अमेरिकी सेना के इतिहास में आठ दशकों से अधिक समय बाद एक असाधारण और कठोर मृत्युदंड की प्रक्रिया अमल में लाई जाने वाली है। टेक्सास स्थित फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पर हुए भीषण नरसंहार के दोषी पूर्व सेना मेजर निदाल हसन को फायरिंग स्क्वाड के सामने खड़ा करके मौत की सजा दी जाएगी। द्वितीय विश्व युद्ध के समापन के बाद अमेरिकी सैन्य न्याय प्रणाली में यह पहला मौका होगा जब किसी सैन्य अधिकारी को इस विशिष्ट तरीके से निष्पादित किया जाएगा। इस फैसले के साथ ही उस भयावह घटना के 17 साल बाद कानूनी प्रक्रिया अपने अंतिम मुकाम पर पहुंच गई है।
राष्ट्रपति की औपचारिक मंजूरी और निष्पादन की तारीख
अमेरिकी सैन्य कानून के तहत किसी भी फौजी कैदी की सजा-ए-मौत को तामील करने के लिए देश के राष्ट्रपति की सीधी मंजूरी अनिवार्य होती है। पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने सोशल मीडिया मंच X पर इस फैसले की पुष्टि करते हुए बताया कि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की आधिकारिक सिफारिश के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने निदाल हसन के मृत्यु वारंट पर अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। आधिकारिक आदेश के अनुसार, 3 दिसंबर 2026 को उसी फोर्ट हुड सैन्य ठिकाने पर हसन को गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतारा जाएगा, जहां उसने इस खूनी वारदात को अंजाम दिया था।
5 नवंबर 2009 का खूनी मंजर और फोर्ट हुड नरसंहार
यह मामला 5 नवंबर 2009 की दोपहर का है, जिसे अमेरिकी इतिहास में किसी सक्रिय सैन्य ठिकाने पर हुआ सबसे घातक गैर-युद्ध हमला माना जाता है। निदाल हसन अमेरिकी थलसेना में एक मनोचिकित्सक के तौर पर मेजर के पद पर तैनात था। उसका मुख्य दायित्व युद्ध क्षेत्र में तैनात होने वाले या वहां से लौटे सैनिकों की मानसिक स्थिति और तनाव का प्रबंधन करना था। लेकिन उसी दिन उसने अपने ही वर्दीधारी साथियों पर बेहद हिंसक हमला बोल दिया।
हसन फोर्ट हुड स्थित एक व्यस्त चिकित्सा केंद्र में हथियारों के साथ दाखिल हुआ। उस केंद्र में दर्जनों निहत्थे फौजी इराक और अफगानिस्तान में अपनी आगामी तैनाती से पहले अनिवार्य मेडिकल जांच और टीके लगवाने के लिए कतारों में खड़े थे। हसन ने बिना किसी चेतावनी के अचानक अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इस ताबड़तोड़ गोलीबारी में 13 अमेरिकी सैनिकों की मौके पर ही जान चली गई, जबकि 32 अन्य जवान गंभीर रूप से घायल होकर लहूलुहान हो गए।
कोर्ट-मार्शल की सुनवाई और जुर्म का खुला कबूलनामा
इस भीषण गोलीबारी के बाद हसन को हिरासत में लिया गया और उसके खिलाफ सैन्य अदालत में मुकदमा चलाया गया। साल 2013 में चले कोर्ट-मार्शल के दौरान हसन ने अपने ऊपर लगे आरोपों से मुकरने के बजाय अदालत के सामने अपना अपराध पूरी तरह स्वीकार कर लिया। उसने अपने बयानों में कहा कि उसने अफगानिस्तान में तालिबान और मुसलमानों की रक्षा करने के उद्देश्य से जानबूझकर अपने ही साथी सैनिकों पर गोलियां चलाई थीं। सैन्य अदालत ने सभी सबूतों और स्वीकारोक्ति के आधार पर उसे हत्या और हत्या के प्रयास के मामलों में दोषी करार देते हुए सजा-ए-मौत सुनाई थी।
फायरिंग स्क्वाड की पूरी प्रक्रिया और तौर-तरीके
फायरिंग स्क्वाड के माध्यम से मृत्युदंड देने की पद्धति तकनीकी और मनोवैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोण से बेहद कठोर मानी जाती है। इस प्रक्रिया में कैदी को एक मजबूत कुर्सी पर बैठाकर लोहे के बंधनों या चमड़े की पट्टियों से कसकर जकड़ दिया जाता है, ताकि वह किसी भी तरह की हलचल न कर सके। इसके बाद कैदी के चेहरे को एक काले कपड़े से पूरी तरह ढक दिया जाता है।
प्रक्रिया के अगले चरण में एक चिकित्सा अधिकारी कैदी के सीने की जांच करता है और स्टेथोस्कोप की मदद से ठीक दिल के स्थान पर एक सफेद गोलाकार कपड़ा या कागज का निशान लगा देता है। इसके बाद लगभग 20 फीट की दूरी पर राइफलों से लैस पांच प्रशिक्षित निशानेबाजों का एक दस्ता कतार में खड़ा होता है। निर्धारित संकेत मिलते ही पांचों निशानेबाज एक साथ सीधे कैदी के दिल के उस निशाने को भेदते हुए ट्रिगर दबाते हैं। गोलियों के एक साथ सीने में धंसने से सेकंडों के भीतर दिल फट जाता है और कैदी की तत्काल मृत्यु हो जाती है।
सैन्य न्याय संहिता और मृत्युदंड का कानूनी इतिहास
अमेरिका में सैन्य कर्मियों के मामलों की सुनवाई सिविल अदालतों से अलग यूनिफॉर्म कोड ऑफ मिलिट्री जस्टिस के तहत होती है। इस कानून की धाराएं सैन्य अनुशासन और गंभीर अपराधों के लिए अलग मानदंड तय करती हैं। सैन्य कानून के मुताबिक, सैन्य अदालत द्वारा दिए गए मृत्युदंड को तब तक अमल में नहीं लाया जा सकता जब तक कमांडर-इन-चीफ यानी राष्ट्रपति स्वयं उस पर लिखित मुहर न लगा दें।
अमेरिकी सैन्य इतिहास में मृत्युदंड का प्रावधान कानूनी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। साल 1983 में सशस्त्र बलों की अपील अदालत ने सैन्य मृत्युदंड के तत्कालीन प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया था। हालांकि, इसके अगले ही साल 1984 में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने एक विशेष कार्यकारी आदेश जारी करके नए संवैधानिक दिशा-निर्देशों के साथ सेना में सजा-ए-मौत को दोबारा बहाल किया था। सामान्य नागरिक स्तर पर अमेरिका के 27 राज्यों में विभिन्न तरीकों से मृत्युदंड का प्रावधान मौजूद है, लेकिन फायरिंग स्क्वाड का उपयोग अत्यंत सीमित है। साउथ कैरोलिना, इडाहो, ओक्लाहोमा और यूटा जैसे कुछ राज्यों में ही इसके कानूनी विकल्प मौजूद हैं। सेना के भीतर 1945 के बाद से कभी भी फायरिंग स्क्वाड का सहारा नहीं लिया गया था।
वॉशिंगटन में नीतिगत बदलाव और कार्यकारी आदेश
इस फैसले के समय का सीधा संबंध वॉशिंगटन में सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक प्राथमिकताओं से है। जो बाइडन के प्रशासन के दौरान संघीय स्तर पर मृत्युदंड के मामलों के क्रियान्वयन पर रोक जैसी स्थिति बनी हुई थी। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति पद संभालने के बाद नीतियों में स्पष्ट बदलाव आया। ट्रंप ने अपने कार्यकाल के पहले ही दिन नया कार्यकारी आदेश जारी करके संघीय और सैन्य स्तर पर मृत्युदंड की प्रक्रिया को पूरी सक्रियता से लागू करने का निर्देश दिया था।
ट्रंप का रुख रहा है कि देश की सुरक्षा और नागरिकों पर हमला करने वाले गंभीर अपराधियों के खिलाफ कठोरतम सजा का डर कायम रहना चाहिए। इसी नीतिगत दिशा के तहत रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने निदाल हसन के निष्पादन की औपचारिक फाइल आगे बढ़ाई, जिस पर राष्ट्रपति ने अंतिम स्वीकृति दे दी। 17 वर्षों की लंबी कानूनी प्रक्रियाओं, समीक्षाओं और अपीलों के बाद अब 3 दिसंबर 2026 को इस बहुचर्चित मामले में सजा की तामीली तय की गई है।



















