मतदाताओं के बीच राजनीतिक जानकारी हासिल करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI का चलन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन चुनावी मामलों में यह तकनीक भारी जोखिम साबित हो रही है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक लगभग 50 प्रतिशत अमेरिकी वयस्क जीवन में कम से कम एक बार AI चैटबॉट का इस्तेमाल कर चुके हैं। इसके अलावा 8 प्रतिशत लोगों का कहना है कि उन्होंने मध्यावधि चुनाव से पहले उम्मीदवारों और नीतियों की पड़ताल के लिए इन डिजिटल टूल्स की मदद ली है। हालांकि, व्यापक अध्ययनों से यह बात साफ हो गई है कि इन चैटबॉट्स द्वारा दिए जाने वाले जवाब अक्सर पुराने, भ्रामक और मनगढ़ंत तथ्यों पर आधारित होते हैं।
तथ्यों की भारी अनदेखी और गलत समय-सीमा
राजनीतिक रूप से निष्पक्ष माने जाने वाले प्रमुख प्लेटफॉर्म जैसे ओपनAI का चैटजीपीटी, एंथ्रोपिक का क्लॉड और गूगल का जेमिनी भी चुनावी सवालों पर लड़खड़ाते नजर आ रहे हैं। फोरम AI के एक शोध के अनुसार मुख्यधारा के सभी चैटबॉट्स द्वारा दिए गए चुनावी जवाबों में से लगभग 40 प्रतिशत में कम से कम एक तथ्यात्मक गलती पाई गई। उदाहरण के तौर पर, गूगल के AI मोड ने वर्ष 2020 के चुनावी नतीजे बताने से सीधे इनकार कर दिया। वहीं दूसरी तरफ गूगल के जेमिनी चैटबॉट ने पेंसिल्वेनिया में डाक मतपत्र यानी मेल-इन बैलेट का अनुरोध करने की अंतिम तिथि 3 नवंबर बता दी, जबकि वास्तविक अंतिम तारीख 27 अक्टूबर थी। इस तरह की गंभीर भूल मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित कर सकती है।
उम्मीदवारों की पहचान में भ्रम
फोरम AI के शोधकर्ताओं ने अगस्त के महीने में जब क्लॉड से यह पूछा कि किसी को नॉर्थ कैरोलिना के सांसद डॉन डेविस को वोट क्यों देना चाहिए, तो चैटबॉट ने पूरी तरह भ्रामक उत्तर दिया। उसने मौजूदा सांसद को उसी नाम वाले एक पूर्व स्कूल सुपरिंटेंडेंट समझ लिया और दोनों व्यक्तियों की पहचान को आपस में मिला दिया। ऐसे मामलों से साफ जाहिर होता है कि चैटबॉट्स वास्तविक संदर्भ और एक ही नाम वाले व्यक्तियों के बीच अंतर समझने में सक्षम नहीं हैं।
पक्षपाती और 'पिंक स्लाइम' वेबसाइट्स का बढ़ता दायरा
इस संकट की एक बड़ी वजह यह है कि ये चैटबॉट्स इंटरनेट पर मौजूद बेहद संदेहास्पद और समस्याग्रस्त जानकारियों पर निर्भर हैं। न्यूज़गार्ड के विश्लेषण में पाया गया कि मध्यावधि चुनावों से जुड़े उम्मीदवारों और नीतियों के बारे में पूछे जाने पर चैटबॉट्स लगभग 50 प्रतिशत मामलों में तथाकथित 'पिंक स्लाइम' वेबसाइट्स को स्रोत के रूप में पेश करते हैं। ये 'पिंक स्लाइम' पोर्टल खुद को सामान्य मुख्यधारा के समाचार आउटलेट्स के रूप में पेश करते हैं, लेकिन वास्तव में इनका वित्तपोषण राजनीतिक या वैचारिक समूहों और विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। चुनावों से ठीक पहले ऐसे मंचों की संख्या में अचानक भारी उछाल आया है और चैटबॉट्स लगातार इनकी सामग्री उठा रहे हैं।
चैटबॉट्स के प्रदर्शन में अंतर
न्यूज़गार्ड के निष्कर्षों में ओपनAI का चैटजीपीटी सबसे खराब स्थिति में रहा, जिसने 70 प्रतिशत से अधिक खोजों में इन राजनीतिक रूप से वित्तपोषित 'पिंक स्लाइम' साइट्स का हवाला दिया। इसके मुकाबले xAI का ग्रोक चैटबॉट अपेक्षाकृत बेहतर रहा, जिसने 30 प्रतिशत मामलों में ऐसी साइट्स का संदर्भ लिया। इस पूरे मुद्दे पर गूगल और एंथ्रोपिक ने किसी तरह का जवाब नहीं दिया, जबकि ओपनAI ने वर्ष 2026 के चुनावों के प्रति कंपनी के दृष्टिकोण को रेखांकित करने वाले एक ब्लॉग का हवाला दिया।
विशेषज्ञों की चेतावनी
अमेरिकन सनलाइट प्रोजेक्ट की कार्यकारी निदेशक और बाइडन प्रशासन के दौरान पूर्व गलत सूचना मामलों की प्रमुख नीना जांकोविज़ ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि अधिकांश नागरिक उपभोक्ता AI के इस दौर में चुनावी परिदृश्य से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि कंपनियों और उनके अधिकारियों ने AI की वास्तविक क्षमताओं को लेकर जरूरत से ज्यादा दावे किए हैं। AI को डेटा कहीं न कहीं से प्राप्त करना होता है और अक्सर वे स्रोत भरोसेमंद नहीं होते। चूंकि यह एक प्रिडिक्टिव तकनीक है, इसलिए जब इसे सटीक उत्तर पता नहीं होता, तो यह खुद से मनगढ़ंत बातें बना देती है।


















