प्रौद्योगिकी जगत के शीर्ष नेतृत्व और आम जनता के बीच की खाई दिन-प्रतिदिन गहरी होती जा रही है। जब बड़ी तकनीकी कंपनियों के प्रमुख अधिकारी यह दावा करते हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता हर मानवीय अनुभव को सुगम बना सकती है, तो अक्सर उनकी बातें समाधान पेश करने के बजाय समाज में एक असहज दूरी पैदा करती हैं। हाल ही में डैज़ल एआई की मुख्य कार्यकारी अधिकारी मारिसा मेयर ने अपनी बेटी के स्कूल प्रोजेक्ट से जुड़े विवरण को लिखने के लिए एआई उपकरण की मदद लेने का जिक्र किया, जिसके बाद उनको तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। यह पहला मामला नहीं है जब किसी टेक लीडर के बयान ने आम अभिभावकों और नागरिकों को हैरान किया हो।
परवरिश और मानवीय रिश्तों को आउटसोर्स करने की होड़
ओपनएआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सैम ऑल्टमैन पहले ही यह विचार रख चुके हैं कि माता-पिता को अपने बच्चों के स्कूल जाने के सफर के दौरान उनके लिए व्यक्तिगत पॉडकास्ट बनाने चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा था कि वे चैटजीपीटी के बिना बच्चों की परवरिश की कल्पना भी नहीं कर सकते। इसी कड़ी में मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग ने संकेत दिया कि आने वाले समय में सामाजिक और रूमानी जरूरतों को एआई के जरिए पूरा करना सामान्य बात हो जाएगी। बम्बल की पूर्व प्रमुख व्हिटनी वोल्फ हर्ड ने ऐसे एआई सहायकों की कल्पना पेश की थी जो इंसानों की जगह पहले आपस में डेट करेंगे और सब कुछ ठीक रहने पर दोनों इंसानों का परिचय कराएंगे। वहीं मारिसा मेयर ने यह संभावना जताई कि उनके पति का एआई सहायक उनके अपने एआई के साथ तालमेल बिठाकर काम निपटाए।
इन तमाम उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि तकनीक निर्माता इंसानों के बीच की स्वाभाविक बातचीत को समाप्त करके हर प्रक्रिया को मशीन के हवाले करने की कोशिश में जुटे हैं। वास्तविक जीवन में जब कोई व्यक्ति खाना ऑर्डर करने के लिए भी फोन कॉल करने से कतराने लगता है और पूरी तरह डिजिटल माध्यम पर निर्भर हो जाता है, तो यह बदलाव केवल सुविधा का नहीं रह जाता। सवाल यह उठता है कि क्या हर मानवीय संवाद को केवल एक गैर-जरूरी बाधा मानकर उसे स्क्रीन या एल्गोरिदम से बदल देना वास्तव में समाज के हित में है।
बाजार का दबाव और वॉल स्ट्रीट की बदलती भूख
यह पूरी बहस ऐसे समय में सामने आई है जब एंथ्रोपिक अपनी सार्वजनिक लिस्टिंग की तैयारी में जुटी है, जबकि दूसरी ओर वॉल स्ट्रीट पर एआई पर अंधाधुंध पूंजी खर्च करने को लेकर निवेशकों का उत्साह ठंडा पड़ने लगा है। कंपनियों के सामने भारी वित्तीय मजबूरी है कि वे किसी भी तरह इस तकनीक को जीवन के हर छोटे-बड़े पहलू में अनिवार्य साबित करें। इसी वित्तीय दबाव के चलते नेतृत्व ऐसी बातें पेश करने लगता है जो आम लोगों को आकर्षक लगने के बजाय किसी डरावनी और अमानवीय दुनिया की याद दिलाती हैं।
जब कॉर्पोरेट बोर्डरूम में बैठे अरबपति अधिकारी अपनी दैनिक समस्याओं पर चर्चा करते हैं, तो उनकी प्राथमिकताएं उड़ानों की टिकट बुक करने, महंगे रेस्तरां में टेबल आरक्षित करने या व्यक्तिगत सहायकों के प्रबंधन तक सीमित होती हैं। एक आम नागरिक हर हफ्ते हवाई यात्रा की योजना नहीं बनाता और न ही रोजमर्रा के जीवन में इन कार्यों को किसी बड़े संकट के रूप में देखता है। आम उपभोक्ता चैटजीपीटी या क्लॉड जैसे माध्यमों का उपयोग करते तो हैं, लेकिन उनकी वास्तविक उपयोगिता और बड़े टेक लीडर्स की जीवनशैली के दावों में जमीन-आसमान का अंतर है।
अति-अनुकूलन के खिलाफ बढ़ता सामाजिक प्रतिरोध
तकनीक उद्योग का इतिहास रहा है कि उसने अक्सर सैन फ्रांसिस्को के शुरुआती उपयोगकर्ताओं को ध्यान में रखकर उत्पाद बनाए और यह मान लिया कि शेष दुनिया भी उसी रास्ते पर चलेगी। जब उबर जैसी सेवाएं शुरू हुईं तो वे चुनिंदा शहरी तबके को आकर्षित करने के लिए थीं, लेकिन वे धीरे-धीरे व्यापक रूप से फैल गईं। तकनीकी कंपनियों को लगता है कि वे भविष्य के समाज और परिवार की रूपरेखा तय कर रही हैं, लेकिन मौजूदा दौर में यह दांव उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। लोग अब इस बात पर खुलकर आपत्ति जताने लगे हैं कि उनकी जिंदगी के हर स्वाभाविक अनुभव को तकनीक की छलनी से क्यों निकाला जाए।
यही कारण है कि अत्यधिक डिजिटलीकरण के बीच एक विपरीत सांस्कृतिक धारा भी मजबूत हो रही है। युवा और जागरूक लोग अब साधारण फ्लिप फोन की तरफ लौट रहे हैं ताकि स्क्रीन टाइम की लत से बचा जा सके। संगीत के क्षेत्र में लोग एल्गोरिदम की सिफारिशों से ऊबकर सीडी और विनाइल रिकॉर्ड खरीदने लगे हैं। यह सांस्कृतिक टकराव दर्शाता है कि समाज अभी उस नाजुक संतुलन को तलाश रहा है जहां तकनीक वास्तव में मददगार बने, न कि हमारी मानवीय पहचान और संवेदनाओं को ही हमसे छीन ले।


















