अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर अपनी दावेदारी खुलकर सामने रख दी है। ओवल ऑफिस में पत्रकारों से मुखातिब होते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि अब वक्त आ चुका है जब उनके कूटनीतिक प्रयासों को मान्यता मिलनी चाहिए। हालांकि अपनी मजबूत दावेदारी पेश करने के फौरन बाद उन्होंने नॉर्वेजियन नोबेल समिति के तौर-तरीकों और उसकी निष्पक्षता पर भी गहरा संदेह जता दिया। जब संवाददाताओं ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें इस दफा यह पदक मिलने का पूरा भरोसा है, तो ट्रंप का कहना था कि वे समिति की सोच और आगामी निर्णय के बारे में पहले से कुछ नहीं कह सकते।
समिति के रुख पर अविश्वास और दावों का गणित
ट्रंप ने चयन समिति के मिजाज पर तंज कसते हुए टिप्पणी की कि उस संस्था की एक खास छवि बन चुकी है, जिसके चलते शायद उनके जैसे शख्सियतों को इस वैश्विक सम्मान से दूर ही रखा जाता है। अपने बयानों के जरिए उन्होंने एक तरफ खुद को इस पदक का सबसे बड़ा हकदार बताया, तो दूसरी तरफ समिति द्वारा अपने नाम को खारिज किए जाने की आशंका भी पहले ही जता दी। पिछले वर्ष जनवरी महीने में सत्ता संभालने के बाद से ही अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार यह रेखांकित करते रहे हैं कि दुनिया के अलग-अलग कोनों में सुलग रहे विवादों को शांत कराने में उन्होंने निर्णायक भूमिका निभाई है। उनके अपने आकलन के मुताबिक, उन्होंने कम से कम आठ बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को थामने में सीधी मध्यस्थता की है।
वेनेजुएला से मिला सांकेतिक सम्मान और तीन देशों का नामांकन
अपनी चर्चा के दौरान राष्ट्रपति ने वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो का खास तौर पर उल्लेख किया। मचाडो ने जनवरी 2026 में वेनेजुएला के संकट में अमेरिकी सहायता के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हुए वर्ष 2025 का अपना नोबेल शांति पुरस्कार पदक ट्रंप को भेंट कर दिया था। ट्रंप ने उस घटनाक्रम को याद करते हुए साझा किया कि पिछली विजेता से मिले इस परोक्ष सम्मान ने उन्हें बेहद गौरवान्वित किया था। ट्रंप के अनुसार, उस वक्त मचाडो ने कहा था कि आधुनिक इतिहास में राष्ट्रपति ट्रंप की तुलना में कोई भी दूसरा नेता इस सम्मान का इतना स्वाभाविक अधिकारी नहीं रहा है।
वर्ष 2026 के औपचारिक नामांकन की बात करें तो ट्रंप का नाम इस बार तीन अलग-अलग देशों की ओर से आगे बढ़ाया गया है। कंबोडिया, इजरायल और पाकिस्तान ने शांति प्रयासों के लिए उनके नाम की सिफारिश नॉर्वेजियन समिति को भेजी है। हालांकि इन आधिकारिक नामांकनों के बावजूद विश्लेषक और अंतरराष्ट्रीय पक्ष उनके दावों पर लगातार उंगलियां उठा रहे हैं। जिन आठ संघर्षों को सुलझाने का श्रेय ट्रंप अपने खाते में जोड़ते हैं, उनमें शामिल कई पक्षों ने खुले तौर पर उनकी कूटनीतिक सफलता पर सवाल खड़े किए हैं।
मैदान में जारी जंग और कूटनीतिक विफलताएं
जमीनी हकीकत ट्रंप के शांतिवादी दावों से कई मोर्चों पर मेल नहीं खाती दिखती। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के अशांत क्षेत्र हों या फिर कंबोडिया और थाईलैंड की साझा सीमा पर पसरा तनाव, इन इलाकों में हिंसा और टकराव अब भी जस के तस बने हुए हैं। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ा विरोधाभास उनकी अपनी सैन्य कार्रवाइयों को लेकर सामने आया है। शांति स्थापित करने का लगातार दावा करने वाले ट्रंप ने इसी वर्ष फरवरी में ईरान के खिलाफ सैन्य हमला शुरू कर दिया था, जिसके चलते समूचे पश्चिम एशिया में अस्थिरता का नया दौर शुरू हो गया।
वहीं दूसरी ओर, रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण युद्ध ट्रंप के प्रशासन के लिए सबसे पेचीदा कूटनीतिक चुनौती बनकर खड़ा है। अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में उन्होंने पहले ही दिन इस जंग को पूरी तरह समाप्त कराने का संकल्प दोहराया था, मगर महीनों बीत जाने के बाद भी इस संकट का कोई ठोस समाधान सामने नहीं आ सका है। इसके साथ ही अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के ठिकानों पर किए गए हमलों ने खाड़ी क्षेत्र में तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला भी गंभीर रूप से चरमरा गई है।
शुक्रवार को ऐलान और मुकाबले में शामिल अन्य बड़े नाम
नॉर्वेजियन नोबेल समिति शुक्रवार को वर्ष 2026 के शांति पुरस्कार के आधिकारिक विजेता के नाम की घोषणा करने जा रही है। इस बार चयन समिति के सामने सिर्फ राजनेताओं के नाम ही नहीं हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मानवीय कार्यों और न्याय की वकालत करने वाले कई प्रभावशाली चेहरे भी दौड़ में शामिल हैं। संभावित दावेदारों में पोप लियो के अलावा इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट और फिलिस्तीनी क्षेत्रों के लिए विशेष रैपोर्टेयर के नाम भी बेहद मजबूती से चर्चा के केंद्र में हैं। ऐसे कड़े मुकाबले और युद्धग्रस्त वास्तविकताओं के बीच अब पूरी दुनिया की नजरें ओस्लो पर टिकी हैं कि क्या समिति ट्रंप के तर्कों को स्वीकार करेगी या उनका सपना एक बार फिर अधूरा रह जाएगा।



















