वाशिंगटन में आयोजित एक विशेष समारोह में प्रौद्योगिकी और विज्ञान जगत के कई दिग्गजों को शीर्ष अमेरिकी नागरिक सम्मानों से नवाजा गया। इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला को प्रतिष्ठित नेशनल मेडल ऑफ टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन प्रदान किया। दिलचस्प बात यह रही कि इस सम्मान समारोह से महज चंद घंटे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसी कंपनी पर विदेशी कामगारों से जुड़े एच-1बी वीजा नियमों की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए प्रशासनिक कदम उठाने की घोषणा की थी।
व्हाइट हाउस में विज्ञान और नवाचार के दिग्गजों का सम्मान
गुरुवार को आयोजित इस समारोह का शीर्षक ‘साइंस: ए न्यू गोल्डन एज’ रखा गया था। इस मंच से कुल छह प्रमुख तकनीकी नेतृत्वकर्ताओं और वैज्ञानिकों के योगदान को औपचारिक मान्यता दी गई। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने माइक्रोसॉफ्ट के विस्तार और वैश्विक स्तर पर उसकी तकनीकी पहुंच को सशक्त बनाने के लिए सत्या नडेला के काम की मुक्तकंठ से सराहना की। नडेला के अलावा डेल के माइकल डेल को भी प्रौद्योगिकी और नवाचार की श्रेणी में इसी पदक से सम्मानित किया गया।
विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने के लिए चार अन्य हस्तियों को नेशनल मेडल ऑफ साइंस प्रदान किया गया। इनमें एलन मस्क, गूगल के सह-संस्थापक सर्गेई ब्रिन, एनवीडिया के सीईओ जेनसन हुआंग और एएमडी की सीईओ लिसा सु शामिल रहे। ट्रंप ने इन सभी शख्सियतों को देश की अमूल्य प्रतिभाएं बताते हुए उनकी भूमिका की प्रशंसा की। उन्होंने विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विकास में इनके योगदान को रेखांकित किया।
समारोह के दौरान ट्रंप ने एलन मस्क की तुलना ऐतिहासिक आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन से करते हुए उन्हें आधुनिक दौर का एडिसन बताया। एडिसन को मुख्य तौर पर इलेक्ट्रिक बल्ब के आविष्कार और कई क्रांतिकारी खोजों के लिए जाना जाता है। इस अवसर पर यह तथ्य भी सामने आया कि सम्मानित किए गए छह दिग्गजों में से पांच के परिवार दूसरे देशों से आकर अमेरिका में बसे थे।
सम्मान से ठीक पहले माइक्रोसॉफ्ट पर वीजा कार्रवाई
सत्या नडेला को सम्मानित किए जाने से कुछ ही घंटे पहले उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कड़ा रुख अपनाते हुए माइक्रोसॉफ्ट को एक विशेष सरकारी कार्यक्रम से बाहर करने का ऐलान किया था। यह कार्यक्रम उन विदेशी पेशेवरों को स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड दिलाने की प्रक्रिया से जुड़ा है, जो एच-1बी वीजा के तहत अमेरिका में सेवाएं दे रहे हैं। ग्रीन कार्ड हासिल करने के बाद किसी भी विदेशी नागरिक को अमेरिका में अनिश्चितकाल तक रहने और काम करने की कानूनी अनुमति मिल जाती है।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने आरोप लगाया कि बड़ी कंपनियां अमेरिकी कामगारों के हितों को नजरअंदाज कर रही हैं। उन्होंने दावा किया कि माइक्रोसॉफ्ट ने 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को काम से हटाया और उसी दौर में 6,300 एच-1बी वीजा धारकों को नियुक्त किया। वेंस का कहना था कि कंपनियों को विदेशी पेशेवरों पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू प्रतिभाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।
माइक्रोसॉफ्ट ने आरोपों पर दी सफाई
उपराष्ट्रपति के इन दावों को माइक्रोसॉफ्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। कंपनी ने अपने आंकड़े पेश करते हुए स्पष्ट किया कि बीते वित्त वर्ष में उसने लगभग 6,000 एच-1बी वीजा अर्जियां दाखिल की थीं। हालांकि, इन कुल आवेदनों में से 80 फीसदी मामले नए कर्मचारियों को विदेश से बुलाने के लिए नहीं थे, बल्कि पहले से कार्यरत कर्मचारियों के वीजा की समयसीमा बढ़ाने अथवा उनके मौजूदा दर्जे में बदलाव से जुड़े थे।
कंपनी के अनुसार, शेष 20 फीसदी आवेदन ऐसे लोगों के थे जो पहले से ही कानूनी रूप से अमेरिका में मौजूद थे और बाद में माइक्रोसॉफ्ट से जुड़े। कंपनी ने बताया कि ये कर्मचारी हाल में बाहर से नहीं आए थे और उनकी कुल संख्या अमेरिका में कार्यरत कंपनी के समूचे कार्यबल का मात्र एक प्रतिशत ही बैठती है। माइक्रोसॉफ्ट ने दोहराया कि वह वीजा से जुड़े सभी तय नियमों और शर्तों का पूरी तरह पालन करती है और केवल पात्र कर्मचारियों के लिए ही आवेदन करती है।
एच-1बी वीजा नीति और प्रशासन का रुख
एच-1बी वीजा व्यवस्था अमेरिकी कंपनियों को यह छूट देती है कि वे भारत जैसे देशों से उच्च शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष कर्मचारियों को अपने यहां बुला सकें। भारत के आईटी क्षेत्र और तकनीकी पेशेवरों के लिए यह वीजा लंबे समय से एक अहम जरिया रहा है। हालांकि, मौजूदा प्रशासन का जोर इस बात पर है कि विदेशी प्रतिभाओं को केवल उन्हीं भूमिकाओं में लाया जाए जिनमें विशेष कौशल की दरकार हो और जिनके लिए स्थानीय स्तर पर उपयुक्त कर्मचारी उपलब्ध न हों।
प्रशासन का तर्क है कि घरेलू कामगारों की जगह कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को रखने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। इसी दृष्टिकोण के तहत सरकार ने वीजा आवेदन की फीस बढ़ाने के कदम का भी समर्थन किया है, ताकि कंपनियां सिर्फ अनिवार्य आवश्यकता होने पर ही इस विकल्प का इस्तेमाल करें।





















