विश्व के सबसे शक्तिशाली पद पर तैनात अमेरिकी राष्ट्रपतियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली सीक्रेट सर्विस और अमेरिकी सेना खतरे के समय किस हद तक कदम उठा सकती हैं, इसका उदाहरण दो अलग-अलग दौर के हाई प्रोफाइल गुप्त अभियानों में देखने को मिलता है। जब भी राष्ट्रपति की जान पर किसी गंभीर साजिश या हमले की सीधी आशंका होती है, तो सुरक्षा एजेंसियां अंतरराष्ट्रीय मीडिया, विदेशी खुफिया तंत्र और दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए बेहद जटिल डिकॉय ऑपरेशन चलाती हैं। इन विशेष अभियानों का एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रपति को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाना और संभावित हमलावरों को राष्ट्रपति की वास्तविक लोकेशन के बारे में अंधेरे में रखना होता है। हाल ही में तुर्की के हवाई अड्डे पर सामने आई घटना और 25 साल पहले पाकिस्तान में घटी एक पुरानी दास्तान यह साबित करती है कि समय बदलने के बावजूद सुरक्षा एजेंसियों का बुनियादी दांव आज भी एक जैसा ही है।
मार्च 2000 का पाकिस्तान दौरा और डिकॉय एयरफ़ोर्स वन का नाटक
मार्च 2000 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन अपनी दक्षिण एशियाई यात्रा के दौरान भारत से पाकिस्तान के इस्लामाबाद पहुंचे थे। उस दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को राष्ट्रपति क्लिंटन की सुरक्षा को लेकर एक अत्यंत गंभीर और विश्वसनीय खतरे की सूचना मिली थी। इस खतरे से निपटने के लिए सीक्रेट सर्विस ने एक बेहद अनोखा सुरक्षा प्लान तैयार किया। इस्लामाबाद एयरबेस पर मीडिया और कैमरों की मौजूदगी के बीच सबसे पहले एक बड़ा विमान उतरा, जिस पर आधिकारिक तौर पर एयरफ़ोर्स वन के प्रमुख चिन्ह अंकित थे। इस विमान का दरवाजा खुला और एयरफ़ोर्स वन से बिल क्लिंटन जैसा दिखने वाला एक सीक्रेट सर्विस एजेंट बाहर निकला। विमान से उतरे इस डुप्लीकेट एजेंट को देखकर वहां मौजूद सभी पत्रकारों और कैमरामैन को यही लगा कि अमेरिका के राष्ट्रपति इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं।
लेकिन असल कहानी कुछ और ही थी। डिकॉय विमान के उतरने के कुछ ही समय बाद एक साधारण और बिना किसी खास पहचान वाला दूसरा विमान चुपचाप उसी हवाई अड्डे पर उतरा। इसी अनाम और सामान्य दिखते प्लेन से वास्तविक राष्ट्रपति बिल क्लिंटन बाहर आए। इस तरह मीडिया के सामने खुले तौर पर एक डमी विमान और राष्ट्रपति का हमशक्ल उतारकर सीक्रेट सर्विस ने हमलावरों और मीडिया दोनों को पूरी तरह चकमा दे दिया था। इस पूरे सीक्रेट ऑपरेशन की भनक बहुत ही सीमित अधिकारियों को थी। क्लिंटन के भारत से पाकिस्तान रवाना होने से ठीक पहले व्हाइट हाउस के शीर्ष अधिकारियों ने सफर कर रहे पत्रकारों को एक गोपनीय ऑफ-द-रिकॉर्ड ब्रीफिंग दी थी। इसमें पत्रकारों को साफ बता दिया गया था कि असाधारण सुरक्षा कारणों के चलते राष्ट्रपति क्लिंटन पारंपरिक एयरफ़ोर्स वन से उतरने के बजाय किसी वैकल्पिक रास्ते से उतरेंगे।
अनुभवी वरिष्ठ पत्रकार सुसान पेज ने इस घटना का ब्योरा साझा करते हुए बताया कि उस समय अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान यात्रा के दौरान राष्ट्रपति और उनके साथ सफर कर रहे मीडिया दल की सुरक्षा के लिए बेहद असाधारण कदम उठाए जा रहे हैं। चूंकि वह ब्रीफिंग पूरी तरह ऑफ-द-रिकॉर्ड थी, इसलिए इस गुप्त रणनीति को उस समय सार्वजनिक नहीं किया जा सका था। अब 25 साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद इस साहसिक डिकॉय मिशन का पूरा सच दुनिया के सामने आया है।
तुर्की में डोनाल्ड ट्रंप का गुप्त प्लेन ट्रांसफर
बिल क्लिंटन के उस ऐतिहासिक मिशन के 25 साल बाद, ठीक वैसा ही एक गुप्त ऑपरेशन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा के लिए तुर्की में अंजाम दिया गया। हाल ही में आई रिपोर्टों के अनुसार, खुफिया एजेंसियों को ईरान की ओर से डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ एक ठोस और विश्वसनीय हमले के खतरे की जानकारी हासिल हुई थी। जैसे ही खतरे का आकलन पूरा हुआ, सुरक्षा अधिकारियों ने तुरंत निर्णय लिया कि राष्ट्रपति को मुख्य विमान में रखना जोखिम भरा है। इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप को एयरफ़ोर्स वन से निकालकर बेहद खामोशी से एक छोटे और बिना किसी ब्रांडिंग वाले साधारण विमान में शिफ्ट कर दिया गया।
यह पूरा विमान बदलाव ऑपरेशन इतनी सतर्कता और गोपनीयता से किया गया कि मुख्य विमान में मौजूद लोगों को इसकी जरा भी खबर नहीं लगी। डोनाल्ड ट्रंप को एक प्लेन से निकालकर दूसरे छोटे प्लेन तक ले जाने के लिए हवाई अड्डे पर मौजूद एक कैटरिंग ट्रक का सहारा लिया गया। कैटरिंग ट्रक की आड़ में राष्ट्रपति को गुपचुप तरीके से दूसरे विमान में सवार करा दिया गया। इस दौरान मुख्य एयरफ़ोर्स वन विमान में मौजूद 100 से अधिक वरिष्ठ अधिकारी, कर्मचारी और पत्रकार ब्रिटेन की तरफ अपनी पूर्व निर्धारित उड़ान भरते रहे। विमान में सवार अधिकांश लोगों को यह अंदाजा तक नहीं था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही प्लेन बदल चुके हैं और अब वे उस बड़े विमान में मौजूद नहीं हैं।
इस गुप्त मिशन के दौरान एयरफ़ोर्स वन के अंदर मौजूद पत्रकारों और अन्य यात्रियों को सख्त निर्देश दिए गए थे कि वे अपनी खिड़कियों के शेड नीचे ही रखें ताकि बाहर हो रही हलचल दिखाई न दे। डोनाल्ड ट्रंप के साथ नाटो सम्मेलन में भाग लेने जा रहे विदेश मंत्री मार्को रुबियो और ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट भी उसी मुख्य एयरफ़ोर्स वन विमान में ही सफर करते रहे। इस प्रकार एक तरफ राष्ट्रपति को चुपचाप दूसरे छोटे सुरक्षित प्लेन से रवाना कर दिया गया, वहीं दूसरी तरफ बड़े एयरफ़ोर्स वन को ब्रिटेन की ओर भेजा जाता रहा ताकि संभावित दुश्मन राष्ट्रपति की सही लोकेशन का अंदाजा न लगा सके और धोखे में रहे।
डोनाल्ड ट्रंप का बयान और सुरक्षा रणनीति का सच
बाद में डोनाल्ड ट्रंप ने स्वयं इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए पूरे वाकये की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सीक्रेट सर्विस और अमेरिकी सेना के अधिकारियों ने उन्हें तत्काल दूसरे विमान में जाने का स्पष्ट निर्देश दिया था। सुरक्षा टीम ने उन्हें अवगत कराया था कि जिस प्राथमिक एयरफ़ोर्स वन प्लेन में वे सवार हुए थे, उस पर खतरे का स्तर काफी अधिक था। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वे हमेशा सुरक्षा एजेंसियों और सैन्य सलाहकारों के निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं। जब एजेंसियों ने किसी प्रत्यक्ष खतरे की पुष्टि की, तो उन्होंने तुरंत विमान बदल लिया। ट्रंप ने यह भी माना कि बाद में जिस छोटे विमान में उन्हें भेजा गया, वह उस वक्त की स्थिति के लिहाज से शायद ज्यादा सुरक्षित था।
25 साल का अंतर लेकिन एक ही सुरक्षा फॉर्मूला
बिल क्लिंटन के 2000 के इस्लामाबाद दौरे और हालिया तुर्की में डोनाल्ड ट्रंप के सुरक्षा मिशन के बीच 25 साल का लंबा अंतराल है। लेकिन दोनों ही घटनाओं में सीक्रेट सर्विस की मूल रणनीति और मकसद पूरी तरह एक जैसा रहा है। दोनों अभियानों का एकमात्र लक्ष्य दुश्मन को राष्ट्रपति की वास्तविक लोकेशन और उनके विमान की सही पहचान का पता न चलने देना था। जहां बिल क्लिंटन के समय में एयरफ़ोर्स वन के निशान वाले डमी प्लेन और राष्ट्रपति के डुप्लीकेट सीक्रेट सर्विस एजेंट का इस्तेमाल करके चकमा दिया गया था, वहीं डोनाल्ड ट्रंप के मामले में एक एयरपोर्ट कैटरिंग ट्रक की आड़ लेकर विमान बदलने का गुप्त रास्ता चुना गया। यह दोनों घटनाएं दर्शाती हैं कि जब बात अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा की होती है, तो सीक्रेट सर्विस किसी भी तरह का जोखिम उठाए बिना दुनिया भर के कैमरों और खुफिया नजरों को गच्चा देने में जरा भी संकोच नहीं करती।



















