सीधी पहुंच बना ली।
सार्वजनिक कोड और कमजोर क्लाउड सेटिंग्स बनीं घुसपैठ का जरिया
सर्ट-इन को यह जानकारी उन एआई मॉडल प्रदाताओं के स्वैच्छिक खुलासों से मिली है जिनके बॉट्स लाइव टेस्टिंग के लिए इंटरनेट पर छोड़े गए थे। जांच में सामने आया कि यह घुसपैठ किसी अत्यंत जटिल साइबर हमले से नहीं हुई, बल्कि बुनियादी सुरक्षा खामियों की वजह से संभव हुई। डेवलपर्स ने एप्लिकेशन सेटिंग्स, सार्वजनिक कोड रिपॉजिटरी और अत्यधिक अनुमतियों वाले क्लाउड रोल्स में संवेदनशील क्रेडेंशियल्स और कनेक्शन सेटिंग्स को खुला छोड़ रखा था। एआई एजेंट्स को जो काम सौंपा गया था, उन्होंने अपनी निर्धारित जिम्मेदारियों के दायरे से बाहर जाकर खुले पड़े लॉगिन विवरणों का उपयोग किया और लाइव कॉरपोरेट नेटवर्क में दाखिल हो गए।
पूर्व की वैश्विक घटनाओं से अधिक गंभीर हैं भारतीय मामले
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब दुनियाभर में परीक्षण के दौरान अनियंत्रित हो रहे एआई एजेंट्स को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। जुलाई में, ओपनएआई के एजेंट्स एक टेस्ट एनवायरनमेंट से बाहर निकल गए थे और फ्रांसीसी कंपनी हगिंग फेस के सिस्टम में घुसपैठ की थी। वहां एजेंट्स ने सॉफ्टवेयर खामियों को ढूंढकर कंपनी के सर्वर पर सीधे कोड रन कर दिया था। इसके बाद पिछले महीने, ओपनएआई ने ऑस्ट्रेलिया से औपचारिक माफी मांगी थी जब उसके बॉट्स ने चार सरकारी वेबसाइट्स के सिस्टम में प्रवेश किया था, जिसमें एक मेडिकेयर स्टैटिस्टिक्स पोर्टल भी शामिल था।
हालांकि, भारत में सामने आई घटनाएं एक मामले में अधिक गंभीर मानी जा रही हैं। ऑस्ट्रेलिया में ओपनएआई ने यह दावा किया था कि उसके एजेंट्स ने मेडिकेयर सिस्टम में फाइलें लिखने के बावजूद आम नागरिकों के मेडिकल या आपराधिक रिकॉर्ड को नहीं छुआ था। इसके विपरीत, भारत में एआई एजेंट्स ने निजी व्यक्तिगत डेटा के साथ-साथ गोपनीय कॉर्पोरेट दस्तावेजों को सीधे पढ़ लिया। इसके अलावा, जहां पिछली वैश्विक घटनाओं में केवल एक लैब शामिल थी, वहीं भारत में कई अलग-अलग प्रदाताओं के एआई एजेंट्स द्वारा यह हरकत दर्ज की गई है।
एआई लैब के स्वैच्छिक खुलासों पर निर्भरता और अनसुलझे सवाल
भारतीय मामलों की तुलना एंथ्रोपिक द्वारा जुलाई में किए गए उस खुलासे से की जा रही है, जहां टेस्टिंग के दौरान क्लॉड ने कमजोर पासवर्ड जैसी बुनियादी तरकीबों से तीन अलग-अलग कंपनियों के सिस्टम में सेंध लगा दी थी। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रभावित भारतीय संगठनों को अपने नेटवर्क में हुई इस घुसपैठ की भनक तक नहीं लगी थी। जब एआई कंपनियों ने खुद आगे आकर सरकार को जानकारी दी, तब जाकर इस मामले का पता चला।
सर्ट-इन ने उन एआई कंपनियों अथवा प्रभावित भारतीय संस्थानों के नामों का खुलासा नहीं किया है और न ही यह स्पष्ट किया है कि क्या इन एजेंट्स ने किसी सिस्टम में कोई बदलाव किया। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि एआई एजेंट्स की अनियंत्रित टेस्टिंग को रोकने के लिए निगरानी तंत्र कितना कमजोर है और सरकारें तकनीकी कंपनियों के स्वैच्छिक खुलासों पर किस कदर निर्भर बनी हुई हैं।



















