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असम के वित्त मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने केंद्र से की कृषि कर्ज नीति में क्षेत्रीय बदलाव की मांगअसम
20 सित॰ 2026, 8:26 pm (22 मिनट पहले)· 0

असम के वित्त मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने केंद्र से की कृषि कर्ज नीति में क्षेत्रीय बदलाव की मांग

असम के वित्त मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि पूर्वोत्तर की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार कृषि वित्तीय ढांचा तैयार किया जाए और संस्थागत कर्ज वितरण को सुगम बनाया जाए।

देश के कृषि क्षेत्र में आमदनी बढ़ाने और समग्र विकास को गति देने के लिए एक समान नीति के बजाय क्षेत्रीय जरूरतों पर आधारित वित्तीय व्यवस्था की आवश्यकता रेखांकित की गई है। असम के वित्त मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि कृषि कर्ज नीतियों को राज्यों की जमीनी हकीकत के अनुसार ढाला जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पादन के तौर-तरीके, भौगोलिक परिस्थितियां और वित्तीय जरूरतें पूरी तरह अलग हैं, इसलिए पूरे देश के लिए एक ही पैमाना लागू करना कारगर साबित नहीं हो सकता।

राष्ट्रीय सम्मेलन में क्षेत्रीय वास्तविकताओं पर जोर

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों तथा वित्त मंत्रियों की उपस्थिति में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन में यह विषय उठाया गया। विकसित भारत के लक्ष्य की ओर अग्रसर वित्तीय परिचर्चा के दूसरे दिन कृषि क्षेत्र के बदलाव पर केंद्रित सत्र में भाग लेते हुए असम के वित्त मंत्री ने पूर्वोत्तर क्षेत्र की संभावनाओं और चुनौतियों को सामने रखा। उन्होंने याद दिलाया कि भारत के कुल कार्यबल का लगभग 40 से 46 प्रतिशत हिस्सा खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है, जबकि देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 18 प्रतिशत है। इस व्यापक निर्भरता को देखते हुए उत्पादकता, मूल्य संवर्धन, बेहतर बाजार पहुंच और किसानों की कमाई में मजबूती लाना बेहद आवश्यक है।

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जमीन के मालिकाना हक की बाधाएं और किसान पहचान पत्र

पूर्वोत्तर राज्यों में औपचारिक वित्तीय तंत्र और संस्थागत कर्ज के वितरण में मौजूद असमानताओं का उल्लेख करते हुए असम के वित्त मंत्री ने छोटे उत्पादकों की परेशानियां गिनाईं। बटाईदारों, पट्टे पर खेती करने वाले किसानों, वन अधिकार अधिनियम के लाभार्थियों, सरकारी जमीन पर जोत करने वाले काश्तकारों और छोटे चाय बागान मालिकों को अक्सर जमीन के पक्के पट्टे या स्पष्ट मालिकाना हक के अभाव में बैंकों से ऋण प्राप्त करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए असम में किसान पहचान पत्र यानी फार्मर आईडी का वितरण शुरू किया गया है। यह व्यवस्था जमीन के दस्तावेजों की बंदिशों से जूझ रहे वंचित किसान वर्गों तक लक्षित संस्थागत सहायता पहुंचाने में काफी सहायक साबित हो सकती है।

उत्पादन केंद्रों के पास प्रसंस्करण इकाइयों की जरूरत

कृषि उपज के उत्पादन से लेकर प्राथमिक प्रसंस्करण, सुरक्षित भंडारण, विपणन और निर्यात तक पूरी मूल्य श्रृंखला पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही गई है। कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, परिवहन और मार्केटिंग सुविधाएं स्थापित करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी फसलों की कटाई वाले क्षेत्रों के निकट प्रसंस्करण केंद्र स्थापित करना है। ऐसी फसलें जो कटाई के महज दो से पांच दिनों के भीतर खराब होने लगती हैं, उनके लिए स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाई उपलब्ध होना निर्णायक होता है। स्थानीय सुविधाएं न होने पर किसानों को जल्दबाजी में कम दामों पर उपज बेचनी पड़ती है या बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है।

अगरवुड, अदरक और हल्दी के लिए समर्पित निर्यात ढांचा

असम के अगरवुड क्षेत्र की बड़ी आर्थिक क्षमता का जिक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि यदि इसे अनुकूल नीतियां मिलें तो किसानों को भारी आर्थिक लाभ मिल सकता है। उन्होंने कहा कि असम के अगरवुड क्षेत्र में अपार आर्थिक संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने मांग की कि इसके लिए नियामकीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए, व्यापक गुणवत्ता परीक्षण सुविधाएं विकसित की जाएं, स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित हों और विदेशी बाजारों तक सीधी पहुंच के लिए सुदृढ़ निर्यात गलियारे तैयार किए जाएं। इसके साथ ही असम के पहाड़ी इलाकों में पैदा होने वाली प्रीमियम गुणवत्ता की अदरक और हल्दी के लिए प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय एयर कार्गो सहित विशेष निर्यात तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया गया।

आपदाओं के बीच त्वरित सहायता तंत्र की पुकार

पूर्वोत्तर क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता की चर्चा करते हुए बाढ़, सूखे और कीटों के प्रकोप से होने वाले नुकसान का हवाला दिया गया। इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं और आकस्मिक संकट के समय किसानों को सहारा देने के लिए त्वरित कार्रवाई तथा वास्तविक समय में हस्तक्षेप करने वाली प्रणाली तैयार करना बेहद जरूरी है। कृषि वित्तपोषण और संपूर्ण कृषि तंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच निरंतर सहयोग को आधारशिला बताया गया है।

सवाल-जवाब

असम के वित्त मंत्री ने केंद्र सरकार से मुख्य रूप से क्या मांग की है?
उन्होंने कृषि वित्तपोषण के लिए क्षेत्रीय जरूरतों पर आधारित नीतियां बनाने, संस्थागत कर्ज को सुलभ करने और उत्पादन केंद्रों के निकट प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने की मांग की है।
देश के कुल कार्यबल और अर्थव्यवस्था में कृषि का क्या योगदान बताया गया?
देश का लगभग 40 से 46 प्रतिशत कार्यबल कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में लगा हुआ है, जबकि जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 18 प्रतिशत है।
पूर्वोत्तर में किसानों को बैंक कर्ज लेने में क्या परेशानी आती है?
बटाईदारों, पट्टेदारों और छोटे चाय उत्पादकों के पास जमीन के औपचारिक मालिकाना हक और पट्टे के दस्तावेज न होने के कारण बैंक उन्हें आसानी से संस्थागत ऋण नहीं देते।
दस्तावेजों की समस्या से निपटने के लिए असम में क्या कदम उठाया गया है?
असम में किसानों को फार्मर आईडी का वितरण शुरू किया गया है, ताकि बिना जमीन के पट्टे वाले काश्तकारों तक भी लक्षित संस्थागत मदद पहुंचाई जा सके।
स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां लगाना क्यों जरूरी है?
कई नाशवान कृषि उत्पाद कटाई के दो से पांच दिनों के भीतर खराब हो जाते हैं, इसलिए नुकसान से बचने के लिए खेत के पास ही प्रसंस्करण सुविधाएं होना बेहद जरूरी है।
असम के किन उत्पादों के लिए विशेष निर्यात सुविधाओं की मांग की गई है?
असम के अगरवुड के लिए नियामक रियायतें और गुणवत्ता जांच लैब, तथा पहाड़ी क्षेत्रों की प्रीमियम अदरक और हल्दी के लिए अंतरराष्ट्रीय एयर कार्गो सुविधाओं की मांग की गई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 मिनट पहले

एक कानून-व्यवस्था और कानूनी मामलों के पत्रकार के रूप में, मैं इस रिपोर्ट को बेहद महत्वपूर्ण मानता हूँ। जमीन के मालिकाना हक न होने के कारण जब गरीब किसानों को औपचारिक बैंक ऋण नहीं मिलता, तो वे अक्सर अवैध सूदखोरों के चंगुल में फंस जाते हैं। यह स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में जबरन वसूली, वित्तीय धोखाधड़ी और भूमि विवादों से जुड़े अपराधों को जन्म देती है। असम सरकार द्वारा शुरू की गई 'किसान आईडी' पहल न केवल वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करेगी, बल्कि जाली दस्तावेजों के जरिए होने वाले भूमि घोटालों और गैर-कानूनी ऋण चक्र पर भी लगाम लगाएगी। कानून व्यवस्था बनाए रखने और सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद सुरक्षात्मक कदम साबित हो सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·3 मिनट पहले

वित्तीय विश्लेषक के रूप में, मैं इस मांग को एक बड़े आर्थिक सुधार के रूप में देखता हूँ। पूर्वोत्तर में पारंपरिक 'लैंड-कोलैटरल' आधारित कर्ज नीतियां विफल रही हैं, जिससे वहां ऋण प्रवाह (credit flow) बाधित रहा है। 'किसान आईडी' जैसी डिजिटल पहचान वित्तीय संस्थानों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। इसके जरिए बैंक और एग्रीटेक स्टार्टअप्स जमीन के मालिकाना हक के बजाय वास्तविक उत्पादन क्षमता के आधार पर ऋण जोखिम का मूल्यांकन कर सकेंगे। यह पहल वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के साथ-साथ कृषि-प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन (value addition) में निजी निवेश को आकर्षित करेगी, जो क्षेत्रीय जीडीपी में योगदान बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है।

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