जैक डॉर्सी समर्थित विकेंद्रीकृत मैसेजिंग प्लेटफॉर्म बिटचैट को भारत में प्रमुख मोबाइल ऐप वितरण प्लेटफॉर्म्स से हटा दिया गया है। बिना इंटरनेट कनेक्टिविटी के काम करने की क्षमता के कारण चर्चा में आए इस ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर के खिलाफ केंद्र सरकार की ओर से नई कानूनी पाबंदियां लागू की गई हैं। इस ताजा फैसले के बाद देश में आईफोन और एंड्रॉयड दोनों ही यूजर्स के लिए इस प्लेटफॉर्म को आधिकारिक तौर पर इंस्टॉल करना संभव नहीं रह गया है।
आईटी कानून की धारा 69ए के तहत जारी हुआ निर्देश
जैक डॉर्सी ने X पर लिखा कि भारत सरकार ने एप्पल को अपने स्थानीय ऐप स्टोर से बिटचैट को हटाने का आदेश दिया है। इस संदर्भ में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से जारी नोटिस में सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 69ए का हवाला दिया गया है। यह कानूनी प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर ऑनलाइन सामग्री तक पहुंच को प्रतिबंधित करने का मुख्य आधार है।
एप्पल की ओर से जारी सूचना के अनुसार बिटचैट भारतीय सीमा से बाहर अन्य देशों के ऐप स्टोर पर उपलब्ध रहेगा। हालांकि भारत के भीतर एप्पल की बीटा-टेस्टिंग सेवा टेस्टफ्लाइट के जरिए भी इस एप्लिकेशन तक पहुंच को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया है। शनिवार को यह एप्लिकेशन गूगल प्ले स्टोर पर भी भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए अनुपलब्ध पाया गया। इसके अतिरिक्त देश भर के विभिन्न इंटरनेट सेवा प्रदाताओं के नेटवर्क पर बिटचैट की आधिकारिक वेबसाइट भी नहीं खुल रही है। इन कदमों पर एप्पल, गूगल और केंद्रीय आईटी मंत्रालय की तरफ से कोई आधिकारिक वक्तव्य सामने नहीं आया है।
बिना नेटवर्क काम करने वाली तकनीक पर सुरक्षा एजेंसियों की चिंता
बीते वर्ष जुलाई में पेश किया गया बिटचैट ब्लूटूथ मेश नेटवर्किंग तकनीक का उपयोग करता है। यह सिस्टम आस-पास मौजूद स्मार्टफोन्स के बीच एनक्रिप्टेड संदेशों का आदान-प्रदान करता है, जिसके लिए सेलुलर नेटवर्क, इंटरनेट कनेक्शन या किसी केंद्रीय सर्वर की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस स्वायत्त संरचना के चलते ही यह सरकारी निगरानी और पारंपरिक पाबंदियों के दायरे से बाहर काम कर सकता है।
इससे पहले जुलाई 2026 में भी जैक डॉर्सी ने X पर लिखा था कि भारतीय प्राधिकारियों ने गिटहब को इस मैसेजिंग टूल से जुड़े कोड रिपॉजिटरी को हटाने का निर्देश दिया था। उस समय सरकार ने तर्क दिया था कि बिटचैट का आर्किटेक्चर कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए बातचीत को इंटरसेप्ट करना और संदेश भेजने वालों की पहचान ट्रैक करना बेहद कठिन बना देता है। विशेष रूप से इंटरनेट शटडाउन के दौरान भी काम करते रहने की इसकी क्षमता को जांच एजेंसियों ने चिंता का विषय बताया था। जुलाई का वह आदेश मध्यवर्ती संस्थाओं की देनदारी से जुड़े नियमों पर आधारित था, जबकि वर्तमान कार्रवाई धारा 69ए के तहत की गई है।
डिजिटल अधिकार संस्थाओं का विरोध और विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि
नई दिल्ली स्थित डिजिटल अधिकार वकालत समूह इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने X पर लिखा कि यह ताजा आदेश असंवैधानिक है। संस्था का कहना है कि धारा 69ए गैरकानूनी सूचना को रोकने की अनुमति देती है, लेकिन इंटरनेट बंदी में काम करने की क्षमता के आधार पर पूरे मैसेजिंग ऐप को ब्लॉक करने का अधिकार नहीं देती। संस्था ने यह भी रेखांकित किया कि न तो इस ब्लॉकिंग आदेश को सार्वजनिक किया गया है और न ही उस कथित गैरकानूनी सामग्री का विवरण सामने रखा गया है जिसके आधार पर यह कार्रवाई हुई।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब देश में मतदाता सूची संशोधनों को लेकर युवाओं का विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहा है। नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया। इससे पूर्व शुक्रवार को जंतर-मंतर के आसपास 12 घंटों के लिए इंटरनेट सेवाओं को निलंबित किया गया था। जुलाई माह में हुए प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट बंद होने पर प्रदर्शनकारियों ने बिटचैट और ब्रायर जैसे ऑफलाइन मैसेजिंग टूल्स का रुख किया था। सेंसर टावर के आंकड़ों के अनुसार 17 जुलाई से 23 जुलाई के बीच बिटचैट के वैश्विक डाउनलोड्स में से करीब 85 प्रतिशत डाउनलोड्स अकेले भारत से दर्ज किए गए थे, जबकि उससे पहले के 30 दिनों में यह आंकड़ा केवल 1 प्रतिशत के आसपास था।


















