पारंपरिक भारतीय मसालों की महक अब सरहदों के पार जाकर पश्चिमी दुनिया के घरों और खान-पान के तौर-तरीकों में गहराई से रच-बस रही है। अमेरिका के बाजारों, आधुनिक कैफे और घरों में हल्दी, जीरा, काली मिर्च तथा मिर्च की खपत लगातार बढ़ती दिख रही है। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने इस रुझान को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि यह बदलाव केवल भोजन के स्वाद को बेहतर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए भारतीय संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत की एक अहम पहचान अमेरिकी समाज तक पहुंच रही है। उन्होंने यह बात इंडिया हाउस में देसी मसालों के सम्मान में आयोजित एक खास जलसे के दौरान साझा की।
व्यापार से कहीं आगे सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक
भारतीय मसालों की वैश्विक उपस्थिति पर चर्चा करते हुए विनय मोहन क्वात्रा ने कहा कि मसालों को केवल एक साधारण कमर्शियल उत्पाद या कारोबारी नजरिए से देखना उनकी असली अहमियत को बहुत छोटा करके आंकना होगा। उनके अनुसार, ये मसाले असल में भारत की कई सहस्राब्दियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा और ज्ञान को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का एक सशक्त जरिया हैं। उन्होंने अपने निजी अनुभवों का हवाला देते हुए समझाया कि भारत के आम घरों में मसालों का उपयोग किसी औपचारिक नुस्खे के बजाय पीढ़ियों के साझा अनुभव से आगे बढ़ता है। आज एक सामान्य परिवार जिस किस्म के मसालों और तरीकों को अपनाता है, ठीक वही विरासत उसकी पिछली पीढ़ियों से चली आ रही है। अब यही पारिवारिक और सांस्कृतिक परंपरा भारतीय दायरों से बाहर निकलकर पश्चिमी घरों की रसोई में अपनी जड़ें जमा रही है।
हल्दी की लोकप्रियता और बदलते कैफे ट्रेंड्स
अमेरिकी समाज में भारतीय रसोई की स्वीकार्यता का सबसे स्पष्ट और अनूठा उदाहरण हल्दी के उपयोग में नजर आता है। किसी दौर में केवल भारतीय रसोई के तड़कों और पारंपरिक घरेलू उपचारों तक सीमित रहने वाली हल्दी आज पूरे अमेरिका के वेलनेस सेक्टर और मॉडर्न कैफे मेन्यू में प्रमुखता से शामिल हो चुकी है। इसका सबसे चर्चित रूप पारंपरिक हल्दी वाले दूध का पश्चिमी रूपांतरण यानी टर्मरिक लाते है, जो अब अमेरिकी महानगरों के कैफे में बेहद लोकप्रिय पेय बन चुका है।
अपनी पिछली राजनयिक जिम्मेदारियों को याद करते हुए विनय मोहन क्वात्रा ने बताया कि साल 2010 से 2013 के बीच जब वे वॉशिंगटन में पदस्थ थे, उस दौर में वहां के किसी भी कैफे के मेन्यू में हल्दी वाला लाते ढूंढ़ने पर भी नजर नहीं आता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में जमीनी स्तर पर खान-पान का पूरा परिदृश्य बदल चुका है। उन्होंने कहा कि हल्दी का महत्व भारतीय जीवनशैली और आयुर्वेदिक चिकित्सा परंपरा में हमेशा से बेहद खास रहा है, जिसे अब दुनिया एक नई दृष्टि से स्वीकार कर रही है।
वेलनेस और प्राकृतिक जीवनशैली में छिपे नए अवसर
अमेरिका में मसालों के बढ़ते चलन को केवल चटपटे स्वाद से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसके पीछे लोगों की सेहत, प्राकृतिक उत्पादों और संतुलित जीवनशैली के प्रति बढ़ती जागरूकता एक बड़ा कारण है। ऑर्गेनिक खान-पान के मौजूदा दौर का जिक्र करते हुए विनय मोहन क्वात्रा ने कहा कि आधुनिक समाज आज जिसे सबसे शुद्ध, प्राकृतिक और सेहतमंद आहार मान रहा है, उसकी जड़ें वस्तुतः पुरानी और पारंपरिक आहार पद्धतियों में ही समाई हुई हैं। आधुनिक जीवन एक तरह से अपनी भूल चुकी पुरानी जड़ों की तरफ ही दोबारा लौट रहा है।
भारतीय कृषि और निर्यात क्षेत्र के लिए यह बदलाव सिर्फ उत्साह का विषय नहीं है, बल्कि एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय बाजार का संकेत भी देता है। अब सबसे अहम चुनौती केवल विदेशी बाजार में मसाले बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें वहां के लोगों की रोजमर्रा की सामान्य डाइट और आदत का स्थायी हिस्सा बनाना है।



















