राजस्थान के कोटपूतली इलाके में स्थित कोहड़ा गांव की कल्याणपुरा पंचायत इस समय एक ऐतिहासिक और अनोखे धार्मिक उत्सव के स्वागत में पूरी तरह लीन है। यहां पहाड़ की तलहटी में स्थापित सुप्रसिद्ध भेरू बाबा मंदिर में 17वें वार्षिक लक्की मेले का आयोजन किया जा रहा है। इस भव्य धार्मिक उत्सव की औपचारिक शुरुआत 29 जनवरी को एक विशाल कलश यात्रा के माध्यम से होगी, जबकि मुख्य मेले का आयोजन 30 जनवरी को संपन्न होगा। दूर-दराज तक फैली इस प्राचीन देवस्थान की महिमा के चलते हर वर्ष लाखों श्रद्धालु बाबा भेरू नाथ के दर्शन करने पहुंचते हैं, जिसके कारण इस बार भी पूरे क्षेत्र में श्रद्धा, उत्साह और उल्लास का माहौल देखने को मिल रहा है।
प्रसादी निर्माण में आधुनिक तकनीक: 800 क्विंटल चूरमे की विशाल तैयारी
इस वार्षिक मेले का सबसे विशिष्ट और चर्चा का विषय बना पहलू चूरमे की महाप्रसादी का विशाल पैमाना और उसे बनाने का तरीका है। इतनी भारी तादाद में प्रसादी तैयार करने के लिए पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आधुनिक साधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। खुले मैदान में अनाज के विशालकाय ढेर लगाए गए हैं, जिन्हें समतल करने और सामग्री मिलाने के लिए जेसीबी मशीन की सहायता ली जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार, इस साल कुल 800 क्विंटल चूरमे की प्रसादी तैयार की जा रही है। राजस्थान भर में इतनी विशाल मात्रा में एक साथ प्रसादी तैयार किए जाने को अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड माना जा रहा है।
ग्रामीणों का आत्मनिर्भर प्रबंधन और अंतरराज्यीय श्रद्धालुओं की आस्था
मंदिर परिसर में प्रतिष्ठित भैरू महाराज के विग्रह के प्रति श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास वर्षों से बना हुआ है। मान्यता है कि बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने से जीवन के तमाम संकट दूर हो जाते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी अटूट श्रद्धा के चलते इस मेले में केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि सवाईमाधोपुर, ग्वालियर, झालावाड़, कोटा, मुरैना, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली समेत कई अन्य राज्यों से भी भक्त बड़ी संख्या में आते हैं।
इस पूरे आयोजन का प्रबंधन स्थानीय सामाजिक एकजुटता की एक मिसाल पेश करता है। मेले की तमाम व्यवस्थाएं किसी बाहरी ठेकेदार या इवेंट कंपनी को सौंपने के बजाय स्थानीय ग्रामीणों ने खुद अपने हाथों में ली हैं। आसपास के पांच प्रमुख गांवों के लोग एकजुट होकर महाप्रसाद बनाने, भंडारे के संचालन, यातायात व्यवस्था, साफ-सफाई और सुरक्षा जैसी सभी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। चूरमे के निर्माण में दूध, मावा, शुद्ध घी, काजू, बादाम और किशमिश जैसी उच्च गुणवत्ता वाली सामग्रियों का उपयोग किया जा रहा है। भगवान को भोग अर्पित किए जाने के बाद यह महाप्रसाद करीब ढाई से तीन लाख श्रद्धालुओं में वितरित किया जाएगा।
11,000 महिलाओं की भव्य कलश यात्रा और पौराणिक खेजड़ी वृक्ष
मेले के पहले दिन यानी 29 जनवरी को निकलने वाली कलश यात्रा इस आयोजन का सबसे भव्य और मनोहारी दृश्य होगी। इस शोभायात्रा में करीब 11,000 महिलाएं पारंपरिक राजस्थानी परिधानों में सज-धजकर सिर पर मंगल कलश धारण करके सम्मिलित होंगी। विभिन्न ग्रामीण रास्तों से गुजरती हुई यह यात्रा भेरू बाबा के मंदिर तक पहुंचेगी। लोक संगीत, पारंपारिक भजनों और बाबा के जयकारों से पूरा वातावरण गुंजायमान रहेगा, जो क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को उजागर करेगा।
धार्मिक आस्था के साथ-साथ मंदिर परिसर में मौजूद सैकड़ों वर्ष पुराना खेजड़ी का वृक्ष भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इसी पवित्र खेजड़ी के नीचे सवाई भोज का विवाह पदमा पोसवाल के साथ संपन्न हुआ था। सदियों बाद भी यह खेजड़ी पूरी तरह हरी-भरी खड़ी है और इसके संरक्षण के लिए चारों तरफ सुरक्षा दीवार का निर्माण कराया गया है। श्रद्धालु इसे एक चमत्कारी वृक्ष मानते हैं और इसके दर्शन को बेहद शुभकारी मानते हैं।
प्रशासनिक सतर्कता और गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति
इस बड़े धार्मिक समागम को लेकर शासन और प्रशासन ने भी सुरक्षा तथा भीड़ नियंत्रण के चाक-चौबंद प्रबंध किए हैं। पहाड़ों से घिरे इस मंदिर की प्राकृतिक सुंदरता मेले की छटा को और भव्य बना देती है। समारोह में कई विशिष्ट जनप्रतिनिधि अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे, जिनमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के साथ-साथ जिला प्रमुख, पंचायत अध्यक्ष, स्थानीय सरपंच और अन्य जनसेवक मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। आस्था, ग्रामीण सहकार और परंपरा का यह संगम कोहड़ा गांव को एक विशिष्ट पहचान दिला रहा है।

















