अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पन्नों पर वाशिंगटन की एक और कोशिश का नतीजा बेहद निराशाजनक रहा है। उत्तर कोरिया के साथ कूटनीतिक गतिरोध तोड़ने और बातचीत की मेज पर प्योंगयांग को वापस लाने के मकसद से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा फैसला लिया था। उन्होंने दक्षिण कोरिया के साथ चल रहे विशाल वार्षिक सैन्य अभ्यास का आकार और समय घटाने का निर्देश दिया। हालांकि, प्योंगयांग से इस कदम को कोई सराहना मिलने के बजाय सख्त प्रतिक्रिया मिली है। उत्तर कोरियाई नेतृत्व ने अमेरिका के इस फैसले को तवज्जो देने से इनकार करते हुए सीधे तौर पर खारिज कर दिया है। इसके बावजूद डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी मीडिया में उत्तर कोरियाई शासक के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों की वकालत कर रहे हैं।
उत्तर कोरिया का तीखा हमला और ट्रंप का रुख
किम जोंग उन से अपनी नजदीकियां साबित करने में जुटे डोनाल्ड ट्रंप को प्योंगयांग की तरफ से गहरा झटका लगा है। उत्तर कोरियाई शासन ने ट्रंप की इस पहल को सिरे से खारिज करते हुए इसे कूटनीतिक नाटक करार दिया है। उत्तर कोरिया के तानाशाह की बहन किम यो जोंग ने अमेरिका के इस फैसले पर तल्ख टिप्पणी की है। उन्होंने उत्तर कोरिया की आधिकारिक समाचार एजेंसी केसीएनए के जरिए एक कड़ा बयान जारी किया।
किम यो जोंग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हमें लगता है कि इस कदम पर कोई भी टिप्पणी करना वक्त की सरासर बर्बादी है।” उन्होंने आगे समझाया कि अमेरिका भले ही इस अभ्यास के दिनों की संख्या कम कर दे या इसमें शामिल सैनिकों की संख्या घटा दे, लेकिन इससे उसकी आक्रामक नीति में कोई बदलाव नहीं आता। उत्तर कोरिया का मानना है कि इस प्रकार के सैन्य आयोजनों का मूल मकसद उकसावा पैदा करना है। उत्तर कोरियाई मीडिया ने इन अभ्यासों को खतरनाक करार देते हुए चेतावनी दी है कि वे अपनी संप्रभुता और आत्मरक्षा के लिए हर अमेरिकी कदम का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हैं।
दक्षिण कोरिया से परामर्श के बिना सैन्य अभ्यास में कटौती
डोनाल्ड ट्रंप के इस अचानक लिए गए फैसले से सबसे बड़ा झटका उनके सबसे पुराने सहयोगी दक्षिण कोरिया को लगा है। पेंटागन को 11 दिनों तक चलने वाले इस वार्षिक अभ्यास उल्ची फ्रीडम शील्ड को समय से पहले समाप्त करने का हुक्म जारी किया गया। सोमवार से शुरू हुए इस युद्धाभ्यास को तय कार्यक्रम के अनुसार 27 अगस्त तक चलना था, लेकिन ट्रंप के आदेश के बाद इसे शुक्रवार को ही खत्म करने का फैसला लिया गया।
दक्षिण कोरियाई सैन्य अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि अमेरिका ने इस कटौती से पहले उनके साथ कोई आधिकारिक चर्चा नहीं की थी। अचानक सैन्य अभ्यास का दायरा छोटा किए जाने से दक्षिण कोरिया की सुरक्षा तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कई मैदानी सैन्य अभियानों और वास्तविक प्रशिक्षण सत्रों को आनन-फानन में रद्द करना पड़ा है, जिसके चलते दक्षिण कोरियाई सेना को कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए ही अभ्यास पूरा करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
परमाणु हथियारों और व्यक्तिगत संबंध पर ट्रंप की शेखी
सैन्य अभ्यास को छोटा करने के आदेश के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन में अपने जाने-पहचाने अंदाज में बयानबाजी की। उन्होंने किम जोंग उन के साथ अपनी पुरानी ट्यूनिंग का जिक्र करते हुए दावा किया कि दोनों नेताओं के बीच बेहतरीन तालमेल है। उन्होंने कहा कि “सच्चाई यह है कि मेरी और किम जोंग उन की बहुत अच्छी पटती है, और यह एक बेहतरीन बात है।”
इसके साथ ही ट्रंप ने स्वीकार किया कि उत्तर कोरिया के पास 57 बेहद शक्तिशाली परमाणु हथियार मौजूद हैं। उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा कि उत्तर कोरिया के पास इतनी बड़ी तादाद में परमाणु हथियारों का होना चिंताजनक है और ऐसा कभी नहीं होना चाहिए था। ट्रंप ने दावा किया कि जब तक वाशिंगटन में एक समझदार नेतृत्व मौजूद है, तब तक किम जोंग उन शांत रहेंगे, लेकिन अगर अमेरिका की कमान किसी गैर-जिम्मेदार हाथ में जाती है तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। हालांकि, ट्रंप को उम्मीद थी कि तारीफ और सैन्य ढील के इस पैकेज से प्योंगयांग पिघलेगा, लेकिन प्रतिक्रिया पूरी तरह विपरीत आई।
ऐतिहासिक सुरक्षा गठबंधन पर पड़ता बुरा प्रभाव
1950 के दशक से कायम अमेरिका और दक्षिण कोरिया के ऐतिहासिक सुरक्षा समझौते पर इस तरह के एकतरफा फैसलों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त सैन्य अभ्यासों में लगातार कटौती किए जाने से दोनों देशों की साझा युद्ध तैयारियों की दक्षता प्रभावित होती है। इससे आपातकालीन परिस्थितियों में दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच त्वरित तालमेल बिठाने में दिक्कतें आती हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब ट्रंप ने इस तरह का कदम उठाया है। 2018 और 2019 के दौरान भी किम जोंग उन के साथ शीर्ष शिखर सम्मेलनों की प्रक्रिया के दौरान ट्रंप ने इन अभ्यासों को आर्थिक रूप से पैसों की बर्बादी बताकर स्थगित कर दिया था। उस समय की गई कूटनीति भी बेनतीजा साबित हुई थी, क्योंकि वाशिंगटन प्रतिबंध हटाने को तैयार नहीं था और प्योंगयांग अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करने पर सहमत नहीं हुआ। आज स्थिति यह है कि उत्तर कोरिया न केवल 50 से अधिक परमाणु बमों से लैस है, बल्कि उसे रूस का भी खुला समर्थन प्राप्त है, जिससे प्योंगयांग को बिना किसी बड़ी रियायत के वार्ता की मेज पर लाना बेहद कठिन हो गया है।



















