पूर्वोत्तर के छोटे और पहाड़ी राज्यों में पूरे देश के लिए तैयार की जाने वाली सामान्य नीतियां ज़मीनी स्तर पर पूरी तरह सटीक नहीं बैठती हैं। इसी मुद्दे को उठाते हुए मिजोरम के शिक्षा मंत्री वानलालथलाना ने केंद्र सरकार से मांग की है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए शिक्षा से जुड़ी योजनाएं बनाते समय वहां की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सामाजिक-आर्थिक माहौल का विशेष ध्यान रखा जाए। नगालैंड के चुमौकेदिमा जिले में आयोजित नॉर्थ ईस्ट एजुकेशन कॉन्क्लेव 2026 के दौरान उन्होंने यह बात रखी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में आ रही व्यावहारिक दिक्कतें
सम्मेलन में वानलालथलाना ने अपने राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में हुए कार्यों का ब्योरा दिया और साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी एनईपी 2020 को जमीन पर उतारने के दौरान पेश आ रही कठिनाइयों को साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी राज्यों पर एक जैसी नीति लागू करने से पूर्वोत्तर के दुर्गम इलाकों की जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं।
मंत्री ने बताया कि सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में घटता छात्रों का नामांकन इस वक्त एक बड़ी चिंता का विषय है। इसके अलावा दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में माध्यमिक स्कूलों की भारी कमी बनी हुई है। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (डीआईईटी) और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषदों (एससीईआरटी) में आवश्यक कर्मचारियों और विशेषज्ञों का अभाव भी कामकाज को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही सुदूर पहाड़ी इलाकों में कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी और शिक्षण संस्थानों तक सौर ऊर्जा पहुंचाने में आने वाली दिक्कतें भी पढ़ाई-लिखाई के आधुनिक तंत्र में रुकावट पैदा कर रही हैं।
वित्तीय दबाव और बुनियादी ढांचे का विस्तार
वानलालथलाना ने इस बात पर जोर दिया कि पूर्वोत्तर के राज्यों के पास सीमित राजस्व संसाधन हैं। इस वित्तीय तंगी के कारण राज्य सरकारें न तो जरूरी संख्या में नए शिक्षकों व कर्मचारियों की भर्ती कर पा रही हैं और न ही स्कूलों के बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार कर पा रही हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह इन समस्याओं को केवल किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र की साझा चुनौती माने और उस हिसाब से उचित आर्थिक व नीतिगत सहयोग उपलब्ध कराए।
इस अवसर पर मिजोरम के प्रतिनिधिमंडल ने समग्र शिक्षा 3.0 और पीएम-उषा योजनाओं को लेकर अपने प्रस्ताव भी सौंपे। प्रतिनिधिमंडल का सुझाव था कि शिक्षा की रणनीतियों को मिजोरम के स्थानीय रीति-रिवाजों, जनजीवन और वहां की वास्तविक भौगोलिक स्थिति के अनुकूल ढाला जाना चाहिए।
राज्य स्तर पर शुरू किए गए नवाचार
कठिनाइयों के बीच मिजोरम सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए शिक्षा मंत्री ने बताया कि राज्य में प्राथमिक स्तर के विद्यालयों के लिए मानकीकृत मूल्यांकन प्रणाली शुरू की गई है। इसके साथ ही शैक्षणिक निगरानी और समीक्षा तंत्र को पारदर्शी व मजबूत बनाने के लिए विद्या समीक्षा केंद्र का सक्रिय उपयोग किया जा रहा है।
विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई 'इनतोदेलह' (Intodelh) परियोजना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसका मकसद छात्रों को वित्तीय प्रबंधन और उद्यमिता के व्यावहारिक गुण सिखाना है ताकि वे भविष्य में स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ा सकें। अंत में उन्होंने दोहराया कि देश की प्रमुख शैक्षिक योजनाओं को आकार देते समय पूर्वोत्तर के अनूठे परिवेश को प्राथमिकता मिलना बेहद जरूरी है।





















