अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देश की चुनावी व्यवस्था में सुधार की वकालत करते हुए मतदाता सूचियों की व्यापक जांच का अभियान शुरू किया है। भारत की चुनाव प्रणाली और वहां अपनाई जाने वाली स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने अमेरिकी मतदाता पंजीकरण नियमों को सख्त बनाने की मांग तेज कर दी है। इस पूरे कदम का मुख्य केंद्र सेव अमेरिका एक्ट को पारित कराना है, जिसका उद्देश्य केवल पात्र अमेरिकी नागरिकों के लिए मतदान सुनिश्चित करना और पहचान सत्यापन प्रणाली को मजबूत करना है। वर्ष 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में प्रक्रियागत अनियमितताओं का मुद्दा लगातार उठाते रहे डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि नागरिकता आंकड़ों के सत्यापन से चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी।
मतदाता रिकॉर्ड की जांच और शुरुआती आंकड़े
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, अमेरिकी जनगणना ब्यूरो इस समय 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में पंजीकृत मतदाताओं के आंकड़ों की नागरिकता रिकॉर्ड के साथ गहन समीक्षा कर रहा है। इस प्रशासनिक जांच के शुरुआती चरण में लगभग 12.8 करोड़ मतदाता रिकॉर्ड का मिलान किया गया। सोशल मीडिया पर साझा किए गए विवरण में यह दावा किया गया कि इस प्राथमिक सत्यापन के दौरान 24 हजार से अधिक ऐसे व्यक्तियों की पहचान हुई है जो अमेरिकी नागरिकता की पात्रता पूरी नहीं करते थे। डोनाल्ड ट्रंप ने इन नामों को अवैध मतदाता बताते हुए चुनावी रिकॉर्ड से हटाने पर जोर दिया है।
इस जांच अभियान को आगे बढ़ाते हुए आने वाले समय में अतिरिक्त 3.2 करोड़ मतदाता रिकॉर्ड का मिलान करने की योजना बनाई गई है। डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि अगले चरण की पड़ताल पूरी होने के बाद गैर-नागरिक मतदाताओं से जुड़ी विसंगतियों की संख्या में और इजाफा हो सकता है। इसी आधार पर उन्होंने सेव अमेरिका एक्ट को जल्द से जल्द लागू करने की अपनी मांग को दोहराया है। उनके अनुसार, यह पूरी पड़ताल चुनावी प्रणाली की खामियों को उजागर करती है और कड़े मतदाता पहचान कानूनों की आवश्यकता को साबित करती है।
2020 के चुनावी नतीजों और आंकड़ों का विश्लेषण
हालांकि इस नई जांच प्रक्रिया के सामने आने के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। विश्लेषकों का कहना है कि प्रारंभिक जांच में सामने आए 24 हजार रिकॉर्ड कुल 12.8 करोड़ जांचे गए रिकॉर्ड की तुलना में एक बेहद छोटा हिस्सा हैं। इसके अलावा, उपलब्ध आंकड़ों से यह भी स्पष्ट नहीं होता है कि चिन्हित किए गए व्यक्तियों ने वास्तव में मतदान किया था या नहीं, और यदि उन्होंने वोट डाला था तो वह किस उम्मीदवार के पक्ष में था। इसलिए केवल इन आंकड़ों के आधार पर पूरे चुनावी परिणाम की वैधता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन ने डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ 70 लाख से अधिक लोकप्रिय वोटों के अंतर से निर्णायक जीत हासिल की थी। चुनावी विशेषज्ञों का तर्क है कि डेटा मिलान में प्रशासनिक त्रुटियों, पते में बदलाव या नाम की स्पेलिंग में भिन्नता के कारण भी रिकॉर्ड में विसंगतियां दिखाई दे सकती हैं। ऐसे में 24 हजार अनिश्चित रिकॉर्ड्स के आधार पर 2020 के चुनाव परिणाम को गलत ठहराना तथ्यात्मक रूप से अधूरा तर्क माना जा रहा है।
सेव अमेरिका एक्ट और भारत के SIR से तुलना
अमेरिका में मतदाता सूची की इस जांच ने एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक इस कदम को चुनावी सुरक्षा, राष्ट्रीय संप्रभुता और मतदाता पहचान की पारदर्शिता के लिए आवश्यक मान रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, योजना के आलोचकों का कहना है कि जनगणना डेटा और मतदाता सूची के स्वचालित मिलान में तकनीकी त्रुटियां हो सकती हैं। आलोचकों को डर है कि कागजी कार्रवाई की सख्त शर्तों के कारण कई योग्य और असली अमेरिकी नागरिक भी अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
प्रस्तावित सेव अमेरिका एक्ट के तहत संघीय चुनावों में पंजीकरण कराने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेज प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाने की व्यवस्था है। व्हाइट हाउस प्रशासन इसे चुनावी निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम बता रहा है। यद्यपि अमेरिका में जारी यह प्रक्रिया भारत के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की हूबहू नकल नहीं है, लेकिन दोनों का मूल ध्येय मतदाता सूचियों को शुद्ध बनाना ही है। भारत में चुनाव आयोग कानूनी ढांचे के तहत व्यापक घर-घर सत्यापन करता है, जबकि अमेरिका में यह प्रक्रिया डेटाबेस मिलान के जरिए की जा रही है। दोनों ही लोकतांत्रिक देशों में मुख्य सवाल यही है कि मतदाता सूची को कितना त्रुटिरहित और पारदर्शी बनाया जा सकता है।



















