युद्ध के मैदान अब केवल जमीनी सीमाओं और पारंपरिक हवाई क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वैश्विक महाशक्तियों की सैन्य प्रतिस्पर्धा तेजी से बाहरी अंतरिक्ष की कक्षाओं में केंद्रित हो रही है। आधुनिक सैन्य अभियानों, मिसाइल ट्रैकिंग, सुरक्षित संचार और सटीक नेविगेशन के लिए दुनिया भर की सेनाएं उपग्रह नेटवर्क पर व्यापक रूप से निर्भर हैं। इसी निर्भरता को देखते हुए रूस और चीन ने अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों को निष्क्रिय करने, जाम करने और नष्ट करने में सक्षम अत्यधिक उन्नत तकनीक विकसित की है। इस रणनीतिक बदलाव ने पेंटागन और व्हाइट हाउस के सुरक्षा गलियारों में गहरी बेचैनी पैदा कर दी है, क्योंकि अंतरिक्ष में होने वाला एक भी बड़ा प्रहार किसी भी आधुनिक सेना की परिचालन क्षमता को गंभीर रूप से पंगु बना सकता है।
उपग्रह नेटवर्क पर निर्भरता और रणनीतिक संवेदनशीलता
आधुनिक रक्षा प्रणालियों में पृथ्वी की निचली कक्षा में चक्कर लगा रहे उपग्रह किसी भी विकसित देश की सुरक्षा व्यवस्था की मुख्य रीढ़ माने जाते हैं। अमेरिकी सशस्त्र बल अपने दैनिक अभियानों, सामरिक खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, रणनीतिक मिसाइल चेतावनी प्रणाली और जीपीएस आधारित हथियारों के मार्गदर्शन के लिए पूरी तरह इन्हीं उपग्रहों पर निर्भर हैं। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के विशेषज्ञ क्लेटन स्वोप के अनुसार, यदि कोई विरोधी शक्ति इन अंतरिक्ष संपत्तियों को जाम करने या नष्ट करने में सफल हो जाती है, तो सैन्य बलों के लिए प्रभावी ढंग से लड़ पाना लगभग असंभव हो जाएगा।
यह स्थिति युद्ध के मैदान में एक असममित बढ़त पैदा करती है। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रूस और चीन इस तकनीकी निर्भरता को पश्चिमी सुरक्षा ढांचे की सबसे बड़ी कमजोरी के तौर पर देखते हैं। किसी भी संभावित संघर्ष की शुरुआत में ही इन उपग्रहों को निशाना बनाकर दुश्मन की पूरी कमान और नियंत्रण प्रणाली को अंधा और बहरा किया जा सकता है। सबसे अहम बात यह है कि इसका असर केवल सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम जनजीवन भी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाएगा। उपग्रह नेटवर्क ठप होने से वाणिज्यिक बैंक सर्वर, विमानन और समुद्री नेविगेशन, मौसम की पूर्व सूचनाएं और बिजली ग्रिड का समन्वयन सेकंडों में बंद हो सकता है।
चीन के रोबोटिक आर्म और लेजर हथियारों की क्षमता
अंतरिक्ष में अपनी सामरिक उपस्थिति मजबूत करने के लिए चीन ने कई विध्वंसक प्रणालियों पर काम किया है, जिनका मुख्य उद्देश्य विरोधी उपग्रहों को बिना पारंपरिक मिसाइल दागे निष्क्रिय करना है। चीनी सैन्य रणनीति में काउंटर-स्पेस क्षमताओं को विशेष प्राथमिकता दी गई है। इसके तहत जमीन पर आधारित अत्यधिक शक्तिशाली लेजर हथियार तैनात किए गए हैं। ये लेजर प्रणालियां जमीन से ही लो-अर्थ ऑर्बिट में मौजूद उपग्रहों के ऑप्टिकल और थर्मल सेंसर्स पर सीधा प्रहार कर उन्हें हमेशा के लिए अंधा बना सकती हैं, जिससे उपग्रह अपनी कार्यक्षमता पूरी तरह खो देते हैं।
इसके अलावा चीन ने अंतरिक्ष यानों में रोबोटिक आर्म्स यानी यांत्रिक भुजाएं लगाने की तकनीक में महारत हासिल की है। उदाहरण के तौर पर, शीजियान-17 (Shijian-17) जैसा अंतरिक्ष यान जटिल कक्षीय युद्धाभ्यास करने में सक्षम है। यह यान अपनी मजबूत रोबोटिक भुजा की मदद से किसी भी अन्य उपग्रह को सीधे जकड़ सकता है, उसे उसकी तय कक्षा से बाहर धकेल सकता है या अंतरिक्ष में ही नष्ट कर सकता है। पेंटागन इस प्रकार के तकनीकी विकास को केवल वैज्ञानिक परीक्षण न मानकर एक सीधा और आक्रामक अंतरिक्ष हथियार मानता है, जो शांति काल में भी रणनीतिक संपत्तियों के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है।
रूसी कॉसमॉस उपग्रहों की आक्रामक गतिविधियां
दूसरी तरफ रूस ने अंतरिक्ष में अमेरिकी जासूसी और टोही उपग्रहों की निगरानी और उन्हें निशाना बनाने के लिए 'कॉसमॉस' श्रृंखला के उपग्रहों का एक विस्तृत संजाल तैयार किया है। साल 2019 से ही रूसी अंतरिक्ष बल अपने कॉसमॉस उपग्रहों को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उपग्रहों के बेहद करीब भेजते रहे हैं। कॉसमॉस 2543 ने एक अमेरिकी उपग्रह का पीछा करते हुए अंतरिक्ष में एक अज्ञात प्रोजेक्टाइल दागा था, जिसे वाशिंगटन ने सीधे तौर पर एक एंटी-सैटेलाइट हथियार परीक्षण करार दिया था।
यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, बल्कि बाद के वर्षों में कॉसमॉस 2558 और कॉसमॉस 2576 को भी संवेदनशील अमेरिकी कक्षाओं के पास तैनात किया गया। साल 2025 तक कॉसमॉस 2588 एक अमेरिकी सरकारी उपग्रह के महज 93 किलोमीटर के बेहद खतरनाक दायरे में चक्कर लगाता दर्ज किया गया। इतनी कम दूरी पर विरोधी उपग्रह का मौजूद होना किसी भी क्षण प्रत्यक्ष हमले या कक्षीय टकराव की आशंका को जन्म देता है। इसके साथ ही रूस 'बुरेवोस्तनिक' नामक एक ऐसी प्रणाली पर भी काम कर रहा है जिसे विशेष रूप से संशोधित MiG-31 लड़ाकू विमान से दागा जा सकता है। यह हथियार बिना किसी पूर्व चेतावनी के पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद उपग्रहों को कुछ ही पलों में मलबे में तब्दील करने की क्षमता रखता है।
अंतरिक्ष में परमाणु विस्फोट का खतरा और अंतरराष्ट्रीय संधियां
इन सभी पारंपरिक और तकनीकी प्रणालियों से परे सबसे भयावह परिदृश्य रूस द्वारा अंतरिक्ष में परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम उपग्रह की कथित योजना से जुड़ा है। यदि अंतरिक्ष की कक्षा में परमाणु हथियार तैनात किए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर 1967 की ऐतिहासिक 'आउटर स्पेस ट्रीटी' का खुला उल्लंघन होगा, जो अंतरिक्ष को सामूहिक विनाश के हथियारों से मुक्त रखने का संकल्प लेती है।
रक्षा विश्लेषकों और पेंटागन की चेतावनियों के अनुसार, यदि लो-अर्थ ऑर्बिट में एक भी परमाणु विस्फोट किया जाता है, तो उससे उत्पन्न होने वाला तीव्र विद्युत चुम्बकीय पल्स (EMP) और ऊर्जावान कण सेकंडों में तबाही मचा देंगे। इस दायरे में मौजूद 15,000 से अधिक सरकारी, सैन्य और वाणिज्यिक उपग्रह तुरंत जलकर राख या निष्क्रिय हो जाएंगे। इस तबाही का असर तुरंत खत्म नहीं होगा। विस्फोट के बाद अंतरिक्ष में खतरनाक रेडियोधर्मी विकिरण का एक ऐसा स्थायी घेरा बन जाएगा जो वर्षों तक बना रहेगा। यह रेडिएशन बेल्ट उस मार्ग से गुजरने वाले किसी भी बचे हुए या नए भेजे जाने वाले उपग्रह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को पूरी तरह नष्ट कर देगा, जिससे अंतरिक्ष का वह हिस्सा लंबे समय के लिए अनुपयोगी हो जाएगा।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और वास्तविक संघर्ष की आहट
अंतरिक्ष और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में वर्चस्व की यह लड़ाई कोई दूरस्थ संभावना नहीं है, बल्कि इसके प्रमाण पहले ही सामने आ चुके हैं। 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के संदर्भ में अमेरिका और ईरान के बीच एक-दूसरे की अंतरिक्ष और नेविगेशन क्षमताओं के खिलाफ आक्रामक कदमों के विवरण सामने आए थे।
विशेष रूप से जून के महीने में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास व्यापक स्तर पर की गई जीपीएस जैमिंग ने अंतरराष्ट्रीय हलचल मचा दी थी। इस जैमिंग के कारण क्षेत्र में गश्त कर रहे लड़ाकू विमानों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लगे मालवाहक जहाजों के नेविगेशन उपकरण अचानक दिशाहीन होने लगे थे। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य के किसी भी पूर्ण संघर्ष से पहले साइबर हमले और स्पेस जैमिंग को शुरुआती सामरिक हथियार के रूप में आजमाया जाएगा ताकि प्रतिद्वंद्वी की वास्तविक स्थिति को भ्रमित किया जा सके।
वाशिंगटन की चिंताएं और स्पेस कमांड की प्रतिक्रिया
रूस और चीन के इन आक्रामक अंतरिक्ष कार्यक्रमों की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद वाशिंगटन के रक्षा प्रतिष्ठान में व्यापक चिंता देखी गई है। फरवरी 2024 में अमेरिकी कांग्रेस में इस संभावित राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे पर गहन चर्चा और हंगामा देखने को मिला था, जब खुफिया रिपोर्टों में यह संकेत मिले कि रूस अंतरिक्ष में परमाणु क्षमता तैनात करने के विकल्पों पर विचार कर रहा है।
अमेरिकी स्पेस कमांड के प्रमुख जनरल स्टीफन व्हिटिंग सहित शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार किया है कि मॉस्को और बीजिंग की तेजी से बढ़ती अंतरिक्ष हथियार प्रणालियां वर्तमान में सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। अमेरिकी रणनीतिकार अब इस बात पर विचार करने के लिए मजबूर हैं कि कैसे अपने विशाल उपग्रह संजाल को सुरक्षित रखा जाए और अंतरिक्ष को युद्ध के एक सक्रिय अखाड़े में तब्दील होने से रोका जाए।



















