अमेरिका और इजरायल में हाल में संपन्न हुए चुनाव परिणामों ने दोनों देशों के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के सामने बेहद जटिल परिस्थितियां उत्पन्न कर दी हैं। एक तरफ जहां अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को गंभीर पराजय का सामना करना पड़ा है, वहीं दूसरी ओर इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन अपनी स्पष्ट बहुमत खो चुका है। ईरान के खिलाफ सैन्य अभियानों और हवाई हमलों को अंजाम देने वाले इन दोनों प्रमुख राष्ट्रों के भीतर उपजे इस राजनीतिक फेरबदल के कारण आठ महीने से चले आ रहे युद्ध के भविष्य और आगे की रणनीतियों को लेकर वैश्विक स्तर पर नई बहस छिड़ गई है।
संसद पर विपक्ष का नियंत्रण और अमेरिकी विदेश नीति पर बढ़ता दबाव
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के घोषित नतीजों के अनुसार डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों प्रमुख सदनों, यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी मतदाताओं ने ईरान के खिलाफ जारी युद्ध और उसके कारण उपजे आर्थिक संकट के प्रति अपना कड़ा असंतोष व्यक्त करते हुए यह जनादेश दिया है। हालांकि, अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था के तहत डोनाल्ड ट्रंप अभी भी देश के कमांडर-इन-चीफ पद पर बने हुए हैं, जिससे सैन्य अभियानों और विदेश नीति के क्रियान्वयन का मूल अधिकार उनके पास ही सुरक्षित है। इसके बावजूद, अब डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस जांच प्रक्रियाओं, बजटीय आवंटन पर रोक, और कड़े कानून बनाकर प्रशासन की नीतियों पर कड़ा दबाव बनाने में सक्षम हो गई है, भले ही वह सीधे तौर पर सैन्य कार्रवाइयों को रोकने का आदेश न दे सके।
इजरायल में त्रिशंकु जनादेश और नई सरकार का अनिश्चित गणित
दूसरी ओर, इजरायल में 27 अक्टूबर को आयोजित हुए संसदीय चुनाव के नतीजों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति को काफी उलझा दिया है। 120 सदस्यों वाली इजरायली संसद नेसेट में बहुमत का आंकड़ा 61 सीटों का है, जिसे हासिल करने में नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन पूरी तरह विफल रहा। इसके साथ ही, गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन भी सरकार बनाने के आवश्यक आंकड़े को हासिल नहीं कर सका है। इस त्रिशंकु स्थिति के बीच इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने आधिकारिक रूप से चुनाव परिणामों को स्वीकार करते हुए नई सरकार के गठन की संभावनाओं पर विभिन्न राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श की प्रक्रिया आरंभ कर दी है। फिलहाल, नई व्यवस्था बनने तक बेंजामिन नेतन्याहू केवल कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
आर्थिक तंगी, ईंधन की कीमतें और जनता की नाराजगी
मध्य पूर्व में लगभग आठ महीनों से जारी अमेरिकी-इजरायली संघर्ष का व्यापक दुष्प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है। खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की दरों में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे आम जनता को पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की भारी कीमतों का सामना करना पड़ रहा है। लगातार बढ़ते जीवन-यापन के खर्च और महंगाई की मार से नागरिक अत्यधिक परेशान हैं, जिसे अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की हार का एक मुख्य कारण माना जा रहा है। इजरायल में जारी राजनीतिक अनिश्चितता और गठबंधन वार्ताओं के अंतिम दौर से भी तेहरान के प्रति भावी कूटनीतिक दृष्टिकोण प्रभावित होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
दोहा कूटनीति, होर्मुज का प्रस्ताव और ईरान की सख्त चेतावनी
इस बीच कूटनीतिक मोर्चे पर भी कुछ महत्वपूर्ण गतिविधियां देखी जा रही हैं। कतर की राजधानी दोहा में चल रही वार्ताओं के दौरान ईरान ने यह प्रस्ताव रखा है कि यदि अमेरिका उसकी निर्धारित शर्तों को स्वीकार कर लेता है, तो वह मात्र दो दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा व्यापार के लिए खोल सकता है और शांति वार्ता को फिर से शुरू कर सकता है। इस संदर्भ में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न कूटनीतिक स्तरों पर बातचीत की प्रक्रिया जारी है और अमेरिका शांतिपूर्ण समाधान के लिए तैयार है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने भी कूटनीति का मार्ग चुनने की अपनी मंशा व्यक्त की है। हालांकि, कूटनीतिक पहलों के बीच ईरान के सुप्रीम लीडर मोजेतबा खामेनेई ने एक सख्त चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यदि अमेरिका या इजरायल द्वारा पुनः कोई सैन्य हमला किया जाता है, तो ईरान बिना किसी भौगोलिक सीमा के कड़ा जवाब देगा। वॉशिंगटन और जेरूसलम में बदले राजनीतिक परिदृश्य ने तेहरान के साथ समझौते का दबाव तो बढ़ाया है, लेकिन युद्ध का अंत दोनों देशों के नेताओं की नई मजबूरियों पर निर्भर करेगा।



















