अमरीका में हाल ही में संपन्न हुए मध्यावधि चुनावों के नतीजों ने वॉशिंगटन के राजनीतिक परिदृश्य में बड़ा फेरबदल कर दिया है, जहां रिपब्लिकन पार्टी को तगड़ा झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) और सीनेट दोनों सदनों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। चुनावी नतीजों को जनता द्वारा मौजूदा प्रशासन की नीतियों के प्रति जताई गई नाराजगी के रूप में देखा जा रहा है। ईरान से जुड़े सैन्य घटनाक्रमों, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और लगातार बनी हुई महंगाई जैसे मुद्दों ने डोनाल्ड ट्रंप और उनकी पार्टी के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दीं। संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के नियंत्रण के बाद अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या यह बदलाव ट्रंप की विदेश नीति को प्रभावित करेगा और भारत के प्रति उनके कड़े व्यापारिक रुख तथा टैरिफ संबंधी फैसलों पर रोक लगा पाएगा।
संसदीय बदलाव के बाद भी राष्ट्रपति के विदेश नीति अधिकारों पर असर नहीं
इन चुनावी परिणामों के भारत-अमरीका संबंधों पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपना बेबाक मत प्रस्तुत किया है। थरूर का मानना है कि अमरीकी संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स का बहुमत हासिल होना डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति चलाने की स्वतंत्रता को बहुत अधिक सीमित नहीं कर पाएगा। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर घरेलू मोर्चे पर कुछ अड़चनें जरूर पैदा हो सकती हैं, लेकिन अमरीकी संवैधानिक व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति के पास अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेशी व्यापार से जुड़े मामलों में व्यापक और स्वतंत्र अधिकार मौजूद रहते हैं।
थरूर के अनुसार, भारत को अपनी कूटनीतिक और आर्थिक वार्ताएं उसी डोनाल्ड ट्रंप के साथ जारी रखनी होंगी जिन्हें वह अब तक देखता और समझता आया है। राष्ट्रपति के पास प्रशासनिक आदेशों और विशेष कानूनी प्रावधानों के जरिए टैरिफ लागू करने या व्यापारिक प्रतिबंधों की चेतावनी देने की मजबूत शक्तियां हैं। अमरीकी संसद में विपक्षी पार्टी का दबदबा बढ़ने के बावजूद राष्ट्रपति के इस अधिकार को पूरी तरह निष्प्रभावी करना लगभग असंभव है। ऐसे में भारत को मानकर चलना होगा कि द्विपक्षीय व्यापारिक मुद्दों पर अमरीकी रुख में किसी बड़े नरमी के आसार नहीं हैं।
संवैधानिक प्रावधान और संसद की व्यावहारिक सीमाएं
अमरीकी शासन प्रणाली की बारीकियों को स्पष्ट करते हुए थरूर ने बताया कि संसद किस हद तक राष्ट्रपति के फैसलों पर नियंत्रण रख सकती है और उसकी क्या कानूनी सीमाएं हैं। संसद के पास राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने या उनके फैसलों के खिलाफ कानून बनाने का अधिकार होता है। लेकिन यदि राष्ट्रपति किसी ऐसे विधेयक पर वीटो (निषेधाधिकार) का प्रयोग कर देते हैं, तो संसद को उस वीटो को रद्द करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। चूंकि डेमोक्रेट्स के पास वर्तमान में इतना भारी बहुमत मौजूद नहीं है, इसलिए वे सीधे तौर पर राष्ट्रपति की विदेश नीति संबंधी प्राथमिकताओं को नहीं पलट सकते।
हालांकि, संसद के जरिए अमरीकी राष्ट्रपति पर दूसरे तरीकों से दबाव जरूर बनाया जा सकता है। डेमोक्रेट्स की मजबूती के कारण अब राजदूतों की नियुक्तियों और अन्य उच्च कूटनीतिक पदों की मंजूरी में प्रशासन को कड़े विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा, यदि किसी विदेश नीति पहल या अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के लिए अतिरिक्त बजट या बजटीय आवंटन की जरूरत होती है, तो सीनेट और प्रतिनिधि सभा उस पर रोक लगा सकती हैं। इन विधायी रुकावटों से प्रशासनिक प्रक्रियाएं धीमी जरूर हो सकती हैं, लेकिन इससे राष्ट्रपति की बुनियादी विदेश नीति चलाने की ताकत खत्म नहीं होगी।
भारत के लिए कूटनीतिक और व्यापारिक रणनीति के मायने
थरूर के इस पूरे विश्लेषण का मुख्य संदेश यह है कि भारत को अपनी विदेश नीति में किसी जल्दबाजी या बड़े बदलाव की उम्मीद करने के बजाय व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। अमरीकी राष्ट्रपति अपनी विदेश और व्यापार नीति को अपनी इच्छा के अनुसार संचालित करने के लिए स्वतंत्र हैं, इसलिए भारत और अमरीका के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं और टैरिफ से जुड़े विवादों का समाधान उसी पुराने ढर्रे पर ही संभव होगा। आयात शुल्क, व्यापार समझौते और द्विपक्षीय आर्थिक साझेदारी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भारत को सीधे राष्ट्रपति प्रशासन के साथ बातचीत जारी रखनी होगी।
वॉशिंगटन में भले ही सत्ता का शक्ति संतुलन बदल गया हो, लेकिन नई दिल्ली के लिए बुनियादी कूटनीतिक चुनौतियां जस की तस बनी हुई हैं। व्यापारिक समझौतों पर बातचीत की राह में जो सख्ती पहले थी, वही कड़ाई आगे भी देखने को मिल सकती है। इसलिए भारतीय नीति निर्माताओं को अमरीकी संसद की गतिविधियों पर नजर रखते हुए राष्ट्रपति ट्रंप के साथ अपने सीधे संवाद और कूटनीतिक तालमेल को प्राथमिकता देनी होगी ताकि राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके।
भारतीय राजनीति पर चुनावी संदेश और थरूर का दृष्टिकोण
अमरीका में रिपब्लिकन पार्टी की इस पराजय को भारत के राजनीतिक गलियारों में भी उत्सुकता से देखा जा रहा है। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल इसे इस बात के उदाहरण के रूप में पेश कर रहे हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बड़े से बड़े शक्तिशाली नेता को भी महंगाई, आर्थिक बदहाली और जन असंतोष का सामना करना पड़ता है। चुनावी नतीजे यह संदेश देते हैं कि जनता की बुनियादी समस्याएं किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होती हैं।
फिर भी, थरूर ने अमरीका के घरेलू राजनीतिक रुझानों को भारत की आंतरिक राजनीति से सीधे जोड़ने के बजाय भारत-अमरीका के कूटनीतिक संबंधों के व्यावहारिक पहलुओं पर अधिक बल दिया है। उनका स्पष्ट मानना है कि वॉशिंगटन में राजनीतिक समीकरणों में चाहे जो भी उतार-चढ़ाव आए, नई दिल्ली को अपने दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए ट्रंप प्रशासन के साथ संवाद का रास्ता खुला रखना होगा।



















