प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक अनुसंधानों की रूपरेखा तैयार करने और आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अब सीधे मेडिकल उपकरणों और सर्जिकल टूल्स की कमान सौंपी जाने लगी है। सैन फ्रांसिस्को स्थित बायोटेक स्टार्टअप एक्सिन थेराप्यूटिक्स के सीईओ और सह-संस्थापक गेब्रियल ओकाना सैंटेरो ने एक खास प्रयोग में एआई एजेंट के जरिए एक जिंदा चूहे के मस्तिष्क में इंजेक्शन लगाने की सर्जिकल प्रक्रिया को पूरा कराया है। हालांकि इस पूरे ऑपरेशन के दौरान कुछ अप्रत्याशित अड़चनें सामने आईं, लेकिन इस प्रयोग ने जीव विज्ञान और न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में एआई की सीधी भौतिक भागीदारी का एक नया रास्ता खोल दिया है।
सैन फ्रांसिस्को की यह बायोटेक कंपनी मिर्गी और मस्तिष्क से जुड़ी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के इलाज के लिए एआई के जरिए दिमागी गतिविधियों का अध्ययन कर नई दवाएं विकसित कर रही है। अब तक ज्यादातर एआई मॉडल केवल पहले से प्रकाशित शोध पत्रों और वैज्ञानिक किताबों के आधार पर ही प्रशिक्षित किए जाते रहे हैं। इस पारंपरिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इनमें वास्तविक प्रयोगों के दौरान वैज्ञानिकों द्वारा लिए जाने वाले तात्कालिक फैसले, अनपेक्षित परिणाम और असफल परीक्षणों का व्यावहारिक डेटा दर्ज नहीं होता। सैंटेरो का मानना है कि वास्तविक प्रयोगशाला प्रयोगों से एआई मॉडल को जोड़ने से वे कहीं अधिक परिपक्व और भरोसेमंद बन सकते हैं, क्योंकि जब तक इन मॉडल्स को सीधे उपकरणों की कमान नहीं मिलेगी, तब तक शोध कार्यों में उनकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया जा सकेगा।
कस्टम सर्जिकल रिग और प्रयोग की तैयारी
इस अनूठे परीक्षण के लिए शोध टीम ने एक विशेष सर्जिकल ढांचा तैयार किया। इस सेटअप में एक मोटराइज्ड डिवाइस शामिल था जो चूहे को हिलने-डुलने से रोककर स्थिर रखता था। इसके साथ ही एक उच्च क्षमता वाला कैमरा लगाया गया ताकि एआई एजेंट सर्जरी के हर पहलू को करीब से देख सके, रोबोटिक आर्म्स और सुई की हलचल को संचालित कर सके और दवा पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित कर सके। यह परीक्षण एक मिर्गी पीड़ित चूहे पर जीन थेरेपी के प्रभाव को मापने के लिए किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य यह परखना था कि क्या यह थेरेपी दौरे पड़ने की आवृत्ति और तीव्रता को कम कर सकती है।
सर्जरी शुरू करने से पहले एआई मॉडल को एक स्प्रेडशीट में दर्ज 19 अलग-अलग उपचार विकल्पों में से सबसे उपयुक्त विकल्प चुनने को कहा गया। प्रक्रिया की शुरुआत में एक पशु चिकित्सक ने चूहे की खोपड़ी पर क्रेनियोटॉमी प्रक्रिया की, यानी मस्तिष्क तक पहुंचने के लिए खोपड़ी का छोटा सा हिस्सा खोला। इस दौरान एआई एजेंट कैमरे के जरिए पूरी प्रक्रिया की निगरानी करता रहा। खोपड़ी खुलने के बाद एजेंट ने चुनी गई थेरेपी, मस्तिष्क के लक्षित हिस्से और इंजेक्शन के सटीक निर्देशांक तय किए। इसके बाद एजेंट ने रोबोटिक हाथों और सुई को नियंत्रित करते हुए दवा की मात्रा और सुई अंदर जाने की गति जैसे तमाम तकनीकी पैमानों का संचालन अपने हाथ में ले लिया।
एआई मॉडल का हिचकिचाना और मॉडल्स का बदलाव
इस प्रयोग की शुरुआत में शोध टीम ने एंथ्रोपिक के क्लॉड ओपस 5.5 मॉडल का इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। लेकिन जब सुई को चूहे के मस्तिष्क के भीतर उतारने का अहम क्षण आया, तो इस मॉडल ने आगे बढ़ने से साफ इनकार कर दिया। मॉडल की प्रतिक्रिया ऐसी थी जिससे लगा कि वह सर्जरी के बीच में ही काम रोक सकता है, जिससे जानवर की जान को गंभीर खतरा पैदा हो जाता। सैंटेरो के मुताबिक उस एजेंट ने पूरे प्रयोग की योजना बखूबी बनाई, लेकिन जब सुई चुभाने का वक्त आया तो उसने संकेत दिया कि उसके सिस्टम का कोई हिस्सा उसे ऐसा करने से रोक रहा है।
इस जटिल स्थिति के बाद टीम ने रणनीति बदली और क्लॉड सॉनेट 5 मॉडल को यह जिम्मेदारी सौंपी, जो बिना किसी झिझक के सर्जरी आगे बढ़ाने को तैयार हो गया। एंथ्रोपिक के अनुसार ओपस मॉडल भारी भरकम तार्किक विश्लेषण और जटिल बहु-चरणीय समस्याओं को हल करने वाला विशेषज्ञ मॉडल है, जबकि सॉनेट रोजमर्रा के सामान्य कार्यों के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है, भले ही चूहे की ब्रेन सर्जरी को किसी भी लिहाज से सामान्य काम नहीं कहा जा सकता।
भौतिक दुनिया में एआई की तैनाती और चुनौतियां
दुनिया की प्रमुख एआई प्रयोगशालाएं लंबे समय से सॉफ्टवेयर की दुनिया से बाहर निकलकर एआई को भौतिक रूप से सक्रिय करने की योजना बना रही हैं। अगस्त के महीने में एंथ्रोपिक ने एक विस्तृत ढांचा जारी किया था, जिसमें बताया गया था कि उसके मॉडल भौतिक दुनिया के साथ कैसे संवाद और काम कर सकते हैं। हाल ही में एआई इंजीनियरों ने जीपीटी, क्लॉड और ग्रोक जैसे प्रमुख मॉडल्स को इन-एन-आउट बर्गर से खाना लाने के लिए एक कार चलाने की जिम्मेदारी भी दी थी, जिसमें केवल एक ही मॉडल सफल हो पाया था।
चूहे के मस्तिष्क में इंजेक्शन लगाने का यह ऑपरेशन भी पूरी तरह बाधा मुक्त नहीं रहा। सुरक्षा के लिहाज से वैज्ञानिकों ने कई कड़े नियम तय किए थे। इसमें अनिवार्य किया गया था कि एआई किसी भी सुई को आगे बढ़ाने से पहले योजना की मंजूरी इंसानी शोधकर्ताओं से लेगा। इसके अलावा लैब में एक इमरजेंसी बटन भी लगाया गया था, जिसे दबाते ही पूरे सर्जिकल ढांचे के मोटर्स की बिजली तुरंत कट जाती। एजेंट को उपकरण के बुनियादी सोर्स कोड में बदलाव करने की बिल्कुल अनुमति नहीं दी गई थी, ताकि वह अपनी मर्जी से काम करने के नियम न बदल सके।
तकनीकी खराबी और समय में देरी
सर्जरी के दौरान उपकरणों के कोऑर्डिनेट सिस्टम में एक तकनीकी गड़बड़ी आ गई। एआई एजेंट ने फौरन यह पहचान लिया कि इंजेक्शन लगाने की जो गणना की गई है वह गलत है, लेकिन सख्त सुरक्षा निर्देशों के कारण उसने कोड में सुधार करने से मना कर दिया क्योंकि उसे कोड बदलने की अनुमति नहीं थी।
इस पेंच को सुलझाने के लिए शोध टीम ने ओपस 5 पर चलने वाले एक दूसरे स्वतंत्र एआई एजेंट की मदद ली और उससे जरूरी कोड में सुधार कराया। खास बात यह रही कि इस दूसरे एजेंट को यह बिल्कुल नहीं बताया गया कि सामने एक जिंदा चूहे की सर्जरी चल रही है। दोनों मॉडलों और इंसानी निगरानी के बीच तालमेल बिठाने में काफी समय लगा। सामान्य तौर पर इस तरह की ब्रेन इंजेक्शन सर्जरी में लगभग 45 मिनट का वक्त लगता है, लेकिन इस तकनीकी अड़चन और बातचीत के कारण इस प्रयोग में एक घंटे से थोड़ा अधिक समय लग गया। टीम अब इस बात का इंतजार कर रही है कि दी गई जीन थेरेपी अपना असर दिखाए, ताकि दौरे कम होने के नतीजों का सटीक आकलन किया जा सके।
भविष्य के प्रयोग और इंसानी निगरानी की जरूरत
इन तमाम तकनीकी दिक्कतों के बावजूद शोध दल एआई एजेंट के प्रदर्शन से काफी प्रभावित है। टीम अब ग्रोक सहित कई अन्य मॉडल्स का परीक्षण करने जा रही है ताकि यह तुलना की जा सके कि इस तरह की जटिल सर्जिकल प्रक्रियाओं में कौन सा मॉडल सबसे बेहतर परिणाम देता है। इसके अलावा कंपनी अब एजेंट नियंत्रित क्रेनियोटॉमी यानी खोपड़ी की हड्डी काटने जैसे कहीं अधिक जटिल काम पर भी प्रयोग कर रही है। हालांकि जिंदा जानवरों पर इसे आजमाने से पहले सुरक्षा के हर पहलू की पूरी तरह पुष्टि की जा रही है, क्योंकि उस नाजुक चरण में एक छोटी सी चूक भी चूहे को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।
वैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि आने वाले समय में एआई एजेंट प्रयोगशाला के भौतिक उपकरणों को सीधे नियंत्रित कर इंसानी शोधकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। लेकिन जब तक प्रयोग जीवित प्राणियों पर किए जा रहे हैं, तब तक इंसानों की कड़ी निगरानी सबसे महत्वपूर्ण रहेगी। इंसानी मस्तिष्क पर इस तरह के एआई एजेंट को स्वतंत्र रूप से आजमाने का समय अभी बहुत दूर है। वहीं जिस चूहे पर यह ऐतिहासिक प्रयोग किया गया, उसकी सेहत तेजी से सुधर रही है।



















